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अप्रासंगिक : आप ठीक तो हैं! PDF Print E-mail
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Sunday, 27 July 2014 10:23

altअपूर्वानंद

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : भारत सरकार ने फिलस्तीनी जनता पर नए इजराइली हमले और गाजा पट्टी में लोगों के कत्लेआम पर संसद में चर्चा करने से इनकार किया। विदेश मंत्री का तर्क था कि इजराइल और फिलस्तीन, दोनों भारत के मित्र हैं, इसलिए इसका ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि दोनों में से किसी के प्रति असम्मानजनक शब्द चर्चा में न निकल जाए। तात्पर्य यह भी था कि हम दोनों में से किसी का पक्ष लेते हुए न दीख जाएं। बाद में जब चर्चा हुई भी तो बड़ी कमजोर और सरकार ने ऐसा कोई प्रस्ताव लेने से इनकार कर दिया, जिसमें 2014 के हमले के लिए इजराइल की आलोचना की जाती। कहा गया कि हालांकि परंपरागत रूप से भारत फिलस्तीन का समर्थक रहा है, लेकिन हम इजराइल के साथ रिश्तों में खटास नहीं आने देना चाहते। 

इधर भारत की विदेश मंत्री गाजा पट्टी में इजराइली खूंरेजी के दरम्यान फिलस्तीन और इजराइल के बीच संतुलन साधने की कोशिश में लगी थीं और शासक दल के सांसद इजराइल की जगह फिलस्तीनी संगठन ‘हमास’ पर हमला करने में जुटे थे, उधर भारत ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के एक प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए, जिसमें न सिर्फ अभी के इजराइली हमलों की सख्त आलोचना की गई है, बल्कि उसे साफ-साफ आक्रामक भी कहा गया है और उसकी निंदा यह कहते हुए की गई है कि उसने अब तक गाजा पर अपने कब्जे को खत्म नहीं किया है। यह प्रस्ताव मामूली नहीं है, क्योंकि इसमें गाजा पट्टी में युद्ध-अपराध की जांच की बात भी कही गई है, जिसकी मांग इजराइल के खिलाफ फिलस्तीनी जनता करती आ रही है। इस प्रस्ताव के खिलाफ सिर्फ एक देश ने मत दिया और उसका नाम जानने के लिए किसी विशेष मेधा की आवश्यकता नहीं है। 

भारत का आधिकारिक स्वर कौन-सा है? और क्या भारत की सरकार और संसद के बीच संबंध टूट गया है? क्या भारत सरकार संसद को यह कह रही है कि संवेदनशील विषयों पर बात करने की सलाहियत उसकी नहीं है और उसे यह सब प्रधानमंत्री पर छोड़ देना चाहिए? या भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय, जहां से संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव के समर्थन का निर्णय किया गया होगा और भारत के विदेश मंत्रालय के बीच कोई तालमेल नहीं है? या, भारत दोमुंहेपन का धोखे से भरा खेल खेल रहा है? क्या भारत सरकार इजराइल को यह संदेश देना चाहती है कि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव का मात्र सांकेतिक महत्त्व है और उसे बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है? हमारा असली संकल्प तो इससे प्रकट होता है कि हमने अलग से एक देश की तरह, अपनी जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि सभा से आपकी शान के खिलाफ एक शब्द भी निकलने नहीं दिया। 

भारत नामक राज्य राष्ट्र में शायद ही कभी राज्य और जनता एकमेक हो गई हो! राज्य की बाध्यता को जनता ने अपनी नैतिकता की सीमा बनाने से हमेशा इनकार किया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से कुछ बदल रहा है। वह बदलाव आपको फेसबुक या सोशल मीडिया में इजराइली हमले की चर्चा पर की जा रही टिप्पणियों से पता चलता है। प्राय: हिंदू नामों से की जा रही टिप्पणियां इजराइल के हमले का औचित्य खोजती दीख पड़ती हैं। वे बच्चों-औरतों के मारे जाने को उचित भले न ठहराएं, इजराइली आक्रामकता में आनंद लेती जान पड़ती हैं। क्या इसकी वजह यह है कि फिलस्तीनी आबादी वास्तव में इस्लाम मतावलंबियों की है? मुसलमानों को कमतर इंसान या एक सांस्कृतिक मलबा मानने के कारण उसकी सफाई में इजराइली दृढ़ता के चलते भारत के हिंदू उसका रुआब मानने लगे हैं। मुसलमानों को एक कुदरती भूल या विपर्यय मानने के कारण ही उनके साथ दोयम दर्जे का बर्ताव, जैसे देश में वैसे ही बाहर, उचित जान पड़ता है। भारत का हिंदू मन इसी कारण इजराइल को अपना आदर्श देश मानने लगा है। 

यह विडंबनापूर्ण लग सकता है कि इस हिंदू मन की प्रतिनिधि संस्था एक समय हिटलर को अपना आदर्श मानती थी। वह हिटलर, जिसने आर्य रक्त की शुद्धता के लिए यहूदियों को धरती की गंदगी मान कर उनके आखिरी सफाए का सरंजाम किया था और जिसे एक तरह से इजराइल की आज की शक्ल के लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए। अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ


के लिए वही इजराइल आदर्श है, जहां उसके पूर्व आदरणीय हिटलर का नाम लेना अपराध है। लेकिन यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि इजराइल ने हिटलर को ही अपना आईना बना लिया है। वह शायद इस मामले में विलक्षण है कि वह इजराइलियों का नहीं, बल्कि यहूदियों का देश है। 

दुनिया भर में, यहूदी जहां भी हों, इजराइली नागरिकता के हकदार हैं और उन्हें अपनी दैवी भूमि पर लौटने का हक है। यही तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भारत का सपना है: कि वह भारतीयों का नहीं हिंदुओं का देश हो। जिस तरह इजराइल उस भूभाग को यहूदियों की दैवी भूमि घोषित कर उस पर अपना पहला और अंतिम अधिकार घोषित करता है, वैसे ही भारत पर हिंदू मात्र का दैवी अधिकार मानने वालों के हाथ में अभी इस देश के शासन की बागडोर है। ध्यान रहे कि फिलस्तीनियों ने कभी नहीं कहा कि उनके फिलस्तीन में यहूदियों को या ईसाइयों को रहने का अधिकार नहीं होगा।  

इजराइल खुद को लोकतंत्र कहता है, लेकिन वहां के अरब दोयम दर्जे के नागरिक हैं। और वह कानूनी तौर पर। यही तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के मुसलमानों के बारे में चाहता रहा है। चूंकि हिटलर की तरह वह उनका अंतिम निपटारा नहीं कर सकता, इजराइल की तरह उन्हें उनकी औकात में तो रख ही सकता है। लेकिन पूर्ण बहुमत में आ जाने पर भी भारतीय जनता पार्टी के लिए यह राह लेना इतना आसान नहीं लग रहा है। भारत के उपनिवेशवादी आंदोलन का सांस्कृतिक दबाव अभी बना हुआ है। भारत की अपनी कल्पना सख्त राज्य की नहीं रही थी। लेकिन 2020 तक भारत को विश्व की महाशक्ति बनाने का एपीजे अब्दुल कलाम का संदेश काफी लोकप्रिय हुआ और उनके मुसलमान होने के बावजूद हिंदुओं में उनकी लोकप्रियता से हिंदू मन के बदलने का संकेत मिलता है। 

पाकिस्तान को जब जी चाहे सबक सिखाने की दमित इच्छा की पूर्ति इजराइल द्वारा नियमित रूप से गाजा की जनता के संहार से पूरी होती है। एक तरह से इजराइल वह कर रहा है, जो भारत नहीं कर पा रहा है। वह मुसलिम देशों के बीच अपनी शर्त पर रह रहा है। उसका संरक्षक अमेरिका इसके लिए बाध्य है कि इजराइल के हर कृत्य का समर्थन और अंतरराष्ट्रीय रोष से उसकी रक्षा करे। अमेरिका और इंग्लैंड इस मामले में खुद अपने जनमत की अवहेलना करते हैं। वहां शासन किसी का हो, इजराइल की ताकत भारत के हिंदुओं में संभ्रम का भाव पैदा करती है। ऐसा ही भारत तो हम बनाना चाहते हैं। 

मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि भारत में आ रही इस कठोरता को संपूर्ण हिंदू मन पर आरोपित करना ठीक नहीं। लेकिन उन्हें स्वयं इस पर विचार करना होगा कि जो मन भागलपुर, बाबरी मस्जिद के ध्वंस, गुजरात या मुजफ्फरनगर में मुसलमानों की हत्या से विचलित नहीं होता, बल्कि उसका औचित्य तलाश करता है, वह दरअसल खुद भारत में ऐसे गाजा-क्षेत्रों की कल्पना करता है, जिस पर पूरी तरह हिंदू नियंत्रण हो। 

हिंदू अक्सर मुसलमानों को अपना सुधार करने की सलाह देते रहते हैं, लेकिन बलात्कार और हत्या से विचलित होना तो दूर, उसे वाजिब ठहराते हैं। उन्हें अब यह सोचने की जरूरत है कि खुद को मानवीयता से वंचित कर वे अपना क्या कर रहे हैं! उनके पास इस सवाल का क्या उत्तर है, जो गाजा की जनता पूछ रही है, ‘यहां हम गाजा में बिल्कुल ठीक-ठाक हैं, आप अपनी आत्मा का हाल बताइए।/ हमारे शहीद मलबे में दबे हैं और हमारे बच्चे तंबुओं में रह रहे हैं और वे पूछते हैं, आप ठीक तो हैं?’


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