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गांधी और गाजा PDF Print E-mail
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Tuesday, 29 July 2014 10:58

विनोद कुमार

जनसत्ता 29 जुलाई, 2014 : हमारे बहुत सारे युवा मित्र गाजा में हो रही घटनाओं से बेहद व्यथित हैं। उन्हें इस बात का भारी आक्रोश भी है कि गाजा में हो रही बर्बर इजराइली कार्रवाई की व्यापक निंदा क्यों नहीं हो रही। इस बात से कौन इनकार करेगा कि गाजा में अस्पतालों पर हो रहे हमले में मासूम बच्चों और औरतों का मारा जाना संपूर्ण मानवता के लिए कलंक की बात है। लेकिन युद्ध होगा तो लोग मारे ही जाएंगे। इसका निराकरण यही हो सकता है कि युद्ध न हो। आपसी विवाद को निबटाने के अन्य तरीकों को अपनाया जाए, और वह तरीका गांधी का हो सकता है। कई बार देखने में यह भी आता है कि लोग युद्ध के बहुत खिलाफ नहीं। तर्क यह कि अगर अन्याय होगा तो युद्ध भी होगा। होता यह भी है कि कुछ युद्धों को प्रतिक्रियावादी और कुछ को प्रगतिशील बना दिया जाता है। और हम अपनी विचारधारा के हिसाब से उसके समर्थक या विरोधी हो जाते हैं। मसलन, मलेशिया के विमान का मार गिराया जाना, जिसमें बड़ी संख्या में यात्री मारे गए। लेकिन गाजा के समांतर हुई इस हिंसात्मक कार्रवाई को अलग-अलग नजरिए से देखा गया। अमेरिका गाजा में हुई कार्रवाई के खिलाफ धीमी गति से चल रहा है। वहीं, विमान हादसे या सैन्य कार्रवाई की जांच को वहां तक ले जाना चाहता है, जिससे विश्व युद्ध का खतरा तक पैदा हो गया है। दूसरी ओर, हमारे प्रगतिशील खेमे के साथी गाजा की कार्रवाई के मुखर विरोधी इसलिए हो जाते हैं कि इजराइल अमेरिकी खेमे का सदस्य है।

अपने देश में नरेंद्र मोदी सरकार का मिजाज इजराइल के पक्ष में है। हालांकि राजनीतिक मजबूरियों की वजह से वह खुल कर कुछ नहीं बोलती, लेकिन इजराइल से राजनीतिक रिश्ते खत्म करने की बात भी नहीं करती। यों, मोदी के समर्थकों का आमतौर पर मानना है कि जैसे इजराइल फिलस्तीनियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, वैसे ही भारत को पाकिस्तान में घुस कर आतंकवादियों को मारना चाहिए।

खैर, इजराइल और फिलस्तीन का मसला गंभीर है। इजराइल जिस भौगोलिक क्षेत्र में दूसरे विश्व युद्ध के बाद बसा दिया गया था, वह अरब देशों के भी सरोकार का क्षेत्र रहा है और यहूदियों का भी। ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ को पढ़ें तो अनगिनत गीतमय गद्य मिलेंगे, जिनमें यहूदी जेरुसलम के गीत गाते और उसे भावप्रवण रूप से याद करते मिल जाएंगे। कहा जाता है कि रोमन उनकी हत्या करना नहीं चाहते थे। लेकिन यहूदियों की जिद की वजह से ईसा मसीह को फांसी पर लटकाया गया। परिणाम यह हुआ कि यहूदी न सिर्फ अपने वतन से खदेड़ दिए गए, बल्कि सदियों तक उनका कत्लेआम होता रहा। पहले विश्व युद्ध


की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने यहूदियों से वादा किया था कि उन्हें उनका देश वापस दिया जाएगा। लेकिन फिर दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया। उस युद्ध में हिटलर और मुसोलिनी के खिलाफ पूरी दुनिया एक थी। हिटलर के पतन के बाद इजराइल अस्तित्व में आया। उस फैसले में सोवियत रूस भी शामिल था। मामले की गंभीरता और जटिलता का हल इतिहास को समझे बगैर नहीं निकाला जा सकता। दरअसल, यहूदियों के देश के रूप में जिस इजराइल का गठन हुआ, वह खाली इलाका नहीं था। उसमें अरब बस चुके थे। इजराइल के गठन के बाद उनके कष्टों का दौर शुरू हुआ। इसलिए फिलस्तीन और इजराइल के बीच हमेशा अघोषित युद्ध चलता रहता है। गाजा में हिंसा का ताजा दौर दो इजराइली किशोरों की हत्या से शुरू हुआ। इसके बाद एक फिलस्तीनी युवक की भी हत्या हुई और फिर इजराइल ने इकतरफा युद्ध शुरू कर दिया, जो थमने का नाम नहीं ले रहा।

हम यह मानने को तैयार हैं कि आतंकवाद का उदय अन्यायपूर्ण व्यवस्था का ही परिणाम है। लेकिन उपाय क्या है? हम गांधी के रास्ते चलें, शांतिमय तरीकों से विवादों को हल करने वाली सभ्य दुनिया बनाएं। कम से कम उसके पक्ष में जनमत बनाने का काम करें। यह एक सतत चलने वाला कार्य है। हम तो हर तरह के आतंकवाद के विरोधी हैं, लेकिन जो लोग किसी भी वजह से इसका समर्थन करते हैं, क्या वे इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि आतंकवादी कार्रवाई की शिकार महिलाएं और मासूम बच्चे नहीं होंगे? दुनिया अब पहले जैसी सरल नहीं रही। हम निर्मम पूंजीवादी व्यवस्था में पहुंच चुके हैं जहां हथियारों के सौदागरों की एक शक्तिशाली जमात पैदा हो चुकी है, जिन्हें हर समय एक युद्ध पिपासु जमात चाहिए। इसका मुकाबला हम युद्ध का हर रूप में निषेध करके ही कर सकते हैं। अगर हम ऐसा नहीं करते तो गाजा में मारे जाने वाले बच्चों और महिलाओं के लिए आंसू बहाना टुच्ची भावुकता ही होगी।


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