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नायक खलनायक PDF Print E-mail
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Monday, 28 July 2014 12:14

संजीव चंदन

जनसत्ता 28 जुलाई, 2014 : हम सवर्ण थे, इसलिए सवर्णों के टोले में रहते थे। हमारा गांव ‘हिट लिस्ट’ में था, ऐसी चर्चा होती थी। हालांकि वह किसी जनसंहार से बचा रहा। बचपन की धुंधली स्मृतियों में दो पक्षों के बीच कई बार हुई गोलीबारी याद आती है। गांव की सीमा पर कई-कई टॉर्च की रोशनी जब फैलती तो हमें यह बताया जाता कि नक्सलाइट जा रहे हैं। नक्सलाइट हमारे लिए किसी रहस्य-लोक के खलनायक थे। उन दिनों हम बच्चों के हीरो थे महेंद्र सिंह, मुखियाजी का बेटा, जो गांव के सबसे बड़ी जोत के मालिक थे। वही गांव के ‘सेनापति’ भी थे। हम बच्चों के बीच इस तरह के किस्से होते कि कैसे महेंद्र सिंह दोनों हाथों से बंदूक चलाते हैं! रह-रह कर गांव में पुलिस की छावनी लग जाती, जिनका ठिकाना होता हमारा स्कूल। तब पंचायत भवन नहीं बना था। तो महेंद्र सिंह हमारे बालमन के पहले नायक थे। यों हम डाकू-सिपाही के खेल में फूलन देवी का खेल भी खेलते थे, लेकिन बहादुरी के लिए हमारे प्रत्यक्ष रूपक थे महेंद्र सिंह।

फिर गांव छूट गया, हम शहर आ गए। यहां हमारा नायक दूसरे रूप में तैयार बैठा था। शहर में गांवों से सवर्णों की नई-नई कॉलोनियां बस रही थीं, वहां भी जाति या वर्ण के नायक मौजूद थे। लेकिन जब तक शहर हमारे ऊपर इन नायकों के साथ हावी होता, मैं साहित्य पढ़ने लगा था। पिता अपनी युवावस्था में थे, दिनकर की ‘जाति-जाति रटते हैं, जिनकी पूंजी केवल पाखंड’ पढ़ते थे। ‘रश्मिरथी’ उन्हें कंठस्थ है। यह सब अंतर्मन में घट रहा था। बाहर शहर और राज्य में वे लोग ‘नायक’ की हैसियत हासिल करने लगे थे, जो हाशिये पर थे। लेकिन अब तक मेरा मन इन नायकों से विरक्त हो चुका था। घर अराजनीतिक था, इसलिए मेरा कोई राजनीतिक विकास नहीं हो सका। नौवीं या दसवीं में था, तो शहर में किसी अंतरविद्यालय स्तर की बहस में मुझे सुनने के बाद एमसीसी से सहानुभूति रखने वाले किसी व्यक्ति ने अपनी मीटिंग में आने को कहा था। हालांकि मैं जा नहीं सका, लेकिन साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आने-जाने लगा था। पिता खुद भी कविताएं लिखते थे। मंच पर जमते भी थे। इसलिए घर पर भी एक साहित्यिक प्रभाव था।

किशोर जीवन का एक बड़ा हिस्सा नानी के यहां बीता। अपने गांव से लगाव कम था। नानी के यहां ज्यादातर मौसियों, नानियों और मामियों के बीच ही सहज था मैं। यह गांव सभी जातियों का गांव था। ज्यादा संख्या पिछड़ी जाति के लोगों की थी। बाजार था, एक बड़ा बागीचा और वहां सूर्य मंदिर, जहां छठ पूजा का बड़ा आयोजन


होता था। बगीचे में बड़ी सभाएं होती थीं, जिन्हें पुलिस पसंद नहीं करती थी। गांव के बाजार के पास के पुलिस चौकी से राइफलें भी लूटी गई थीं, लेकिन गांव में कभी तनाव नहीं रहा। यहां परिवेश ही नहीं था ऐसा कि कोई महेंद्र सिंह हमारा नायक बने। इसलिए यहां हमारी पसंद थे खूबसूरत, हंसमिजाज रामजी मामा। मिलनसार थे, लड़कियों के बीच लोकप्रिय भी। मुझसे आठ-दस साल बड़े होंगे, लेकिन मित्रवत व्यवहार करते थे। शायद यही आकर्षित करता हो मुझे! इनके घर पर मुझे काफी प्यार मिलता था।

गांवों में मेरे बचपन के इन नायकों का क्या हश्र होता गया! गांव अपनी गति में बदलते गए हैं। रामजी मामा बेरोजगार रह गए। पढ़ाई भी उन्होंने ऐसे नहीं की थी कि कोई खास नौकरी मिल जाए। कुछ साल पहले जब नानी के घर जाना हुआ तो मैं उन्हें पहचान नहीं पाया। वे हड्डियों का ढांचा बन गए थे। दारू और गांजा पहले से पीते थे, इधर लगन शायद ज्यादा लग गई थी। वह लड़की याद आई, जिन्हें वे चाहते थे। वह भी उन्हें लुक-छिप कर देखना चाहती थीं। गांवों के सवर्ण ढांचे में भी वह अंतरजातीय प्रेम था- रामजी मामा भूमिहार और लड़की ब्राह्मण।

और महेंद्र सिंह! वे आज भी मिजाज से बुलंद हैं, लेकिन वह शान नहीं रही। अब भी कई बीघा जोत के मालिक हैं। उनके ही रिश्ते में जिन लोगों ने समय के चक्र को समझा, वे नई पूंजी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाते चले गए, नौकरियां हासिल कीं, व्यापार बढ़ाए। दैनिक व्यवहार में औरों की तुलना में ज्यादा विनम्र रहे महेंद्र सिंह गांव में तिकड़मों से दूर रहे। वे धीरे-धीरे हारे हुए योद्धा में तब्दील होते गए हैं। मेरे मानस से तो इन दोनों ही नायकों के नायकत्व का अवसान बहुत पहले हो चुका था। अब यह ठीक-ठीक कह पाना भी संभव नहीं है कि वे नायक थे या ‘खलनायक’!


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