मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
लोक सेवा आयोग : गुणवत्ता जरूरी है PDF Print E-mail
User Rating: / 11
PoorBest 
Sunday, 27 July 2014 10:14

पुरुषोत्तम अग्रवाल

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं के जरिए सफल होने वाले प्रतियोगियों की इतनी कम संख्या के कारण उपजे असंतोष को आंदोलन का रूप लिए कई दिन हो चुके हैं, अब इसमें उग्रता भी आती दिख रही है। यूपीएससी द्वारा अगली परीक्षा के लिए प्रवेश-पत्र जारी करना शुरू होते ही छात्र धीरज खो बैठे, और स्थितियां बिगड़ने लगीं। उधर, सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रवेश-पत्र जारी होने पर भी परीक्षा-प्रणाली में बदलाव हो सकते हैं। सवाल है कि किस तरह के बदलाव? इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि जो बदलाव लाए जाएंगे, वह कौन लाएगा, कैसे लाएगा? 

बहुत-से लोग आग्रह करते रहे हैं कि मुझे इस मामले में अपनी राय जाहिर करनी चाहिए। संघ लोक सेवा आयोग संवैधानिक संस्था के तौर पर अपना काम चुपचाप करने में विश्वास करता है। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए भारत सरकार के लिए अधिकारियों का चयन अपने आप में एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे जुड़े या जुड़े रहे लोगों को सार्वजनिक बयानबाजी से बचना ही चाहिए। देश के प्रशासन-तंत्र के लिए अधिकारियों का चयन करने जैसे नाजुक काम से जुड़ी संस्था से संबद्ध लोगों को मौन के महत्त्व और संस्था की मर्यादा का बोध लगातार रहना चाहिए। इस समय बात करने की जरूरत इसलिए महसूस कर रहा हूं, क्योंकि मुझे आशंका है कि भारतीय भाषाओं के समर्थन के नाम पर प्रतियोगिता के ढांचे को ही संदिग्ध न बना दिया जाए, और यूपीएससी की स्वायत्तता पर हमला करने के बहाने न खोज लिए जाएं। 

जहां तक बदलाव का सवाल है, दो चीजों के बीच फर्क करना जरूरी है। खराब अनुवाद के कारण हिंदी माध्यम के छात्रों को होने वाला नुकसान, और खुद सीसैट की जरूरत और गुणवत्ता। यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि यूपीएससी परीक्षा-प्रणाली की समीक्षा समय-समय पर करता रहा है। वर्तमान सीसैट ऐसी ही समीक्षा का परिणाम है। सिविल सेवा की विशेष जरूरतों को देखते हुए इसमें तार्किक विश्लेषण, बोध और निर्णय-क्षमता आदि को जांचने के लिए सवाल हल करने की उम्मीद की जाती है। गणित और अंगरेजी के भी बुनियादी ज्ञान की जांच की जाती है। 

सीसैट लागू करने के तर्क की उपेक्षा नहीं की जा सकती। सिविल सेवा एक खास तरह का काम है, इसके अनुकूल रुझान (एप्टीट्यूड) का आकलन करने को गलत नहीं ठहराया जा सकता। इसकी पद्धति पर निस्संदेह चर्चा हो सकती है, जोकि बताता चलूं कि संघ लोक सेवा आयोग में हुई भी है। जिस रूप में सीसैट आज है, उसके एक-एक ब्योरे से आयोग का हर सदस्य सहमत रहा हो, ऐसा नहीं है। इस तरह की चर्चा गंभीरता और जिम्मेवारी के साथ अब भी जारी रहनी चाहिए, ताकि चीजें स्पष्ट रहें। 

स्वस्थ चर्चा के अभाव का ही नतीजा है कि बहुत-से लोग नहीं जानते कि जब यूपीएससी ने सीसैट का प्रस्ताव सरकार को भेजा था, तब अंगरेजी बोध-क्षमता के अंक पूरे परचे के दस प्रतिशत ही रखने की सिफारिश की थी। इन्हें तत्कालीन सरकार के अफसरों ने बढ़ा कर तैंतीस प्रतिशत कर दिया। यह चिंताजनक था कि संसद में इस विषय पर हंगामा होने पर, और विपक्षी सदस्यों द्वारा अंगरेजी को इतना अधिक वजन दिए जाने के लिए यूपीएससी के विरुद्ध कार्रवाई की मांग किए जाने पर भी तत्कालीन संबंधित मंत्रीजी ने यह स्पष्ट करने की जरूरत नहीं समझी थी कि यूपीएससी की दस प्रतिशत की सिफारिश को तैंतीस प्रतिशत में बदलने का करिश्मा, खुद यूपीएससी की जानकारी के बिना उनकी सरकार ने ही कर दिखाया था। बहरहाल, इस समय सीसैट में अंगरेजी की जानकारी का वजन दस प्रतिशत ही है। 

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खराब अनुवाद के कारण होने वाली दिक्कतों को सीसैट समाप्त करने का आधार बनाना न केवल सेवा की गुणवत्ता के लिए घातक होगा, बल्कि इसका संदेश यही जाएगा कि हिंदी माध्यम और हिंदी क्षेत्र के छात्र कड़ी मेहनत और प्रतियोगिता से कतराते हैं। भाषा के आधार पर हो या मानविकी और साहित्य पढ़ने के कारण, पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसका निदान और उपचार होना ही चाहिए। लेकिन सीसैट अपने आप


में किस तरह हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं या मानविकी विषयों के विरुद्ध जाता है, जो इसे सिरे से हटाने की मांग की जा रही है? इसकी पद्धति पर विचार भी हो सकता है, विवाद भी, लेकिन इसे समाप्त करना सिविल सेवा की गुणवत्ता पर निश्चय ही विपरीत प्रभाव डालेगा। 

आज के जमाने में प्रशासनिक सेवा में शामिल होने के इच्छुक नौजवानों से गणित, कंप्यूटर और अंगरेजी में न्यूनतम दक्षता की उम्मीद करने को गलत नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग पूरी चयन-प्रक्रिया के अंगरेजी के प्रति पक्षपाती होने के निराधार आरोप लगा रहे हैं, वे अपनी वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता के लिए उचित ही प्रसिद्ध रही संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को चोट पहुंचा रहे हैं। और इस तरह, देश के सारे लोकतांत्रिक ढांचे को दूरगामी नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं। यह बात किसी को कभी नहीं भूलनी चाहिए कि कोई भी लोकतंत्र संख्याओं भर का मामला नहीं होता, वह सशक्त संस्थाओं के बल पर चलता है। यूपीएससी की निष्पक्षता और क्षमता की छवि से हम सब वाकिफ हैं, यह छवि किसी प्रचार पर नहीं, लोगों के वास्तविक अनुभवों पर आधारित है। सब जानते हैं कि यूपीएससी में न पैसा चलता है, न सिफारिश। इस विश्वसनीयता को बिना किसी आधार के संदिग्ध बनाना घातक है। 

सरकारें तो बहाने खोजती ही हैं, कभी सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्तता पर काबू करने के, तो कभी चुनाव आयोग के पर कतरने के। एक घटना के आधार पर जजों की नियुक्ति की कॉलिजियम प्रणाली को ही समाप्त करने की बातें चलने लगी हैं। ऐसी स्थिति में संस्थाओं की स्वायत्तता और सशक्तता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि स्वयं संस्थाएं संवेदनशीलता बनाए रखें, ताकि सत्ता को हस्तक्षेप के बहाने न मिलें। यह बात न्यायपालिका और लोक सेवा आयोगों और विश्वविद्यालयों से लेकर मीडिया तक पर लागू होती है। स्वायत्तता तभी बची रह सकती है, जबकि संस्थाएं खुद अपनी मर्यादा और दायित्वों के प्रति सचेत रहें। पिछले ही दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में चार-साला पाठ्यक्रम जिस तरह समाप्त किया गया, वह उस ढंग का ही नतीजा था, जिस तुगलकी ढंग से कुलपति महोदय ने उसे लागू किया था। 

मौन रह कर काम करना संवैधानिक संस्था के लिए अच्छी बात है, लेकिन मौन संवेदनहीनता और अहंकार को ध्वनित करने लगे, यह अच्छी बात नहीं। सीसैट के परचों में अगर टेबलेट कंप्यूटर का अनुवाद गोली कंप्यूटर और लैंड-रिफार्म का अनुवाद आर्थिक सुधार हुआ है, तो यह अक्षम्य है। इस मामले में जिम्मेवारी तय की ही जानी चाहिए। सबसे बड़ी बात यह कि अनुवाद का काम मशीन से कराने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी? अनुवाद में सक्षम लोगों का कोई अकाल नहीं पड़ गया है, उन्हें इस काम में लगाया जा सकता है। गोपनीयता की बात करें तो क्या अब परचे बनवाए भी मशीन से जाएंगे? 

बेहतर होता कि इस तरह के भ्रष्ट, बल्कि भयानक अनुवादों का संज्ञान यूपीएससी खुद लेता, और जरूरी कदम उठाता। यह काम अब भी किया जा सकता है। इस काम की उपेक्षा करके संघ लोक सेवा आयोग सरकार को अवसर देगा कि वह इस संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करे। यह हस्तक्षेप लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए दूरगामी रूप से घातक होगा। इसलिए यूपीएससी को अपनी विश्वसनीयता के साथ ही लोकतांत्रिक मर्यादा भी बनाए रखने की पहल खुद करनी होगी।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?