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डब्ल्यूटीओ की राह PDF Print E-mail
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Monday, 28 July 2014 12:21

जनसत्ता 28 जुलाई, 2014 : दुनिया में विभिन्न देशों के बीच जैसी असमानताएं हैं और उनकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में जैसे फर्क हैं उन्हें देखते हुए सभी को एक वैश्विक व्यापारिक ढांचे में लाना कभी सहज नहीं हो सकता। इसलिए विश्व व्यापार संगठन के प्रस्तावित समझौतों की राह में रह-रह कर बाधाएं आती रही हैं। डब्ल्यूटीओ एक बार फिर गतिरोध के मुकाम पर आ खड़ा हुआ है। भारत की प्रतिनिधि अंजलि प्रसाद ने पिछले हफ्ते जिनेवा में हुई डब्ल्यूटीओ की महा परिषद की बैठक में ट्रेड फैसिलिटेशन एग्रीमेंट यानी व्यापार सरलीकरण समझौते को स्वीकार करने से मना कर दिया। पर भारत सैद्धांतिक तौर पर इस समझौते के खिलाफ नहीं है। उसने टीएफए को फिलहाल नामंजूर इसलिए किया, क्योंकि वह कृषि संबंधी उन प्रावधानों को मानने के लिए तैयार नहीं है जिन्हें अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ अमली जामा पहनाना चाहते हैं। विकसित देश चाहते हैं कि भारत टीएफए पर हस्ताक्षर कर दे, बाकी बातों पर आगे चर्चा की जाएगी। लेकिन भारत ने उचित ही यह रुख अख्तियार किया है कि इन मसलों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता, यह नहीं हो सकता कि जिन समझौतों में विकसित देशों की दिलचस्पी है उन्हें तो अंजाम दे दिया जाए, मगर विकासशील देशों की चिंताएं ठंडे बस्ते में डाल दी जाएं। अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ टीएफए को इसलिए मंजूर कराना चाहते हैं ताकि उन्हें दुनिया भर में अपनी बाजार-पहुंच बढ़ाने में सुविधा हो। लेकिन कृषि सबसिडी घटाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत अनाज की सरकारी खरीद सीमित करने के उनके प्रस्ताव ने टीएफए को अधर में लटका दिया है। 

भारत कृषि संबंधी उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, उसका कहना है कि इसे मान लेने से उसके किसानों को नुकसान होगा, साथ ही उसकी खाद्य सुरक्षा पर भी बुरा असर पड़ेगा। पिछले साल दिसंबर में इंडोनेशिया के बाली में हुए डब्ल्यूटीओ के नौवें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में भी यह विवाद छाया रहा था और एक समय लग रहा था कि दोहा दौर की वार्ताओं को पटरी पर लाने की सारी कोशिश धूल में मिल जाएगी। आखिरकार एक बीच का रास्ता निकाला गया; कृषि संबंधी मसविदे में ‘शांति अनुच्छेद’ शामिल किया गया, जिसमें कहा गया कि न्यूनतम समर्थन


मूल्य को कुल उपज के दस फीसद तक सीमित करने का प्रावधान ग्यारहवें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन तक लागू नहीं होगा, यानी इस प्रावधान को डब्ल्यूटीओ के विवाद निपटारा प्राधिकरण में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। डब्ल्यूटीओ का मंत्रिस्तरीय सम्मेलन हर दो साल पर होता है, यानी चार साल की छूट दी गई। पर भारत चाहता है कि इस बारे में अल्पकालीन नहीं स्थायी समाधान हो, और जब तक ऐसा नहीं होता, वह टीएफए को मंजूर नहीं करेगा। उसके इस रुख पर खासकर अमेरिका ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। हो सकता है अक्तूबर में होने वाली अगली बैठक में भी यह गतिरोध बना रहे। 

अपने देश के भी जो लोग कृषि सबसिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को बेकार का बोझ समझते और इससे पिंड छुड़ाने की वकालत करते रहे हैं, डब्ल्यूटीओ में भारत सरकार के रुख को सही नहीं मानते। उनकी दिलचस्पी सिर्फ आयात-निर्यात के उदारीकरण में है। मगर किसी भी बहुपक्षीय व्यापारिक करार के समय क्या इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिए कि उसका कृषि, किसानों और खाद्य सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा। फिर एक अहम सवाल संसद की संप्रभुता का भी है। खाद्य सुरक्षा कानून देश की संसद से पारित हुआ है। क्या डब्ल्यूटीओ का कोई ऐसा बंधन स्वीकार किया जा सकता है जो संसद से बने कानून के हाथ बांध दे? अगर विकसित देश डब्ल्यूटीओ का गतिरोध दूर करने के लिए चिंतित हैं तो वे कृषि उत्पादों को समझौता वार्ताओं से अलग रखने के लिए क्यों नहीं तैयार होते? 


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