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पुस्तकायन : दुश्चक्र में देह PDF Print E-mail
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Sunday, 27 July 2014 10:09

शरद सिंह

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : स्त्री-देह को उपभोग की वस्तु के रूप में देखने वालों की समाज में कभी कमी नहीं रही है। रूपवती कन्याओं को देवदासी बना देना, सुंदर स्त्री को नगरवधू के सांचे में ढाल देना प्राचीन काल में भी पाया जाता था। आधुनिक युग में भी यह मौजूद है। कोई भी स्त्री स्वेच्छा से देह व्यापार में लिप्त नहीं होना चाहती है। कभी आर्थिक विवशता तो कभी महत्त्वाकांक्षा उसे इस आदिम व्यापार के दलदल में धकेल देती है। देह व्यापार में लिप्त स्त्रियां या युवतियां समाज में रह कर भी समाज से अलग-थलग कर दी जाती हैं। सामाजिक मनुष्यों से उनका संबंध मात्र देह तक सीमित होकर रह जाता है। इसी समाज में एक वर्ग और है, जो पारिवारिक अनुष्ठानों में आशीष देने का कार्य करता है। माना जाता है कि इस वर्ग का आशीर्वाद आनुवंशिक समृद्धि लाती है। पर समाज का कोई भी व्यक्ति उनके जैसे जीवन की स्वप्न में भी आकांक्षा नहीं करता। यह वर्ग है ‘थर्ड जेंडर’, जिसे ‘हिजड़ा’, ‘किन्नर’, ‘ख्वाजासरा’ आदि नामों से पुकारा जाता है। 

निर्मला भुराड़िया का उपन्यास गुलाम मंडी समाज के इन्हीं दो वर्गों पर केंद्रित है। जहां तक देह व्यापार का प्रश्न है, इसमें मानव तस्करी का जघन्य अपराध भी अभिन्न हिस्से की तरह जुड़ा होता है। युवतियों को बहला-फुसला कर दलालों के हाथों बेचे जाने की घटना अब अंतरराष्ट्रीय रूप ले चुकी है। दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर पश्चिम एशिया के देशों, जिनमें चीन, नेपाल, बांग्लादेश, भारत आदि से प्रति वर्ष हजारों की संख्या में लड़कियां मानव तस्करी की शिकार हो रही हैं। अफ्रीका महाद्वीप से लेकर रूस, यूक्रेन आदि देशों की लड़कियां भी बड़ी संख्या में खरीद-फरोख्त की जाती हैं। कभी ये अपने परिवार को भुखमरी से बचाने के लिए खुद को तस्करों के हवाले कर देती हैं तो कभी चतुर तस्कर इन्हें विदेशों में नौकरी दिलाने के बहाने दूसरे देश पहुंचा देते हैं। वहीं अनेक लड़कियां गरीबी से निजात पाने के लिए मॉडलिंग, नृत्य जैसे रास्ते चुनती हैं और उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि कब उनका सौदा कर दिया गया। जब उन्हें इस बात का अहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। घर वापसी या सामान्य जीवन के सभी रास्ते बंद हो चुके होते हैं। 

‘गुलाम मंडी’ की दो प्रमुख महिला पात्र हैं- कल्याणी और जानकी। कल्याणी मुंबई की चमकीली दुनिया में निरंतर संघर्ष करती है। रजत परदे की दुनिया में उसका कोई बहुत बड़ा मुकाम नहीं है, फिर भी वह अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को सीने में दबाए हुए है और जो भी काम मिलता है सहर्ष करती है। कभी शो-एंकरिंग, तो कभी डॉयलाग डबिंग जैसे कामों में भी अभिनेत्री बनने की राह ढूंढ़ती है। वह शो-बिज में है, मगर उन जमीनी संवेदनाओं से भरी हुई है, जो उसने अपने बचपन के परिवेश से पाया था। कल्याणी का चरित्र रचते हुए लेखिका ने स्त्री की समग्रता को बखूबी उकेरा है। 

कल्याणी और गौतम ने अपनी पालित पुत्री जानकी उर्फ जेन को जिस ममत्व से पाला वह जानकी से भी अपने माता-पिता के प्रति ईमानदार व्यवहार की मांग करता था, पर फिसलन यहीं से शुरू हो गई। जानकी को अपनी जैविक मां और उसकी निर्धनता का पता होना और इसी निर्धनता को अपने जीवन से निकाल फेंकने के लिए कल्याणी से दुराव-छिपाव करना। जानकी अपनी उम्र के उस पड़ाव पर थी, जहां किसी भी चकाचौंध से उसका भ्रमित हो जाना बहुत आसान था। रेव पार्टियों तक पहुंचाने वाली तथाकथित सहेलियां, डांस ट्रुप्स में काम देकर छल करने वाला व्यक्ति- ये सब जानकी को अपने हितैषी प्रतीत होते। क्योंकि इन लोगों में वह अपने संपन्न होने के स्वप्न को सच करने का जरिया देखती। उसे पता ही नहीं चल पाया कि वह कब इन लोगों का जरिया बन गई। 

निर्मला भुराड़िया ने उस धरातल को भी सामने लाने का एक अच्छा प्रयास किया है जिस पर कल्याणी, गौतम, ताई, घुंघरू, अंगूरी, रानी जैसे चरित्र जन्मते हैं। यह धरातल भूख, गरीबी और जीने की ललक का है। इसी के चलते अनेक लोग कर्मकांडी महात्माओं की शरण में पहुंचते हैं। इस उपन्यास


में मिलारेपा ऐसा ही कर्मकांडी महात्मा है। वह लाल वस्त्र धारण करता है, उसकी जिह्वा भी लाल दिखाई देती है और इसीलिए वह ‘लाल बाबा’ कहलाता है। कल्याणी भी उसके पास जाती है, पर मिलारेपा उसे अपने स्वप्नों को लिपिबद्ध करने को कहता है। कल्याणी अपने सपनों को लिखती है और तब उसे लगता है कि उसके सपने तो विचित्र हैं। नींद में देखे गए सपनों से खुली अांखों के रास्ते नहीं मिलते। 

इन्हीं के बीच हिजड़ा गुरु का प्रभावी अस्तित्व है। सौ वर्षीय हिजड़ा गुरु माता के लिए अंगूरी कल्याणी से कहती है- ‘पैर छुओ और एक अच्छा-सा आशीर्वाद अपने नाम कर लो। हिजड़ा गुरु का आशीर्वाद बहुत फलता है, वह भी सौ साल की गुरु का। कई लोग आकर पैर छूकर जाते हैं इनके।’ इसी महिमायुक्त हिजड़ा गुरु की मृत्यु होने पर- ‘अपने रिवाज के मुताबिक बाकी हिजड़े चुपचाप उसे दफनाने ले जा रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि किसी को भी पता चले कि यह शवयात्रा है।’... ‘कफन को गड््ढे में रखने के बाद उन्होंने लाश को उतारा, मगर सीधे नहीं लेटाया, बल्कि लेटाया पेट के बल। लाश को उल्टा रख कर उन सभी ने अपनी-अपनी कमर में बंधे जूते-चप्पल निकाल लिए और लाश को पीटना शुरू किया। इस कथन के साथ कि अगले जन्म में हिजड़ा न बनना।’ 

दरअसल, यह ‘थर्ड जेंडर’ के जीवन का बहुत ही संवेदनशील और मार्मिक पक्ष है। वे समाज को दुआएं देते हैं, लेकिन समाज से मिलने वाला बहिष्कार उन्हें किस तरह मर्मांतक पीड़ा पहुंचाता है, अंतिम संस्कार के इस पक्ष से हृदय विदारक रूप में सामने आता है। उपन्यास में थर्ड जेंडर और मानव तस्करी की कथाएं समांतर प्रवाहित होती चलती हैं, लेकिन कथानक के उत्थान के साथ-साथ वैश्विक समस्या के प्रति चिंता को अधिक विस्तार मिलता जाता है। 

‘गुलाम मंडी’ का कथानक एक विस्तृत कैनवस की तरह है- भारत से टेक्सास (अमेरिका) तक। लॉसवेगास के होटलों में दुनिया भर से लाई गई लड़कियों से ‘स्ट्रेपीज डांस’ कराया जाता है। ‘दरअसल छोटे-छोटे बने इन स्टेजों में से लगभग हर एक पर एक अलग ही नस्ल की युवती नाच रही थी। कोई अफ्रीकी-अमेरिकी है, कोई मैक्सिकन, कोई एशियाई, तो कोई गोरी भी! नस्ल कोई भी हो, यहां बैठे लार टपकाते पुरुषों के लिए वे सब मांस की लुगदी हैं। उन्हीं को रिझाने के लिए वे नग्न नाच रही हैं।’ 

इन्हीं में से एक थी जेन यानी जानकी। जो अपनी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के चक्कर में तस्करों के हाथों पड़ कर मुंबई से चल कर टेक्सास के होटल में स्ट्रेपीज डांसर का त्रासद जीवन जीने के लिए विवश हो गई थी। 

मानव तस्करी के ज्वलंत मुद्दे को निर्मला भुराड़िया ने बखूबी इस उपन्यास में उठाया है। उन्होंने इसे ‘गुलाम मंडी’ कहते हुए स्पष्ट किया है कि यह समस्या एक देश की नहीं, वैश्विक है। निस्संदेह, वैश्विक अपराधों से जूझना अधिक दुष्कर होता है। पर ‘गुलाम मंडी’ की विशेषता है कि यह जहां एक ओर जीवन के अंधेरे पक्षों से साक्षात्कार कराता है, वहीं आशा की एक किरण भी दिखाता है कि अगर ईमानदार प्रयास हो तो मानव तस्करी जैसे वैश्विक अपराध पर काबू पाया जा सकता है। यह पक्ष इस उपन्यास को अधिक सशक्त बनाता है। 

गुलाम मंडी: निर्मला भुराड़िया; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए। 


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