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प्रबंधन पर सियासत PDF Print E-mail
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Friday, 25 July 2014 12:24

जनसत्ता 25 जुलाई, 2014 : शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक समिति का सिख राजनीति पर कितना गहरा असर है और चुनावों में सिख मतों को प्रभावित करने में इसकी क्या भूमिका है, यह छिपी बात नहीं है। शायद यही वजह है कि पंजाब और हरियाणा सहित कुछ राज्यों के ज्यादातर राजनीतिक दल इस समिति पर कब्जे या इसमें अपना प्रभाव बढ़ाने की हर संभव कोशिश करते हैं। हरियाणा में गुरद्वारों के प्रबंधन के लिए अलग प्रबंधक समिति का गठन इसी कवायद की एक कड़ी है। लेकिन जिस तरह गुरद्वारा प्रबंधक समिति में एक मजबूत दखल के जरिए सिख राजनीति पर अकाली दल का कब्जा रहा है, उसमें इस पर विवाद खड़ा होना स्वाभाविक परिणति है। इसके अलावा, केंद्र में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ उसका गठजोड़ रहा है। शायद इसीलिए हरियाणा में सत्ताधारी कांग्रेस के साथ इस मसले पर दोनों पक्षों के बीच सीधे टकराव की स्थिति पैदा हुई है। हालांकि राजनीतिक हलकों में केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में दिए गए दखल को गैरजरूरी करार दिया जा रहा है। मगर हालत यह है कि एक ओर गृह मंत्रालय ने हरियाणा सरकार को अनुच्छेद 355 के तहत संदेश भेज कर संविधान की सीमा में रह कर काम करने की हिदायत दी, वहीं हरियाणा के मंत्री हरमोहिंदर सिंह चट्ठा ने केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर हरियाणा सरकार को बर्खास्त करने तक की चुनौती दे डाली और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने इस मसले पर इस्तीफा देने की भी धमकी दी। तल्खी और तनाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मुद्दे पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका खड़ी हो गई है। 

हरियाणा विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं। धार्मिक संस्थाओं के जरिए मतदाताओं को अपने पक्ष में करने कोशिशें छिपी नहीं हैं। लिहाजा गुरद्वारों के प्रबंधन पर अपना प्रभाव कायम करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच रस्साकशी इसलिए चलती रहती है कि इसमें जिसका दखल रहता है, स्थानीय राजनीति और मतदाताओं को प्रभावित करने में वह ज्यादा कामयाब होता है। गौरतलब है कि पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में गुरद्वारों


की देखभाल की जिम्मेदारी शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक समिति के पास है। इसके अलावा, दिल्ली गुरद्वारा प्रबंधक समिति को भी इसके दायरे में माना जाता है। हरियाणा के लगभग आठ फीसद सिख मतदाताओं के वोट हासिल करने के मकसद से अलग गुरद्वारा प्रबंधक समिति का गठन कांग्रेस का पुराना चुनावी वादा रहा है। अब राज्य में गुरद्वारों के प्रबंधन के लिए अलग समिति के गठन के लिए बाकायदा एक विधेयक कानून का दरजा हासिल कर चुका है। जाहिर है, गुरद्वारा प्रबंधक समिति में पहले से अपना असर रखने वाले शिरोमणि अकाली दल को यह अपनी राजनीति में दखल लग रहा है। इस मसले पर शिरोमणि अकाली दल जिस संवैधानिक प्रावधान के उल्लंघन का हवाला दे रहा है, उसके मुताबिक अंगरेजों के शासनकाल में बने गुरद्वारा अधिनियम 1925 के तह गठित गुरद्वारा प्रबंधक समिति के कार्यक्षेत्र में दखल देने का अधिकार पंजाब के बंटवारे के बाद गठित तीनों राज्य सरकारों को नहीं है। वहीं हरियाणा सरकार की ओर से समिति के गठन को संविधान के मुताबिक बताया जा रहा है। जो हो, अगर मामला संविधान के प्रावधानों के खिलाफ जाने का है तो इसका हल कानूनी प्रक्रिया से ही निकल सकता है। लेकिन सभी जानते हैं कि कब्जेदारी की यह होड़ गुरद्वारा प्रबंधक समिति की गरिमा को बहाल रखने की कम और उसके जरिए अपनी राजनीतिक हैसियत को बचाए रखने या उसके विस्तार की ज्यादा है। 


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