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नए समीकरण PDF Print E-mail
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Tuesday, 29 July 2014 11:06

जनसत्ता 29 जुलाई, 2014 : बिहार में जनता दल (एकी), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का साथ आना एक ऐसा राजनीतिक समीकरण बनने की शुरुआत है, जो राज्य के बाहर भी देर-सबेर अपना रंग दिखा सकता है। यों इस तालमेल की नींव तभी पड़ गई थी जब मई में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद राजद ने जीतन राम मांझी की सरकार को समर्थन देने का फैसला किया। तभी से यह अटकल लगाई जाने लगी थी कि क्या यह समर्थन चुनावी मुकाम तक भी जा सकता है। यह संभावना अब आकार ले चुकी है। राजद, जद (एकी) और कांग्रेस ने अगले महीने बिहार की दस विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव मिल कर लड़ने का फैसला किया है। निश्चय ही यह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। उत्तराखंड की तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव उसके लिए पहले ही चेतावनी साबित हो चुके हैं। ये उपचुनाव लोकसभा चुनाव के महज दो महीने बाद हुए। 

लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तराखंड की सभी पांचों सीटें हासिल हुई थीं। मगर उपचुनाव में वह खाली हाथ रही। इन तीन में से दो सीटें पहले भाजपा के पास थीं, पर उन्हें भी वह गंवा बैठी। जबकि दिल्ली में अस्पताल में पड़े मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव प्रचार करने भी नहीं जा सके। इन नतीजों की अहमियत इसलिए नहीं है कि उत्तराखंड की विधानसभा में कांग्रेस की सीटों में थोड़ा इजाफा हो गया, बल्कि इस लिहाज से है कि इससे मोदी लहर के उतरने का मनोवैज्ञानिक संदेश गया है। बिहार में भी भाजपा को लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त कामयाबी मिली थी। लेकिन इसी के आधार पर बिहार में भी सत्ता हासिल करने के उसके सपने पर सवालिया निशान लग गया है। दस सीटों के उपचुनाव में उसे राजद, जद (एकी) और कांग्रेस की सम्मिलित शक्ति का सामना करना होगा। अगर तीन पार्टियों का यह गठबंधन कामयाब हुआ तो पांच राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मोदी का जादू टूटने का वह एक और संदेश होगा। लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा को उनतीस फीसद वोट मिले थे, जबकि उसकी


सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी को साढ़े छह फीसद और राष्ट्रीय लोकशक्ति पार्टी को तीन फीसद। 

इस तरह राजग को बिहार में अड़तीस फीसद वोट हासिल हुए। दूसरी ओर, राजद को बीस फीसद, जद (एकी) को सोलह फीसद और कांग्रेस को आठ फीसद वोट मिले थे, यानी कुल चौवालीस फीसद। इसलिए इनके गठबंधन ने भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। अलबत्ता वह यह मान कर चल रही है कि इन पार्टियों को जो वोट अलग-अलग मिले थे, वे सभी गठबंधन के तहत एक ही जगह पड़ेंगे ऐसा नहीं होगा। फिर भी गठबंधन ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटों के एकजुट होने की जो जमीन तैयार की है, वह भाजपा के लिए परेशानी का सबब है। अगर यह गठबंधन उपचुनावों में बाजी मार लेता है तो लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अगले साल विधानसभा चुनाव भी मिल कर लड़ने का फैसला कर सकते हैं। पर दस सीटों के उपचुनाव में तालमेल करना मुश्किल नहीं रहा होगा, जबकि पूरे राज्य के लिए होने वाले चुनावों में सीटों के बंटवारे पर सहमति बनाना आसान नहीं हो सकता। फिर उनके सामने जीतने की सूरत में नेतृत्व की दावेदारी का भी मुश्किल सवाल होगा। पर फिलहाल उन्होंने भाजपा के खिलाफ जो मोर्चाबंदी की है उसमें बिहार के साथ-साथ किसी हद तक देश की राजनीति पर भी असर डालने की संभावना छिपी हुई है।  


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