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कभी-कभार : कविता की जगह PDF Print E-mail
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Sunday, 27 July 2014 10:11

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : हमारे समय की एक रूढ़ और मीडिया द्वारा बहुप्रचलित अवधारणा यह है कि कविता के लिए समाज में जगह कम हो रही है, उसके पाठक और श्रोता बहुत कम हैं और इसका एक बड़ा कारण आज की ज्यादातर कविता का बौद्धिक और छंद-लयहीन होना है। दशकों पहले मध्यप्रदेश में हमने आज की कविता को श्रोताओं के समक्ष लाने का एक लंबा प्रयोग किया था और उसके नतीजे उत्साहित करने वाले थे। भोपाल में मप्र कला परिषद की सारी जगह भर गई थी जब एक बार अज्ञेय ने कवितापाठ किया था: शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल का कवितापाठ खचाखच श्रोताओं से भरी कलावीथिका में लगभग चार घंटे तक चला था। भारत भवन के विश्व कविता समारोह में उसकी ‘अंतरंग’ रंगशाला सप्ताह भर घंटों खचाखच भरी रही थी। यह सब याद आया जब पिछले सप्ताह इंदौर में सेवा-सुरभि संस्था के तत्त्वावधान में हम तीन कवियों- चंद्रकांत देवताले, ध्रुव शुक्ल और मैंने एक भरे सभागार में लगभग ढाई घंटे कवितापाठ किया, जिसे डेढ़ सौ से अधिक श्रोताओं ने चाव से सुना-सराहा। इतवार होने के बावजूद उसी शाम एक अन्य सभागार में बहुत सारे श्रोताओं ने शिरीष ढोबले को एक फेलोशिप दिए जाने के अवसर पर उनसे कविताएं प्रसन्नमन सुनीं। 

इंदौर एक आम शहर है, जहां लगातार कुछ न कुछ सांस्कृतिक क्षेत्र में होता रहता है। वहां मराठी नाटक टिकट खरीद कर देखने वालों की बड़ी और नियमित संख्या है। शास्त्रीय संगीत और सिने संगीत से रसविभोर होने वाले काफी रहे हैं। उज्जैन का अभिनव रंगमंडल वहां कुछ वर्षों से अपनी नाट्य प्रस्तुतियां आयोजित करता रहा है और उसे वहां भरपूर दर्शक मिलते रहे हैं। इस कैलेंडर में कविता की जगह अपने आप बन जाती है। आयोजकों को निश्चय ही कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। कुछ मीडिया साथ देता है; कुछ उदासीन और फैशन-सिनेमा-रसोई आदि के रसरंग में डूबा रहता है। 

जिन चार कवियों के लिए श्रोता एकत्र हुए उनकी अधिकांश कविताओं में बौद्धिक तत्त्व सक्रिय है: अधिकांश में लयात्मक नियोजन तो है, पर रूढ़ छंद प्राय: नहीं। इसके बावजूद अगर कविता के श्रोता हैं, तो यह उस अवधारणा का कारगर प्रत्याख्यान है जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। विदेशों में भी बड़े-बड़े कवियों के पाठ के समय हजारों की संख्या में लोग जमा नहीं होते। लातिनी अमेरिकी देशों और रूस में कवितापाठ में बड़ी उपस्थिति की एक परंपरा है, जो अन्यत्र दुर्लभ है।

हमारे यहां कविता के लिए जगह बनाने का काम, किसी हद तक, जिन संस्थाओं को करना चाहिए वे हिंदी समाज में या तो निष्क्रिय हैं या अपनी कारगुजारियों के कारण अप्रतिष्ठित। ऐसी सभ्यता सोचना कठिन है, जिसमें किसी न किसी रूप में कविता न हो। लेकिन ऐसी संस्कृति सोचना अब संभव है, जिसकी स्वयं अपनी कविता में कोई रुचि न हो जैसी कि हिंदी संस्कृति में हालत है। लेकिन प्रयत्न करें तो श्रोता हैं, यह इंदौर ने सिद्ध किया है। 


दृष्टि की जरूरत

भले हम कविता को अक्सर उसके मर्म और भाव के लिए पढ़ते-गुनते हैं, उस पर विचार करते समय जोर दृष्टि पर होता है। इस सोच-विचार में प्राय: ऐसा लगता है जैसे कि कविता उस दृष्टि को चरितार्थ करने के लिए लिखी गई है। ऐसी कविता होती है, जो दृष्टि-परिचालित होती है। पर वह अनिवार्य रूप से अच्छी या सार्थक नहीं होती। अनुभव बताता है कि हम उस कविता को संदेह से देखने लगते हैं, जो हम पर अपनी दृष्टि के डोरे डालने लगती है। कविता के आस्वाद और उस पर विचार में, इसलिए, एक विडंबना उभरती है। 

कवि-दृष्टि एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। पर कविता की रचना-प्रक्रिया में यह दृष्टि, कम से कम अच्छी कविता में, अतिक्रमित होती है: सच्चाई का जो परिसर कविता अंतत: अपनी लय, छवियों और स्मृतियों आदि से रचती है उसमें वह दृष्टि अंत:सलिल हो जाती है। वह जितना उभरेगी उतना वह कविता को, कम से कम उसके मर्म को आहत करती है। दृष्टि और मर्म में द्वंद्व हो जाता है और हम फिर एक दूसरी विडंबना तक पहुंच जाते हैं। यह नोट करना दिलचस्प है कि अगर इस द्वंद्व में दृष्टि मर्म पर हावी हो जाए तो कविता सार्थकता तक पहुंचने से प्राय: चूक जाती है। दृष्टि विनम्रतापूर्वक मर्म को उभरने दे और अपने को ओझल या अंत:सलिल हो जाने दे तभी कविता अपने अद्वितीय अर्थ तक पहुंच सकती है। 

हिंदी आलोचना का बेश्तर हिस्सा दृष्टि की व्याख्या में लगा रहता है और उसमें मर्म से उसके तनाव और द्वंद्व की कोई समझ प्राय: नहीं होती। व्याख्याओं में उसकी कोई अंतर्ध्वनि भी सुनाई नहीं देती। इसका एक बड़ा कारण यह समझ में आता है कि दृष्टि सामान्यीकरण का मामला है, जबकि मर्म विशेषीकरण का। हम तरह-तरह के सामान्यीकरणों में ज्यादातर उलझे रहते हैं। ऐसा करना आसान होता है और हम कई तरह के भिन्न मर्म प्रस्तुत करने वाली


कविता को किसी सामान्यीकरण में सरलीकृत या एकीकृत करना आसान पाते हैं। उसमें आलोचनात्मक उद्यम भी कम करना पड़ता है। मर्म की अपार बहुलता है, लेकिन दृष्टि की बहुलता वैसी विशद और जटिल नहीं होती। 

इसका यह अर्थ नहीं है कि कवि दृष्टि के बिना कविता लिखी जा सकती है या उस पर विचार किए बिना आलोचना का काम चल सकता है। दृष्टि तो चाहिए और हर वयस्क और विचारणीय कवि की कोई न कोई दृष्टि होती ही है। पर वह उसकी समूची कविता का मर्म समझने के लिए पर्याप्त नहीं होती। किसी कवि की घोषित दृष्टि और उसकी कविता से प्रगट होने वाली दृष्टि में दूरी या अंतर्विरोध तक हो सकता है। फिर, अच्छे कवि की दृष्टि कभी मुकम्मल नहीं होती- वह उसकी सक्रियता से निरंतर बनती रहती है। उसे किसी एक मुकाम पर रूढ़ करना उस दृष्टि की सजीवता और वेध्यता को नजरअंदाज करना है। ऐसी नजरअंदाजी हमारी आलोचना में रोज ही दीख पड़ती है। वह दृष्टि पर एकाग्र होकर भी अंतत: दरअसल दृष्टिहीन ही होती है। 


आशीर्छाया

दिल्ली में लेखकों के बीच यारबाशी लगता है कि कम हो रही है। बेवजह मिलने के, यों ही बैठ कर गप लगाने और एक-दूसरे की टांग खींचने के अवसर कम ही होते हैं। जब से कृष्ण बलदेव वैद दिल्ली छोड़ कर अमेरिका चले गए, निर्मल वर्मा दिवंगत हो गए और कुंवर नारायण अस्वस्थ, ऐसे अवसर मेरे लिए भी बहुत कम हो गए। यों यह सौभाग्य की बात है कि पचासी से ऊपर की आयु के कई लेखक हमारे बीच हैं: कृष्णा सोबती, वैद, कुंवर नारायण और नामवर सिंह। उनमें से हरेक ऐसा है, जो अपने से युवतर लेखकों के साथ समकक्षता का व्यवहार करता है। कृष्णाजी और वैद साहब अपना मजाक खूब और बहुत आसानी से बनाते चलते हैं। 

इधर अंगरेजी प्रकाशक पेंगुइन बुक्स ने भारतीय भाषाओं से अंगरेजी अनुवाद की अपनी सीरीज को सशक्त बनाने की कोशिश की है। ‘माडर्न क्लैसिक्स’ के अंतर्गत उसने हाल ही में कृष्ण बलदेव वैद की तीन पुस्तकों का एक सेट जारी किया है- दो उपन्यास और एक कहानी-संग्रह: ‘दि ब्रोकन मिरर’, जिसके अनुवादक हैं शिकागो के चार्ल्स स्पेरोज; ‘स्टेप्स इन डार्कनेस’, जो वैद के पहले उपन्यास ‘उसका बचपन’ का लेखक द्वारा किया गया अनुवाद है और तीसरा कहानी-संग्रह ‘द स्कल्पटर इन एग्जाइल’ जिसमें वैद द्वारा स्वयं अनूदित सत्रह कहानियां संकलित हैं। शायद किसी हिंदी लेखक द्वारा लिखे साहित्य के अनुवाद का यह पहला बड़ा सेट है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस प्रकाशन से व्यापक साहित्य-जगत वैद के रेंज, उनकी अद्वितीय कथा-शैली, उनकी अथक प्रयोगशीलता, उनकी नैतिक निर्भीकता, भाषा के साथ उनका अपार खिलवाड़, उनके विडंबना-बोध, उनकी मानवीयता मार्मिकता आदि से परिचित और अभिभूत हो पाएगा। हिंदी के अलावा उर्दू, पंजाबी और अंगरेजी भाषाओं ने वैद-संसार को अनोखी अंतर्ध्वनियां और छवियां, कहने के नए अंदाज, कथा कहने के या कथा में कई बार कुछ न कहने के नए मुहावरे दिए हैं। इस सबके बावजूद वैद हिंदी में शायद सबसे अकेले लेखक हैं, जिन्हें उनके इस कई बार विवश एकांत ने घायल नहीं किया और वे अपनी जिद पर अड़े रहे हैं। उन्होंने एक तरह से हिंदी कथा में अपनी जमीन खुद तैयार की और उस पर पूरे आत्मविश्वास से वे बराबर काबिज रहे हैं। उपेक्षा, अवहेलना, दुर्व्याख्या, निंदा आदि ने उन्हें कभी अपने पथ से विचलित नहीं किया। उनका संसार बहुत बड़ा है और उसमें दूसरों की नीचताओं और दुष्टताओं को हिसाब में लेने की जगह या फुरसत नहीं रही है। अपने समय, जीवन और समाज, व्यक्ति और इतिहास के बहुत सारे अंधेरे वैद ने अपने साहित्य में विन्यस्त किए हैं, पर वे एक उजले लेखक रहे हैं, जिन्हें ये अंधेरे कभी परास्त नहीं कर सके। उनका इस तरह होना हममें से कई को उत्साह और प्रेरणा से भर देता है। 

यह भी याद करने की जरूरत है कि वैद उन थोड़े से हिंदी लेखकों में से हैं, जिनका देश के अनेक चित्रकारों, संगीतकारों, रंगकर्मियों, नर्तकों और कई भाषाओं के युवा लेखकों से अंतरंग-आत्मीय संवाद लगातार होता रहा है। स्वयं उनके लेखन पर कई कलाओं की मोहक और सार्थक छाया पहचानी जा सकती है।


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