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पुस्तकायन : एक सूत्र तीन कथाएं PDF Print E-mail
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Sunday, 27 July 2014 10:06

अनंत विजय

जनसत्ता 27 जुलाई, 2014 : अपने उपन्यास ‘कठगुलाब’ पर लिखते हुए मृदुला गर्ग ने ‘कठगुलाब कैसे उगा’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। उसमें उन्होंने माना था कि ‘अपने परिवेश से सरोकार रखे बगैर कोई साहित्य नहीं रचा जा सकता। हां, यह परिवेश तात्कालिक समय और समस्या के दायरे में कैद नहीं होता। सब तरफ से कटा हुआ आदमी संन्यासी होता है और उसके मन में कोई द्वंद्व नहीं होता। द्वंद्व के बिना साहित्य का जन्म संभव नहीं है। उपन्यास में रचनाकार के द्वंद्व को, उसके पात्र इस तरह से जज्ब कर लेते हैं कि वह, उससे ज्यादा, उसका द्वंद्व बन जाता है।’ 

इसी तरह मृदुला गर्ग की बहन और हिंदी साहित्य को अपने लेखन से झकझोर देने वाली मंजुल भगत ने भी लिखा है: ‘कल्पना कितनी भी मर्मज्ञ क्यों न हो और कलम कितनी भी शक्तिशाली, लेखक को जीवन में भागीदार होना ही पड़ेगा। सच्चा लेखन, जीवन से जुड़ कर, जीकर ही, संभव है। लेखक हर पल लेखक नहीं है। वह एक संवेदनशील व्यक्ति है, जिसके लिए जीना और लिखना, दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, तभी तो जाने कब का जिया हुआ आज लिखा जाता है।’ 

बिसात: तीन बहनें, तीन आख्यान पढ़ते हुए मंजुल भगत और मृदुला गर्ग के लिखे उपरोक्त अंश अनायास जेहन में कौंध गए। हिंदी साहित्य में यह संयोग दुर्लभ है कि एक ही जिल्द में तीन कथाकार बहनों की एक ही विषय-वस्तु या चरित्र के इर्दगिर्द लिखी रचना उपलब्ध हो। ‘बिसात: तीन बहनें तीन आख्यान’ में यह दुर्लभ संयोग घटित हुआ है। इस किताब में मंजुल भगत की रचना ‘बेगाने घर में’, मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘वंशज’ और अचला बंसल की कहानी ‘कैरम की गोटियां’ प्रकाशित हैं। तीनों रचनाओं में परिवार है, घर है, घर का तनाव है, पिता है, पुत्र है, मां है, बहू है, बच्चे हैं। 

मंजुल और मृदुला के उपन्यासों का तो परिवेश भी एक है। कोठी है, नौकर-चाकर हैं, बाग-बगीचे हैं आदि। वहीं अचला बंसल की कहानी में परिवेश अवश्य बदला हुआ है। वहां कोठी की जगह फ्लैट ने ले ली है। हवेली की लॉन की जगह पिता और बच्चों का कमरा है। लेकिन तीनों रचनाओं में एक साझा सूत्र है- पिता-पुत्र संबंध और उनके बीच का तनाव। जिंदगी की बिसात पर पिता और पुत्र के संबंध की कई गोटियां इधर से उधर होती रहती हैं- कभी पात्रों के रूप में, कभी स्थितियों के रूप में तो कभी घटनाओं के रूप में, लेकिन यह स७बंध और उसके बीच का द्वंद्व स्थायी तौर पर हर जगह मौजूद रहता है। 

अगर हम इस द्वंद्व के बारे में विचार करें तो मंजुल के उपन्यास ‘बेगाने घर में’ पिता के मन में पुत्र के जिंदा नहीं होने की पीड़ा है। उपन्यास का केंद्रीय पात्र किशोरचंद्र हवेली में अपने तमाम कारकुनों के साथ रहते हुए भी निजता के एकांत क्षणों में अपने दर्द को महसूस करते रहते हैं। पत्नी की याद को संजो कर संदूक में रखते हैं। एक प्रसंग में उनका नौकर कहता है- ‘एक संदूक में मालकिन की तस्वीरें थीं, जो मालिक ने दीवारों पर से उतरवा दी थी, उन्हें सहन नहीं होती थी। एक में बड़े पलंग का बिस्तर, चादरें, मेजपोश वगैरह थे। कितनों पर तो मालकिन के हाथ के बेल-बूटे कढ़े थे। मालिक ने उन्हें अपने लिए कभी बिछाने न दिया।’ 

‘बेगाने घर में’ मंजुल भगत ने अपने समय के परिवेश के बहाने समाज पर भी तल्ख टिप्पणी की है। जीते-जी याद नहीं करने वाले रिश्तेदार मरने के बाद गिद्धों की तरह मंडराने लगते हैं, क्योंकि उन्हें संपत्ति की गंध आकर्षित करती है। इस तरह का माहौल तब भी था, अब भी है। हमारा समाज लाख दावा करे कि वह इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर गया है और आधुनिक होने की होड़ में शामिल है, लेकिन संपत्ति का लालच उन्हें तमाम आधुनिकताओं से पीछे खींच लाती है। मंजुल भगत के इस उपन्यास की एक और खास बात है कि इसमें हवेली के नौकरों के बीच के संवाद बेहद दिलचस्प हैं। 

भाषा पर मंजुल का अद्भुत अधिकार है और जिस कथा को आगे बढ़ाने में संवाद का सार्थक उपयोग उन्होंने इस उपन्यास में किया है, उससे पढ़ते


समय संवाद की जेहन में सिर्फ छवि नहीं बनती, बल्कि वे सुनाई भी देते हैं और आपको उस परिवेश में खींच कर ले जाते हैं। इसे पढ़ते हुए गांव की पुरानी हवेलियां जेहन में उपस्थित हो जाती हैं। गनपत और रतनी के बीच के मूक प्रेम को भी मंजुल ने बेहद खूबसूरती के साथ दबा ही रहने दिया है, लेकिन संकेत पर्याप्त दिए हैं। साहित्य में जीवन की सिर्फ बात ही नहीं करतीं मंजुल, बल्कि उन्होंने इस उपन्यास में ग्राम जीवन को उतार दिया है। 

इसी तरह मृदुला गर्ग जिस द्वंद्व की बात करती हैं वह उनके उपन्यास ‘वंशज’ में काफी खुल कर सामने आता है। जज शुक्ला और उनके बेटे सुधीर के बीच जटिल संबंध हैं। इस संबंध की बुनियाद बचपन में ही पड़ गई थी। सुधीर की मां की अकाल मृत्यु और शुक्लाजी का बेटी रेवा पर अगाध स्नेह का असर सुधीर के बाल-मन पर पड़ा और वह बचपन से ही विद्रोही हो गया। पिता अपने पुत्र को दिल की गहराइयों से चाहते हैं, लेकिन जिस दौर की यह कहानी है उस दौर के सारे पिता आमतौर पर कड़क मिजाज होते थे। परवरिश और पिता के रहन-सहन और मन-मिजाज ने भी सुधीर को विद्रोही बनाने में मदद की। आजादी की लड़ाई के दौर में सुधीर का झुकाव संघ की ओर हुआ और वह संघ की विचारधारा के प्रभाव में आकर अपने पिता को अंगरेजों का पिट््ठू तक समझने लगता है। 

सुधीर का जो चरित्र मृदुला गर्ग ने उकेरा है वह बेहद जटिल और उलझा हुआ है। सुधीर के मनोविज्ञान का विश्लेषण करना आसान नहीं है। संघ की ओर झुकी आत्मा के आधार पर सुधीर अपने पिता से नफरत करता है, लेकिन जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद उसके कुछ दोस्त मिठाई बांटने चलने को कहते हैं, तो वह आक्रामक हो जाता है। पर सुधीर यहीं रुकता है। कालांतर में जब वह धनबाद में नौकरी करने जाता है या फिर अपनी फैक्ट्री लगाता है तो मजदूरों के हितों की वकालत करते हुए कॉमरेड नजर आता है। इतने जटिल चरित्र की रचना करते हुए भी मृदुला गर्ग उसको अंत तक संभालने में कामयाब रही हैं। कह सकते हैं कि ऊपर से देखने में यह उपन्यास भले पारिवारिक, पिता-पुत्र के संबंधों और द्वंद्वों पर लिखा गया लगे, लेकिन अगर गहनता और सूक्ष्मता से पड़ताल करें तो आजादी के पहले और उसके बाद के दौर की राजनीति और नौकरशाही पर भी यह टिप्पणी करता चलता है। 

अंत में अचला बंसल की एक अपेक्षाकृत छोटी कहानी ‘कैरम की गोटियां’ है। इसका आकार भले छोटा है, लेकिन कैनवस बड़ा है। जिस तरह मंजुल और मृदुला ने अपने उपन्यासों में ग्रामीण परिवेश को कथा का आधार बनाया है, वहीं अचला ने शहरी परिवेश के आधार पर कहानी बुनी है। यहां पीढ़ियों के बदलाव का मनोविज्ञान है। ‘कैरम की गोटियां’ं दरअसल, जिंदगी की काली-सफेद गोटियां हैं, जो पात्रों को चुनौती देती हैं। इन तीनों रचनाओं को पढ़ने के बाद सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि इनके रचनाकारों ने अपने समय का इतिहास नहीं लिखा, बल्कि अपने समय के इतिहास का इस्तेमाल किया है। नतीजा यह कि बदले हुए वक्त में भी ये रचनाएं वर्तमान से कदमताल कर सकती हैं। 

बिसात: तीन बहनें तीन आख्यान: मृदुला गर्ग; राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली; 350 रुपए।


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