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आइए हिंदू राष्ट्र की कल्पना करें PDF Print E-mail
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Monday, 28 July 2014 12:18

राजकिशोर

 जनसत्ता 28 जुलाई, 2014 : भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में निर्बाध सत्ता प्राप्त हो गई है।

जाहिर है, वह फूले नहीं समा रही है। योग्यता से अधिक प्राप्ति का विश्लेषण कौन करता है! हम सभी अपनी-अपनी योग्यता को बढ़ा-चढ़ा कर देखने लगते हैं। भारतीय जनता पार्टी भी पसोपेश में नहीं है न जिम्मेदारी के उस पहाड़ का अहसास कर रही है, जो नरेंद्र मोदी के निमित्त से उसके कमजोर कंधों पर आ पड़ी है। कुछ दिनों में वह पाएगी कि उसकी हैसियत पिंजरे में बंद तोते से अधिक की नहीं रह गई है। लेकिन इससे क्या। जब तक दाना-पानी तश्तरी पर रख कर उसे दिया जा रहा है, तब तक मगन रहने से उसे कौन रोक सकता है। जैसे कुछ साल पहले तक वामपंथी पश्चिम बंगाल में मस्त थे। जीवन की तरह राजनीति में भी जब मस्ती छाती है, तब भविष्य दूर की यात्रा पर निकल जाता है।

सभी समझदार लोग कहते हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी नहीं, हिंदू जनता पार्टी है। पर इस मुहावरे को भाजपा के नेता हमेशा काटते रहते हैं। चोर की दाढ़ी में तिनका ऊंची आवाज में बोलता है। जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को राष्ट्रीय मानता है, वैसे ही भारतीय जनता पार्टी भी अपने को भारतीय मानती है। दरअसल, ये जिस संप्रदाय के लोग हैं, उसमें राष्ट्रीयता, भारतीयता और हिंदू सांगठनिकता को एक ही सत्य के विभिन्न रूप माना जाता है। एकम् सत् विप्रा: बहुधा वदंति। लेकिन यही बहुतों के मन में उपस्थित डर को दुगुना कर देता है। वे सोचते हैं, इस प्रचंड बहुमत का उपयोग भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने में किया जाएगा। मुझे ऐसी कोई आशंका नहीं है। छिटपुट बूंदाबांदी होगी, पर उसे बारिश नहीं कहते। 

मैं अपने को हिंदू नहीं मानता, क्योंकि धर्म मात्र में मेरी आस्था नहीं है। इसी आधार पर दूसरों से भी यही उम्मीद करता हूं कि वे अपने को मुसलमान, सिख या ईसाई न मानें। सीधे-सीधे आदमी कहने में क्या हर्ज है। क्या यह कि आदमी को भी मुयस्सर नहीं इनसां होना? लेकिन तब तो अपने को हिंदू या मुसलमान या सिख मानने में भी मुश्किल होगी। क्योंकि कोई भी धर्म यह नहीं कहता कि गुंडा बनो, नीच बनो, या व्यभिचारी बनो। अगर ऐसा कहता होता, तो उसे धर्म होने की मान्यता ही नहीं मिलती। मनुष्य स्वभाव से न गुंडा है, न नीच है, न व्यभिचारी। वह भी अन्य जीव-जंतुओं की तरह एक स्वार्थी या यह शब्द अच्छा न लगे तो अपना खयाल रखने वाला जीव है। धर्म ने उसे ज्यादा ऊंचा बनाने के चक्कर में कुछ नीचा जरूर बना दिया है। किसी भी जंगल में पशु-पक्षियों के बीच सांप्रदायिक दंगे नहीं होते न ही एक प्रजाति या सभी प्रजातियां मिल कर किसी एक प्रजाति को नष्ट कर देने या दूसरे दरजे का नागरिक बनाने की कोशिश करती हैं। ये सब मनुष्यता के कुछ चेहरे हैं। 

ईसाई राज्य अनेक हैं। लेकिन एक भी राज्य ईसाई नहीं है। पगलेट विचारक जॉर्ज बरनार्ड शॉ ने पूछा है कि किस ईसाई राज्य में बाइबिल के दस परमादेशों का पालन होता है? पांचवां परमादेश है- तुम हत्या नहीं करोगे। राज्य से लोग डरते ही इसलिए हैं कि उसके पास हत्या करने की, वैध या अवैध, शक्ति है। ईसा मसीह कहते हैं, फैसला मत करो, नहीं तो तुम्हारे बारे में भी फैसला किया जाएगा। इसे स्वीकार कर लिया जाए, तो सभी अदालतें बंद कर देनी होंगी, क्योंकि जज फैसला ही तो करता है। 

इसी तरह, इस्लामी राज्य भी कई हैं, लेकिन हजरत साहब की वाणी को याद किया जाए, तो शायद ही किसी देश को इस्लामी देश कहा जा सकता है। ‘अहिंसा विश्वकोश’ (संपादक: नंदकिशोर आचार्य) में मोहम्मद सलीम इंजीनियर बताते हैं- ‘कुरआन में बार-बार कहा गया है कि ईश्वर हिंसा (फसाद) करने वालों को पसंद नहीं करता। ह. मुहम्मद ने कहा है कि जो तुमसे न लड़े, उससे मत लड़ो। औरतों, बच्चों और ईश्वर की भक्ति में लगे लोगों पर कदापि हाथ न उठाओ।’

यहां तक कि ‘केवल शौक और मनोरंजन के लिए जानवरों को सताना, शिकार करना, उनके शरीर को दागना, बिना वास्तविक आवश्यकता खाने आदि के लिए जानवरों को मारना बहुत बड़ा अपराध है।’ (वही) इस और मुहम्मद साहब की अन्य शिक्षाओं पर कौन-सा इस्लामी राज्य जायज ठहरता है? मैं यह नहीं कहता कि ईसाई राज्य या इस्लामी राज्य बनाया ही नहीं जा सकता। बनाया जा सकता है, लेकिन तब आज से बहुत ज्यादा ज्यादा सभ्य होना पड़ेगा। कुछ मामलों में आज से और ज्यादा असभ्य होना होगा। कहना न होगा कि किसी धर्म का अनुयायी बनना सभ्य बनने से ज्यादा आसान है। मनुष्य के बारे में कहा ही गया है कि कठिन और आसान के बीच चुनना हो तो वह लगभग हमेशा आसान को चुनता है।

इस तर्क पद्धति को स्वीकार किया जाए, तो हिंदू राष्ट्र बनाना भी आसान नहीं होगा। अव्वल तो हम हिंदू हैं, यह बात हिंदुस्तान के अच्छे दिनों में कभी नहीं कही गई। दरअसल, हम अपना नाम ही नहीं लेते थे, क्योंकि हमने अपना कोई नाम ही नहीं रखा था। नाम इसलिए नहीं रखा था कि इसकी जरूरत ही महसूस नहीं होती थी। फिर भी हमारे लोग, जैसे व्यापारी, साधु, पर्यटक, विदेश तो जाते ही थे। वे अपने को न हिंदू बताते थे, न कुछ और। लेकिन कुछ कहना तो पड़ता ही था। तो वे कहते थे, हम आर्यावर्त से आ रहे हैं। यह आर्यावर्त शब्द, जिसका विरोधी नहीं, पूरक शब्द है दक्षिणावर्त, आज भी पूजा-पाठ के श्लोकों में सुनाई पड़ जाता है- जंबूद्वीपे, आर्यावर्ते, भारतखंडे...। 

आर्यावर्त भी एक समस्या है। आर्य जन यहीं की उपज थे या कहीं बाहर से आए थे, यह तय किए बिना भी यह स्वीकार किया जा सकता है कि जब भारत में खेती का प्रचलन शुरू हो गया और स्थायी बसाहटें बन


गर्इं, तब न कोई आर्य रह गया न अनार्य। सभी एक-दूसरे से घुल-मिल गए। बाहर से आने वाले भी बहुत अधिक दिनों तक अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं कर सके। फिर भी आर्यावर्त शब्द चलता रहा तो इसीलिए कि हमारे पुराने पूर्वज अपने को आर्यों की संतान ही मानते थे। बाद में, बाहर से आने वाले समुदायों को अनार्य कहा जाने लगा। अनार्य में अपमान था। यवन शब्द तटस्थ है। हिंदू उत्थान के दिनों में विदेशियों के लिए इस शब्द का खूब प्रयोग किया गया। जयशंकर ‘प्रसाद’, रामकुमार वर्मा और लक्ष्मीनारायण मिश्र के नाटकों में यवन शब्द का प्रयोग क्या पचास बार भी नहीं हुआ होगा? 

हमें हिंदू बनाया अरबों, तुर्कों और मंगोलों (मंगोल से ही मुगल बना है) ने। उनके आने के पहले भारतीय समाज में अंत:विभाजन नहीं था। चूंकि देश में अनेक ऐसे समुदाय बन गए जो अपने को यहां के मूल निवासियों से भिन्न मानते थे और उन सब की सामूहिक पहचान के लिए अलग-अलग नाम थे, इसलिए हम अपनी और उनकी दोनों की सुविधा के लिए हिंदू हो गए। 

लेकिन सवाल यह है कि हिंदू होने से आज समझा क्या जाए? हम आर्य संस्कृति के अनुयायी हैं, क्या ऐसा कहा जा सकता है? दयानंद सरस्वती ने आर्य धर्म को फिर से स्थापित करने का प्रयत्न किया था, लेकिन आर्यसमाजियों और वेदकालीन आर्यों के बीच कोई समानता दिखाई नहीं पड़ती। आर्य मूर्तिपूजक नहीं थे, पर देवोपासक तो थे ही। क्या आज उस तरह का आर्य बना जा सकता है? क्या यह हमारे लिए ठीक भी रहेगा? किसी भी बीत गई संस्कृति का आवाहन करने पर उसके प्रतिनिधि नहीं, उसके प्रेत आते हैं। प्रेतों के साथ जीना बहुत कठिन है। वे प्यार कम करते हैं, धमकाते ज्यादा हैं। सुना है, उन्हें खून पीने का भी शौक है।

इससे भी विकट सवाल यह है कि हिंदुओं के पास बाइबल और कुरआन जैसी कोई किताब नहीं है। हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए एक हिंदू संविधान भी तो चाहिए। शॉ ने अर्थशास्त्रियों के बारे में कहा है कि उन्हें एक जगह बिठा कर बंद कर दो, तब भी वे कोई एक राय लेकर बाहर नहीं निकलेंगे।

उनके बारे में भी यही बात कही जा सकती है जिन्हें हिंदू संविधान बनाने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। वे एक-एक बात पर जोर-जोर से लड़ेंगे और अपने अनंत मतभेदों के जरिए यह सिद्ध कर देंगे कि हिंदू कोई धर्म नहीं है, एक स्वायत्त, स्वतंत्र और सर्व-समावेशी जीवन शैली है। सर्वोच्च न्यायालय जिसे‘जीवन शैली’ बता कर रह गया था। शैली जो भी हो, उसकी कुछ अंतर्वस्तु तो होगी। संविधान की तरह अगर अदालत भी हिंदू को परिभाषित नहीं करती, तो इस विषय पर कागज-स्याही खर्च करना बेकार है। 

हिंदू धर्म में जीवन शैली के लक्षण ग्रंथ नहीं हैं, पर आचार संहिताएं हैं जिन्हें स्मृतियां कहा जाता है। प्रसिद्ध मनु की स्मृति हुई, पर कई दूसरी स्मृतियां उससे अधिक सुसंगत और प्रगतिशील हैं। क्या इनमें से किसी स्मृति को भारत के नए संविधान का दरजा दिया जा सकता है? किसी भी स्मृति पर राष्ट्रीय सहमति न कभी हुई थी, न कभी होगी। सबसे बड़ी मुश्किल लोकतंत्र की है। बाइबल और कुरआन की तरह किसी भी हिंदू धर्मग्रंथ में लोकतंत्र की कल्पना नहीं की गई है। लेकिन आज के समय में वंश-परंपरा पर आधारित राजतंत्र की स्थापना कैसे होगी? राजा हम कहां से लाएंगे? क्या सम्राट भरत का कोई वंशधर कहीं छिप कर अपने समय का इंतजार कर रहा है?

अक्सर कहा जाता है कि हिंदू मजहब या रिलीजन के अर्थ में धर्म नहीं है, न उसे होना चाहिए। यही तो भारत की मनीषा है कि उसने धर्म को किसी मूर्ति, किसी पुस्तक, किसी मंदिर या स्तूप में नहीं खोजा, बल्कि मनुष्य के अंत:करण में खोजा। जैसे मनुस्मृति का वह प्रसिद्ध वाक्य, जिसमें धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं- धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध)। याज्ञवल्क्य धर्म के नौ लक्षण बताते हैं- अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इंद्रिय-निग्रह (इंद्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया और शांति। मनु ने अहिंसा की गिनती नहीं की है, पर उनकी बातें मानी जाएं, तो हिंसा हो ही नहीं सकती। महाभारत में भी धर्म के ऐसे ही लक्षण बताए गए हैं, जबकि तुलसीदास एक शब्द में कहते हैं- परहित सरिस धरम नहिं भाई।  

क्या यह प्रश्न पूछने लायक नहीं है कि अगर धैर्य, अहिंसा, संयम, इंद्रिय निग्रह आदि ही धर्म हैं, तो फिर इसमें क्या हिंदू और क्या गैर-हिंदू। क्या दूसरे धर्मों के शिक्षकों ने धैर्य की जगह अधैर्य, अहिंसा की जगह हिंसा, संयम की जगह असंयम आदि को अपनाने पर जोर दिया है? क्या ये सहज मानव गुण नहीं हैं? इन्हें सिर्फ हिंदू धर्म का लक्षण बताना क्या दुनिया के बाकी सभी धर्मों का अपमान करना नहीं है, जिसकी सीख हमारे किसी भी पुरखे ने नहीं दी है। यह समझ में नहीं आता कि वे हिंदू राष्ट्र हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों, धर्मग्रंथों, भजनों, दोहों, चौपाइयों से नहीं लाएंगे तो कहां से लाएंगे?


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