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निनाद : पाठ और पूर्वग्रह PDF Print E-mail
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Sunday, 27 July 2014 10:20

altकुलदीप कुमार

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : गुजरात में जो कुछ भी होता है, उसे बहुत ध्यान से देखा जाना चाहिए, क्योंकि गुजरात मॉडल को पूरे देश में लागू करने की बात बहुत दिनों से की जा रही है और यह बात करने वाले अब पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ चुके हैं। खबर है कि गुजरात में कक्षा एक से पांच तक के छात्रों को पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध न करा कर राज्य सरकार ने शिक्षा बचाओ आंदोलन को मजबूत बनाने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। उसने ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति’ के अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखित नौ पुस्तकों के सेट को राज्य के बयालीस हजार प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में पूरक साहित्य के तौर पर मुफ्त बांटने का फैसला किया है। इन विद्यालयों को जारी निर्देश में कहा गया है कि ये पुस्तकें उत्कृष्ट शिक्षा के उद्देश्य से उपलब्ध कराई जा रही हैं। इन्हें स्कूलों के अलावा सार्वजनिक पुस्तकालयों को भी मुफ्त दिया जाएगा। 

दीनानाथ बत्रा वही हैं, जिन्होंने वेंडी डोनिगर की किताब के खिलाफ मुकदमा करके प्रकाशक पेंगुइन को उसे वापस लेने और उसकी सभी प्रतियों की लुगदी बनाने पर विवश कर दिया था। यह भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने से पहले हुआ था। अब तो भाजपा के जरिए खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सत्ता में है। जब-जब भाजपा सत्ता में आती है, इतिहास पर सरकारी हमला शुरू हो जाता है। जब वह सत्ता में नहीं होती, तब संघ के अनेक आनुषंगिक संगठनों के जरिए यह काम लगातार किया जाता है। 1970 के दशक के अंत में संघ ने ‘इतिहास संकलन समिति’ का गठन किया था, जिसका उद्देश्य ‘भारतीय’ दृष्टि से इतिहास लेखन को प्रोत्साहन देना था। समय-समय पर इसकी ओर से विभिन्न स्थानों पर संगोष्ठियां और कार्यशालाएं आयोजित की जाती थीं और उनमें कुछ सिफारिशों को अंतिम रूप देकर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीइआरटी) को क्रियान्वयन के लिए भेज दिया जाता था। 

आमतौर पर ये सिफारिशें इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव के बारे में होती थीं। मसलन, हड़प्पा सभ्यता सिंधु-सारस्वत सभ्यता है और आर्य बाहर से नहीं आए थे, हड़प्पा सभ्यता और वैदिक सभ्यता में कोई अंतर नहीं है और हड़प्पन लोग दरअसल आर्य ही थे, आदि। शुरू में इस समिति का कामकाज संघ के वरिष्ठ नेता मोरोपंत पिंगले की देखरेख में चलता था और इतिहासकार और पुरातत्त्वविद स्वराज प्रकाश गुप्त इसके साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े थे। उनके मार्गदर्शन में भगवान सिंह ने हिंदी में इन विषयों पर पुस्तकें भी लिखीं। 

इन इतिहासकारों को शिकायत है कि भारतीय इतिहास लेखन पर मार्क्सवादियों का कब्जा है और वे पश्चिमी उपनिवेशवादी इतिहास लेखन से बुरी तरह प्रभावित हैं। वास्तविकता यह है कि अपने से भिन्न विचार वाला हर इतिहासकार इन्हें मार्क्सवादी लगता है। ये रोमिला थापर को भी मार्क्सवादी मानते हैं, जबकि हकीकत यह नहीं है। इनका आरोप रहा है कि सरकारी संस्थानों के जरिए मार्क्सवादी इतिहासकारों ने एक खास किस्म के इतिहास को बढ़ावा दिया है और न केवल ‘राष्ट्रीय’ दृष्टिकोण से इतिहास लिखवाया गया, बल्कि जिन्होंने लिखा भी, उनकी जानबूझ कर उपेक्षा की गई। 

लेकिन अब अच्छे दिन आ गए हैं। गुजरात में बहुत पहले आ गए थे, शेष देश में अब आए हैं। लेकिन गुजरात में भी दीनानाथ बत्रा जैसे शिक्षा बचाने में लगे विचारकों की किताबें सरकारी पैसे यानी जनता के पैसे से खरीद कर मुफ्त वितरित करने का काम अभी शुरू किया जा सका है। ‘उत्कृष्ट शिक्षा’ को बढ़ावा देने वाली इन पुस्तकों में बच्चों को बताया गया है कि अखंड भारत सत्य है, विभाजित भारत झूठ है। भारत का विभाजन अप्राकृतिक है और उसे फिर से एक किया जा सकता है। ‘छात्रो, आप भारत का नक्शा कैसे बनाओगे? क्या आपको मालूम है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, बांग्लादेश, श्रीलंका और बर्मा अविभाजित भारत के अंग थे? ये देश अखंड भारत का हिस्सा हैं।’ जिन स्कूलों में हर धर्म के बच्चे पढ़ते हैं, उनमें सरकार द्वारा मुफ्त बांटी जाने वाली किताबों में निर्देश दिया गया है कि जन्मदिन पर केक काटना और मोमबत्तियां बुझाना ‘शुद्ध भारतीय संस्कृति’ के खिलाफ है। ‘हमें स्वदेशी वस्त्र पहनने चाहिए, हवन करना चाहिए और इष्टदेवता से प्रार्थना करनी चाहिए, गायत्री मंत्र जैसे मंत्रों का जाप करना चाहिए, जरूरतमंदों को वस्त्र देने चाहिए, गाय को रोटी खिलानी चाहिए, प्रसाद बांटना चाहिए और दिन का


अंत विद्या भारती द्वारा बनाए गए गीतों के गायन के साथ करना चाहिए।’ 

पाकिस्तान के स्कूलों की भी एक जमाने में यही हालत थी, और शायद आज भी हो। ‘पाकिस्तान स्टडीज’ के पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को बार-बार रटाया जाता था कि पाकिस्तान ‘इस्लाम का किला’ है, इंडियन नेशनल कांग्रेस हिंदुओं ने अपने हितों की हिफाजत के लिए गठित की थी और 1857 की लड़ाई मुसलमानों द्वारा अपनी आजादी हासिल करने के लिए लड़ी गई आखिरी लड़ाई थी। जाने-माने पाकिस्तानी इतिहासकार केके अजीज ने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसका नाम था ‘द मर्डर आॅफ हिस्ट्री’ (इतिहास की हत्या)। वहां के स्कूलों में छात्रों को पढ़ाया जा रहा था कि पंडित नेहरू के यह कहने पर कि ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिलने के बाद हिंदुस्तान में हिंदुओं की हुकूमत होगी, कायदे आजम जिन्ना ने कहा कि मुसलमानों की अलग हुकूमत होनी चाहिए। बांग्लादेश बनाने का कारण यह था कि भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में दंगे करवा दिए थे और इसके बाद चारों ओर से हमला कर दिया था। इसलिए पाकिस्तान को मजबूरन भारत के साथ एक और युद्ध लड़ना पड़ा। यह लड़ाई दो सप्ताह चली और इसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश बन गया। 

यह है पाकिस्तान के ‘राष्ट्रीय दृष्टिकोण’ से लिखा गया इतिहास। वहां शायद कम लोगों को यह मालूम हो कि जब अल्लामा मोहम्मद इकबाल ने 1924 में लाहौर के इस्लामिया कॉलेज के हबीबिया हॉल में इत्तेहाद पर अपनी पहली थीसिस पढ़ी थी, तो पारंपरिक उलेमा ने उन्हें तत्काल काफिर घोषित कर दिया था, और मौलवी अबू मुहम्मद दीदार अली ने उनके ‘धर्मद्रोही’ होने के बारे में फतवा भी जारी कर दिया था। पाकिस्तान में आज कहीं इस बात की चर्चा नहीं होती कि इकबाल हुदूद कानूनों के खिलाफ थे, जिन्हें जनरल जिया उल-हक के शासनकाल में लागू किया गया था। पाकिस्तान में बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि मोहम्मद अली जीनाभाई पूंजा ने ही अपना नाम बदल कर मुहम्मद अली जिन्ना कर लिया था। न ही उन्हें जिन्ना की शादी के बारे में बताया जाता है। और यह तो कतई नहीं कि जब उनकी पत्नी रुट््टी जिन्ना की मृत्यु हुई तो उनका अंतिम संस्कार शिया रस्मों-रिवाज के मुताबिक किया गया था। 

वैचारिक या धार्मिक पूर्वग्रहों के आधार पर इतिहास के देखने से यही होता है। जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मुरलीमनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे, तब इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में संशोधन करने और उनका पुनर्लेखन करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठन की गई थी, लेकिन इसके सदस्यों का नाम गुप्त रखा गया था। शायद उस समय गठबंधन सरकार होने के कारण कुछ संकोच रहा हो। लेकिन अब पूर्ण बहुमत होने के कारण कोई संकोच नहीं है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का नया अध्यक्ष वाई सुदर्शन राव को बनाया गया है, जिनके इतिहास में योगदान के बारे में अधिक कुछ पता नहीं। 

हां, पिछली 30 जून को उनकी कलम से जो निकला वह कुछ यों है: ‘अपनी आजादी के साठ सालों में हम अपने सुदूर अतीत के अध्ययन के लिए भारतीय परिप्रेक्ष्य में पद्धति विकसित नहीं कर पाए हैं।’ (जहां तक मुझे जानकारी है, आजादी मिले सड़सठ साल हो चुके हैं) और 10 जुलाई को उन्होंने विचार प्रकट किया है कि पुराणों और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों में इस बात के प्रमाण हैं कि मनुष्य को उच्चतर और निम्नतर लोकों का न केवल ज्ञान था, बल्कि उसका इनके साथ जीवंत संबंध था- स्वर्ग, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नाग, पाताल आदि। आशा है दीनानाथ बत्रा शिक्षा में आ रहे इस सुधार से संतुष्ट होंगे। 


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