मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
विचारधारा के विरोधाभास PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Saturday, 26 July 2014 12:38

अनिल चमड़िया

 जनसत्ता 26 जुलाई, 2014 : दिल्ली में धर्मनिरपेक्ष संगठनों के हाल में हुए कार्यक्रम ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सांसद देवीप्रसाद त्रिपाठी ने एक दिलचस्प सूचना दी। उन्होंने बताया कि सोलह मई को, लोकसभा चुनाव के नतीजे आते ही, उनकी पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने उन्हें फोन पर कहा कि सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को फिर से कैसे खड़ा किया जाए, इसके लिए कुछ सोचना होगा। यह अजीब लग सकता है कि शरद पवार कांग्रेस का ताकतवर बने रहना क्यों जरूरी समझते हैं। या कम से कम कांग्रेस की संसद में मौजूदा स्थिति को अच्छा संकेत नहीं मान रहे हैं। कांग्रेस की लोकसभा में मौजूदा स्थिति 1952 की पहली लोकसभा की स्थिति से उलट गई है। तब कांग्रेस के सामने संसद में कोई मान्यता प्राप्त विपक्षी पार्टी नहीं थी।

जद (एकी) के सांसद पवन कुमार वर्मा ने भी सोलहवीं लोकसभा में कांग्रेस की स्थिति पर इस चिंता को साझा किया और कांग्रेस को खड़ा करने की जरूरत पर बल दिया। उस कार्यक्रम में शामिल संसदीय पार्टियों के प्रतिनिधियों में भाजपा का कोई प्रतिनिधि नहीं था। लेकिन यह दिलचस्प है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग भी इस बात को दोहराते रहे हैं कि वे कांग्रेस को जिंदा रखना चाहते हैं। 

इस पहलू पर बातचीत से पहले जरूरी है कि संसदीय मंचों पर जो पार्टीगत स्थिति रही है उस पर एक नजर डाल ली जाए। तेरह मई 1952 को जब पहली लोकसभा की पहली बैठक शुरू हुई तब वहां बीस पार्टियां थीं। उनमें चौदह पार्टियों के चौवालीस सदस्य थे, और बाकी छह पार्टियों के सदस्य थे। भाजपा तब जनसंघ थी। जनसंघ को मात्र तीन सीटें मिल सकी थीं। तब से संसदीय पार्टियों की तादाद काफी बढ़ी है। निर्वाचन आयोग के समक्ष पंजीकृत पार्टियों की संख्या सैकड़ों में है। संसदीय मंचों पर मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां भी दर्जनों हैं। इससे यह भ्रम पैदा होता है कि देश में विचारों की स्वतंत्रता है और पार्टियों के बीच विचारों के स्तर पर बुनियादी फर्क हैं, या फिर वैकल्पिक विचारधारा पर आधारित पार्टियां आकार ले रही हैं। 

किसी भी विचारधारा का एक रूप नहीं होता है। वह विभिन्न र्इंटों की सतहों के सहारे ही एक मुकम्मल दीवार की शक्ल हासिल करती है। देश में पार्टियां इतनी जरूर हैं लेकिन एक दूसरे से विचारधारात्मक स्तर पर जुड़ी हैं। अगर शरद पवार को लगता है कि कांग्रेस का मजबूत होना जरूरी है तो इसीलिए कि यह उनकी पार्टी जैसी किसी एक प्रदेश में सक्रिय पार्टी के अस्तित्व के लिए भी जरूरी है। 

ऐसे क्षेत्रों के आधार पर जो पार्टियां बनी हुई हैं उनके लिए यह जरूरी है कि अखिल भारतीय स्तर पर सत्ता के केंद्रीकरण का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों में कांग्रेस या भाजपा मजबूत हो। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि ये संसदीय राजनीति में विचारधारात्मक स्तर पर विकेंद्रीकरण और राष्ट्रव्यापी समानता की राजनीति के हिस्से नहीं रह गए हैं। ये सत्ता के केंद्रीकरण और वर्चस्व की विचारधारा के हिस्से बन कर संसदीय राजनीति में अपनी जगह बना कर ही रह सकते हैं।

जवाहरलाल नेहरू ने 1952 में अपनी चुनावी यात्रा लुधियाना से सांप्रदायिकता के खिलाफ युद्ध से की। युद्ध शब्द का ही तब इस्तेमाल किया गया था। तब नेहरू का कहना था कि इन सांप्रदायिक शक्तियों के पीछे हर प्रकार की प्रतिक्रियावादी सामाजिक ताकतें हैं। कुछ पुराने शासक राजा अपनी सत्ता खो बैठने के कारण, लेकिन साथ ही बड़े धन के मालिक, जागीरदार, बड़े जमींदार, और कुछ बड़े पूंजीपति इन सांप्रदायिक संस्थाओं का समर्थन करते हैं। उनका मानना था कि ये सांप्रदायिक संस्थाएं, विचारधारा और तकनीक में फासिस्ट हैं। वे हिंसा और गड़बड़ी फैलाती हैं और जनता को आतंकित करती हैं या उनके बीच संकीर्ण भावनाएं उभारती हैं। 

सांप्रदायिकता के खिलाफ जवाहरलाल नेहरू जो धर्मनिरपेक्षता की एक मुकम्मल विचारधारा विकसित करने पर जोर दे रहे थे उसके लिए उक्त अंशों का विश्लेषण किया जाना चाहिए। वे सांप्रदायिकता के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आधारों को स्पष्ट करते हैं। लेकिन विरोधाभास यह है कि नेहरू सांप्रदायिकता के इन आधारों के खिलाफ युद्ध पर जोर नहीं देते और धर्मनिरपेक्षता को बतौर एक विशेष विचारधारा के विकसित होने पर जोर देते हैं। 

  धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा के मूल में विकेंद्रीकरण है। सत्ता का केंद्रीकरण धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा की सतह यानी र्इंट नहीं हो सकता है। इसीलिए नेहरू के बाद धर्मनिरपेक्षता को महज संसदीय जीत-हार के समीकरण के रूप में ही कांग्रेस ने लिया। यह संसदीय राजनीति में जीत के लिए हाथों से र्इंट फेंकने की तरह इस्तेमाल हुआ।

विचारधारा की सतहों को समझने के लिए गांधी के भी एक उदाहरण को यहां उद्धृत किया जा सकता है। छुआछूत विरोधी आंदोलन को लेकर महात्मा गांधी का यह भी मानना था कि इस आंदोलन का प्रभाव सांप्रदायिकता और ऐसे ही अन्य मुद््दों पर भी पड़ेगा। क्योंकि हिंदू (गांधी सवर्णों और उनके धार्मिक प्रभाव को इसी शब्द से संबोधित करते थे) गैर-हिंदू लोगों को अछूत ही मानते हैं, विशेषकर खाने-पीने के मामले में। एक विचारधारा की परत-दर-परत होती है। 

सांप्रदायिकता की विचारधारा ने भी अपनी परतें तैयार की हैं और उसका उसके तमाम पुराने आधारों के साथ ही विस्तार हुआ है। लेकिन अपने समाज और संसदीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा महज धार्मिक अल्पसंख्यक तक नहीं बल्कि मुसलिम मतदाताओं तक सिमट गई। सांप्रदायिकता की विचारधारा


के विस्तार और उसके बरक्स समाज को समानता के आधार पर विकसित करने की तमाम राजनीतिक शास्त्र की अवधारणाएं संसदीय राजनीति में सिमटती चली गई हैं। इसका एक उदाहरण सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर विशेष अवसर (आरक्षण) देने की राजनीति को भी देखा जाना चाहिए।

सामाजिक आरक्षण के मूल में विकेंद्रीकरण है। विकेंद्रीकरण का अर्थ इसमें निहित नहीं है कि किसी दलित या पिछड़ी जाति का नेतृत्व और किसी प्रशासनिक इकाई को नियंत्रित करने वाले प्रदेश-स्तरीय राजनीतिक ढांचे पर उस पार्टी का नेतृत्व हो जो कि उसी प्रदेश तक सीमित है। मसलन मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव आदि का सत्ता में प्रतिनिधित्व या सत्ता में नेतृत्व सामाजिक न्याय की विचारधारा का पर्याय नहीं है। सामाजिक न्याय की विचारधारा की सतह इस रूप में तैयार नहीं हो सकती है कि तमाम पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बीच अपने-अपने वर्चस्व की होड़ विकसित हो। इस तरह जातियों को वोट में तब्दील कर देने का खतरा विचारधारा के स्तर पर जातियों को केंद्रीकृत और वर्चस्ववादी सत्ता की विचारधारा की तरफ ही ले जाना है। यह पिछले चुनाव में साफ-साफ दिखा भी है।   

किसी एक रूप में ही विचारधारा को देखने और समझने की जो पद्धति संसदीय राजनीति ने समाज को दी है उसने विचारधारात्मक संघर्ष को लचर बना दिया है। सांप्रदायिकता केंद्रीकृत सत्ता की ही विचारधारा की मजबूत सतह हो सकती है। जिस केंद्रीकृत सत्ता को मजबूत केंद्र और राष्ट्रवाद जैसी शब्दावली से संबोधित किया जाता है वह अपने मूल स्वभाव में संपन्न प्रदेशों, संपन्न वर्गों, जातियों के समृद्ध समूहों के वर्चस्व को ही मजबूत करती रहती है। विश्लेषण यह किया जाना चाहिए कि कैसे लोकतंत्र की आड़ में नेहरू के जमाने की स्थितियां देखते-देखते उलट गर्इं और सांप्रदायिकता की विचारधारा ने कैसे अपने लिए कितनी परतें और सतहें तैयार कर ली हैं। 

अनेक तरह के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सरोकार ही विचारधाराओं की सतहें होते हैं। उन सतहों को छोड़ देने का मतलब खुद के अस्तित्व को दांव पर लगाना है।

विकेंद्रीकरण की विचारधारात्मक सतहें लोकतांत्रिक भावनाएं और उनसे जुड़े क्रियाकलापों की बरकरारी से ही हो सकती हैं। अगर आज राजनीतिक पार्टियां कश्मीर, मणिपुर, असम समेत विभिन्न प्रांतों के आदिवासी बहुल इलाकों में दमन, उत्पीड़न और जमीन से बेदखली के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सेदारी से दूर चली गई हैं तो इसका अर्थ यह है कि वे पूरी तरह से सत्ता के केंद्रीकरण की विचारधारा की तरफ रुख कर चुकी हैं। प्रांतों के स्तर पर सक्रिय रही पार्टियां वास्तव में राष्ट्रीय पार्टियां हैं अगर वे विकेंद्रीकरण और समानता की विचारधारा की हिमायत करती हैं। वे क्षेत्रीयता की भाषा में तब संबोधित होती हैं जब वे केंद्रीकृत सत्ता की शाखाएं हो जाती हैं। अपने यहां की संसदीय राजनीति की यात्रा में ये पार्टियां इसीलिए कांग्रेस और अब भाजपा पर भी आश्रित होती गई हैं। 

शरद पवार जैसों की पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों की विचारधारात्मक परतें हैं; कभी भी दोनों के नेतृत्व के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं हो सकती। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के उनतीस घटकों का विश्लेषण करें। वे तमाम पार्टियां सत्ता के विकेंद्रीकरण की पुख्ता विचारधारा की कोख से निकली हैं लेकिन मौजूदा स्थिति यह है कि वे सांप्रदायिकता की धुरी पर खड़ी विचारधारा के नेतृत्व पर आश्रित हैं।

कांग्रेस ने जब अपने पचमढ़ी मिलन में प्रांतों तक सिमटी पार्टियों के साथ चुनावी समझौता करने का फैसला किया था तब वह भी सत्ता के केंद्रीकरण के लिए परतों के रूप में उनका इस्तेमाल करने के उद््देश्य से किया था। राजनीति की इस यात्रा को इस तरह से देख सकते हैं कि कांग्रेस उन घटकों की नेता है जो भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ नहीं जा सकते हैं। कांग्रेस बिना किसी विचारधारा के एक चुनावी मंच के रूप में सिमट गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बनने से पहले कांग्रेस को ही हिंदुत्व का प्रतिनिधि माना जाता था। सांप्रदायिकता ने कांग्रेस से अपनी विचारधारा के विस्तार का काम लिया। 

यह बताने की जरूरत नहीं है कि पैंसठ वर्षों में सांप्रदायिकता की विचारधारा का विकास कांग्रेस के भीतर घुस कर ही तेजी के साथ हुआ है। 1970 के बाद के घटनाक्रम पर निगाह डाली जा सकती है। इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा हमेशा एक राजनीतिक ताकत के रूप में कांग्रेस को ही पेश करते रहे हैं। कांग्रेस की विचारधारात्मक जरूरतें उसके वाम झुकाव और वाम सहयोग से होती रही हैं। लेकिन उसकी दिक्कत यह रही है कि उसकी जगह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संसदीय पार्टी लेती चली गई और वह अब तक अपने अंतर्विरोधों को हल नहीं कर सकी है।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?