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अधिग्रहण की जमीन PDF Print E-mail
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Friday, 25 July 2014 12:24

जनसत्ता 25 जुलाई, 2014 : सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने जिस तरह एक बार फिर मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून को विकास परियोजनाओं में बाधा करार देते हुए इसमें संशोधन पर बल दिया है, उससे जाहिर है कि सरकार जल्दी ही इस दिशा में कोई कदम उठा लेना चाहती है। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही इस कानून में बदलाव को लेकर बयान आने शुरू हो गए थे। इससे स्वाभाविक ही कयास लगाए जाने लगे थे कि सरकार भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण संबंधी कानूनों में कठोर शर्तों के चलते कॉरपोरेट जगत को आने वाली मुश्किलें दूर करना चाहती है। यूपीए सरकार के समय अप्रैल में इन कानूनों को लचीला बनाने को लेकर हुई सर्वदलीय बैठक में जहां तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और माकपा सहित कई दल विरोध में खड़े थे, भाजपा ने कुछ शर्तों के साथ सरकार को समर्थन देना स्वीकार किया था। तब भाजपा की शर्त थी कि भूमि अधिग्रहण कानूनों को लचीला बनाने के साथ-साथ पट््टे पर जमीन देने का भी प्रावधान होना चाहिए, ताकि जमीन का मालिकाना हक किसानों के पास बना रहे और मुआवजे की दर कुछ पहले से लागू की जाए। यूपीए सरकार ने उसकी ये शर्तें मान ली थीं। नरेंद्र मोदी सरकार के सामने इन कानूनों में बदलाव को लेकर वैसी बाधा नहीं है, जैसी यूपीए के सामने थी। इसलिए वह इन कानूनों को कितना व्यावहारिक रूप देती है, देखने की बात है। 

विकास परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों और राज्य सरकारों के बीच टकराव की स्थितियां लगभग हर राज्य में देखी गई हैं, तो इसकी बड़ी वजह किसानों के हितों पर उचित ध्यान न दिया जाना है। इन विवादों की जड़ में समस्या केवल मुआवजे का उचित भुगतान नहीं है। पुनर्वास नीति और अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि की प्रकृति का ठीक निर्धारण न होना बड़े पेच हैं। कायदे से उपजाऊ जमीन को विकास परियोजनाओं के दायरे से दूर रखा जाना चाहिए। मगर सड़क, रेल और परमाणु ऊर्जा जैसी परियोजनाओं के मामले में इस नियम को अलग रखा गया है। जब


देश में बंजर भूमि का रकबा काफी बड़ा है, कारखानों आदि के लिए उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण से परहेज की स्वाभाविक अपेक्षा की जाती है। फिर सड़कों, रेल आदि के निर्माण के नाम पर जमीन अधिग्रहण से शायद किसानों को उतनी परेशानी न हो, जितनी सड़क निर्माण के साथ-साथ इनके किनारे शहरी योजनाएं शुरू करने, व्यावसायिक केंद्र, बाजार, भंडारण केंद्र आदि विकसित करने के लिए निजी कंपनियों के उपजाऊ जमीन हथियाने से पैदा होती है। किसानों और राज्य सरकारों के बीच टकरावों को देखते हुए इस नियम पर कड़ाई से पालन की जरूरत रेखांकित की गई कि पंचायतों की स्वीकृति के बिना निजी कंपनियां जमीन अधिग्रहीत नहीं कर सकेंगी। मगर विरोध की स्थिति में राज्य सरकारें खुद कंपनियों के साथ खड़ी हो जाती हैं। वे जबरन जमीन का अधिग्रहण कर निजी कंपनियों को कुछ ऊंचे दामों पर बेच देती हैं। नरेंद्र मोदी सरकार ने सौ नए शहर बसाने और गांवों के शहरीकरण की योजना तैयार की है। इसकी घोषणा बजट में भी की जा चुकी है। फिर उसकी नीतियों में उद्योग समूहों के हित सर्वोपरि नजर आ रहे हैं। ऐसे में भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव को लेकर उसकी जल्दबाजी समझी जा सकती है। मगर इसमें अगर किसानों के हितों को नजरअंदाज कर निजी कंपनियों के दबाव का खयाल रखा गया तो विरोध की गुंजाइश शायद कभी खत्म न होगी। 


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