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मतांतर : मार्क्सवाद का लासा PDF Print E-mail
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Sunday, 27 July 2014 10:16

कमलेश

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : रमेशचंद्र शाह (जनसत्ता, 14-15 जुलाई) और उदयन वाजपेयी (15 मई) द्वारा व्यक्त विचारों को लेकर अरुण माहेश्वरी ने अपनी प्रतिक्रिया (20 जुलाई) व्यक्त की है। इसे पढ़ कर लगता है कि अरुण माहेश्वरी का सारा सोच आज भी स्तालिनी युग में ही चल रहा है। सारी बहस हाल के लोकसभा चुनावों के परिणामों और उसके बाद बनी मोदी सरकार के कार्यों को लेकर है। अरुण माहेश्वरी 1952 या 1957 के चुनावों के बाद भी लिखते तो इसी शब्दावली में, यही बातें लिखते। मसलन, ‘सुरसा की तरह बढ़ रही महंगाई, चीनी मिल मालिकों को दिए गए अरबों रुपए के लाभ, बीमा और प्रतिरक्षा क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश,... भूमि अधिग्रहण कानून में कॉरपोरेट के पक्ष में संशोधन’ आदि। 

कभी सोवियत (बाद में चीनी) साम्राज्य से पाई गई ‘लाइन’ को दुनिया के सारे कम्युनिस्ट साम्राज्यों और सारी कम्युनिस्ट पार्टियों के समाप्त हो जाने के बाद अरुण माहेश्वरी 2014 में भी वही ‘लाइन’ चला रहे हैं। क्यों न हो, भारत में ही जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टियां बची हुई हैं, पार्टी की अपनी ‘लाइन’ तो होगी ही। नहीं तो पार्टी ‘कैडर’ के पास ‘टाकिंग प्वाइंट’ कहां से आएंगे।

अरुण माहेश्वरी के ‘विचारों’ की उत्पत्ति के दर्शन की बानगी देखिए: ‘लोग अपने जीवन के अनुभवों, ठोस भौतिक परिस्थितियों से सामाजिक परिस्थितियों का आकलन करते हैं। इसमें विचार भी वही चलते हैं, जिनका वास्तविक जीवन की जरूरतों से संपर्क होता है। जीवन की जरूरतों से एकमेव होकर ही तो विचार सामाजिक विकास की प्रभावशाली शक्ति का रूप लेता है। यह भौतिक नजरिया अपनी मूल प्रकृति में ही प्रगतिशील होता है। वह सीधे तौर पर भौतिक उत्पादन की परिस्थितियों यानी प्राकृतिक विज्ञान की उपलब्धियों से जुड़ा होता है।’ ऐसा लगता है कि मार्क्स-एंगेल्स द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी में बताए गए सिद्धांतों और सोवियत रूस द्वारा प्रचारित की गई मार्क्सवाद की पाठ्यपुस्तकों के बाद ‘विचारों की उत्पत्ति’ के विषय में और कुछ जानने को नहीं रह गया है। 

माहेश्वरी कहते हैं कि ‘कम्युनिस्टों ने दुनिया के मेहनतकशों को एक करने का नारा दिया था।’ जी, नारा देना एक बात होती है और उन नारों के बहाने जो काम किए जाते हैं वे नारों से मेल नहीं खाते, ये कार्य प्राय: नारों के विपरीत होते हैं। अक्तूबर क्रांति के जरिए रूस के शासन पर अधिकार जमा लेने के बाद रूस की कम्युनिस्ट पार्टी ने जो पहले काम किए उनमें से एक था सेंट पीटर्सबर्ग के एक कारखाने में बनी पहली सोवियत के मजदूरों पर मशीनगनें चलवा कर सैकड़ों मजदूरों को गोलियों से भून देना। कम्युनिस्टों के लिए मजदूर मनुष्य नहीं होता, वह मात्र एक वर्ग होता है, जिसकी व्यापक वर्ग-संबंधों के अनुरूप एक भूमिका होती है। उस वर्ग का नेतृत्व सिद्धांतत: केवल कम्युनिस्ट पार्टी कर सकती है। (पुरानी कहावत है कि पार्टी का नेतृत्व सेंट्रल कमेटी और सेंट्रल कमेटी का नेतृत्व जनरल सेके्रटरी यानी पूरे वर्ग का नेतृत्व केवल जनरल सेक्रेटरी कर सकता है। मजदूर एक वर्ग का अंग तो होता है, लेकिन उसमें वर्ग-चेतना नहीं होती। इसके लिए भी उसे अंतत: जनरल सेक्रेटरी पर ही निर्भर रहना पड़ता है। उस वर्ग के लोगों को जनरल सेक्रेटरी द्वारा सोची हुई रणनीति से अलग रास्ते पर नहीं चलने दिया जा सकता।) 

सेंट पीटर्सबर्ग के उस कारखाने में मजदूरों के नेता एक ऐसे व्यक्ति थे, जो लेनिन के पहले से कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। पूरे रूस के मजदूर उनका सम्मान करते थे। क्या इसी कारण, लेनिन के नेतृत्व को निर्द्वंद्व बनाने के लिए सेंट पीटर्सबर्ग के मजदूरों को गोलियों से भून देना जरूरी हो गया। सोवियत संघ में सारे मजदूर कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य होते थे। उनसे तरह-तरह के फंड लिए जाते थे, जिससे अंतरराष्ट्रीय शांति परिषद, अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन और इस तरह सोवियत साम्राज्य के हितों को सिद्ध करने के लिए बनाए गए दर्जनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन चलाए जाते थे। 

इसके अलावा जब भी पार्टी की रणनीति के लिए आवश्यक पाया जाता था, सोवियत संघ में मजदूरों का भरपूर दमन किया जाता था। पार्टी अगर आवश्यक समझती थी तो मजदूरों से बारह से अठारह घंटे तक काम कराया जाता था। साइबेरिया जैसे क्षेत्रों में रेल लाइनें बिछाने, सड़कें बनाने, खनिज खानों की खुदाई करने, तेल कुओं पर काम करने जैसे कार्यों में लाखों मजदूरों को झोंक दिया जाता था। उनके भोजन और स्वास्थ्य के नगण्य प्रबंध होते थे, इन परियोजनाओं में कार्य करने वाले मजदूर प्राय: कंकाल मात्र रह जाते थे, उनके मुंह से आवाज भी नहीं निकलती थी।


रूस की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा निर्देशित विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के जरिए दुनिया भर के मजदूरों को सोवियत (या चीन) की रणनीति के अनुसार चलाना ही ‘दुनिया के मजदूरों का एक होना’ है। 

वैसे तो कम्युनिस्टों द्वारा गैर-कम्युनिस्ट देशों में चलाए जा रहे सारे मजदूर संगठन छोटे-मोटे ‘कॉरपोरेट’ की तरह ही चलाए जाते हैं। वे साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी अपनी ‘लाइन’ चलाने के लिए उसी तरह के संगठन बनाते हैं। पिछले सौ-एक वर्षों में इस तरह के संगठनों का दुनिया भर में पर्दाफाश हो चुका है। भारत में साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले कम्युनिस्टों के संगठनों और उनके नेताओं ने मुसलिम लीग से मिल कर भारत का विभाजन कराया और पाकिस्तान बनवाया। उसके पहले इन लोगों ने द्वितीय महायुद्ध काल में ब्रिटिश सरकार की खुल कर मदद की और राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को जेल में डलवाया, स्वाधीनता के बाद भी कम्युनिस्टों की नीतियां सोवियत हितों के अनुकूल बनती रहीं। 

1991 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने को समाप्त कर लिया, सोवियत प्रणाली खत्म कर दी गई, वहां कम्युनिस्ट पार्टी की जगह कई पार्टियां बन गर्इं, मार्क्सवाद और बोलशेविकवाद को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया गया। बोलशेविकों द्वारा दमित हो चुकीं क्रांतिपूर्व विचारधाराएं पुन: मान्य होने लगीं, चर्चों पर पड़े ताले खुल गए और सामान्य रूसी ईशू और मरियम की प्रार्थना करने लगे। अब रूस भारत के कम्युनिस्टों का मक्का-मदीना नहीं रहा, कम्युनिस्ट नेताओं के हर साल रूस भ्रमण के अवसर खत्म हो गए। अंतरराष्ट्रीय शांति आंदोलन, अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन, अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी और युवा संगठन, अंतरराष्ट्रीय नारी संगठन आदि जो वर्ष में दो-चार बार विदेश यात्रा का अवसर प्रदान करते थे, अपनी जीवनी शक्ति खो बैठे। लेकिन भारत के कम्युनिस्टों को यह सब खोने के बाद भी कुछ न कुछ पाने की लालसा बनी रही। 

आजकल कम्युनिस्ट बौद्धिक- मार्क्सवादी इतिहासकार, समाजशास्त्री और राजनीतिशास्त्री अमेरिकी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थाओं में शरण पाते हैं। आजकल मार्क्सवाद में नई-नई उद्भावनाएं यूरोप-अमेरिका से प्रकाशित होकर भारत के युवा मार्क्सवादियों को नई शब्दावली प्रदान कर रही हैं। उनमें बीसवीं शताब्दी के शुरू से ही अपने धर्म, इतिहास, अपने पूर्वजों और अपने हितों के विरुद्ध पनपी हुई आत्मशत्रुता अब भी उनके व्यक्तित्व को ‘स्व-विरोधी’ बनाए हुए है। क्यों नहीं, वे मार्क्सवाद नाम के मजहब में अपने को दीक्षित जो कर चुके हैं। 

आश्चर्य नहीं कि अरुण माहेश्वरी धर्मग्रंथ बाइबिल से उद्धरण देते हैं, आखिर मार्क्सवाद भी कैथोलिक, प्रोटेस्टैंट, मेथाडिस्ट जैसे ईसाई संप्रदायों की तरह ईसाई मजहब का ही एक संप्रदाय है, जिसने एक इहलौकिक विचारधारा चला कर, अकूत धन-जन-बल प्रदान करके एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन खड़ा करा दिया और उसको लगभग सौ वर्षों तक चलाता रहा। सोवियत संघ ने अपने मजदूरों के उत्पादन के अधिशेष को राज्य के खाते में डाल लिया और उससे दुनिया के अनेक देशों में इस्पात, बिजली, इंजीनियरी, खनिज तेल के कारखाने लगाता रहा। और भारत, मिस्र, अफ्रीका, क्यूबा, चीन, इंडोनेशिया जैसे देशों को अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति करता रहा। यही सोवियत संघ का ‘वैश्वीकरण’ था। 

मैंने अभी ‘समास’ के तीन अंकों में ‘रूसी संस्कृति का उद्भव और विनाश’ शीर्षक से कोई तीन सौ पन्नों में रूस के राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन का निर्माण करने वाले लोगों के दस्तावेज उद्धृत किए हैं। सोवियत संघ के बारे में पूरी जानकारी के लिए अरुण माहेश्वरी उसे भी देख सकते हैं। 

अपनी सीखी हुई विचारधारा के कारण अरुण माहेश्वरी को ‘चित्त’ शब्द भी बाइबिल का लगता है। रमेशचंद्र शाह से बहस करने के लिए वे गीता और चाणक्य नीति को भी उद्धृत करना सीख गए हैं। यथार्थ में वे रमेशचंद्र शाह और उदयन वाजपेयी की बातों को समझने की क्षमता भी खो चुके हैं।


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