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यौन अपराध का ताना-बाना PDF Print E-mail
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Friday, 25 July 2014 12:22

अनंत विजय

 जनसत्ता 25 जुलाई, 2014 : पिछले दिनों दो ऐसी खबरें आर्इं, जो किसी भी सभ्य समाज के मुंह पर तमाचे की तरह हैं।

पहली खबर थी बंगलुरु के एक स्कूल में छह साल की मासूम के साथ वहीं के दो कर्मचारियों द्वारा बलात्कार की। दूसरी खबर बलात्कार की कोशिश और कत्ल की है। यह वारदात लखनऊ के पास मोहनलालगंज में हुई, जहां दो बच्चों की मां के साथ बलात्कार की कोशिश की गई और नाकाम रहने पर वहशियाना तरीके से पीट-पीट कर उसकी हत्या करने के बाद एक स्कूल के पास बगैर कपड़ों के फेंक दिया गया। एक शख्स ने इस महिला के साथ दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से जो सच सामने आया वह दिल दहलाने वाला है। आरोपी ने महिला के गुप्तांग समेत पूरे शरीर पर गहरे जख्म किए। पुलिस के मुताबिक जिस अस्पताल में महिला काम करती थी उसके पास की इमारत के गार्ड ने इस वारदात को अंजाम दिया। 

इन दोनों खबरों का सरोकार देश के हर सूबे से है। हर घर से है। हर माता-पिता से है। बंगलुरु में छह साल की मासूम बच्ची के साथ स्कूल में बलात्कार की खबर  सामने आने के बाद वहां के अभिभावकों में यह चिंता बढ़ गई है कि पता नहीं स्कूल के वे कर्मचारी कब से और कितनी बच्चियों का यौन शोषण या फिर छेड़छाड़ कर रहे थे। क्या कुछ अन्य अभिभावकों को अपनी बच्चियों के साथ छेड़छाड़ की नापाक हरकतों की जानकारी थी और वे बदनामी के डर से मामले को छोटा मान कर भुला चुके थे! 

स्कूलों में बच्चों के साथ यौन शोषण के मामलों में अक्सर यह देखने में आता है कि जब माता-पिता शिकायत लेकर जाते भी हैं तो स्कूल प्रशासन जांच की बात कह कर मामले को दबा देता है। परोक्ष रूप से अभिभावकों को भी स्कूल का नाम खराब होने की दुहाई या धमकी देकर मुंह बंद रखने की हिदायत दी जाती है। बच्चों के खिलाफ यौन शोषण को रोकने के लिए लागू हुए प्रोटेक्शन आॅफ चाइल्ड अगेंस्ट सेक्सुअल अफेंस एक्ट (पॉक्सो) में आरोपियों को बचाने वालों या मामले को दबाने की कोशिश करने या फिर मामले बिगाड़ने वालों के लिए महज छह महीने की सजा का प्रावधान है, लेकिन स्कूल या संस्थान के खिलाफ किसी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। इस वजह से स्कूल प्रशासन ज्यादातर ऐसे मामलों को आपसी समझौतों से दबा देने की कोशिश करता है। 

समान्यतया अभिभावक भी बच्चों को स्कूल में आगे दिक्कत न हो, यह सोच कर हालात से समझौता कर लेते हैं। इसी समझौते से अपराधियों को ताकत मिलती है। उन्हें लगता है कि स्कूल परिसर में अपराध करने से प्रशासन उसको दबाने में जुट जाएगा। लिहाजा वे इस तरह के अपराध के लिए स्कूल के कोने-अंतरे को ही चुनते हैं। बंगलुरु के स्कूल में हुई वारदात में इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि क्या वहां बच्चियों के यौन शोषण या छेड़छाड़ की कोई शिकायत पहले आई थी और स्कूल प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की थी। 

अगर ऐसी बात सामने आती है तो स्कूल के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ भी पॉक्सो की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि आरोपी ने स्कूल में बच्ची के साथ बलात्कार किया तो स्कूल प्रशासन को इस बात की भनक लगी थी या नहीं और उसकी क्या भूमिका थी। 

स्कूलों में बच्चों के यौन शोषण की वारदात को अंजाम देने वाले अपराधी दरअसल यौन कुंठा के शिकार होते हैं और मानसिक रूप से विकृत भी। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसे अपराधी यौन आनंद के लिए बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं। 

यह एक ऐसी मानसिकता है, जो अपराधी को वारदात अंजाम देने के बाद एक खास किस्म का रोमांच देती है। इस तरह के अपराधी, आम अपराधियों से ज्यादा शातिर होते हैं। उन्हें इस बात का अंदाजा होता है कि स्कूल उसके अपराध को तूल नहीं देगा। लिहाजा वे अपराध को स्कूल परिसर में अंजाम देने से नहीं हिचकते। 

चंद महीने पहले दक्षिणी दिल्ली के एक स्कूल के स्टाफरूम में कई बच्चियों के यौन शोषण की खबर आई थी। दिल्ली में ही एक कैब ड्राइवर महीनों तक एक बच्ची का यौन शोषण करता रहा था। सवाल यह है कि स्कूल की क्या जिम्मेदारी है। क्या कोई भी स्कूल यह कह कर पल्ला झाड़ सकता है कि अमुक शख्स ने वारदात को अंजाम दिया इसलिए कानून के हिसाब से उसको सजा मिलेगी। स्कूल की यह जिम्मेदारी भी है कि उसके परिसर में या फिर स्कूल आने और जाने के वक्त बस में बच्चे सुरक्षित रहें। बच्चों की समय-समय पर काउंसलिंग भी होनी चाहिए, ताकि उनके खिलाफ हो रहे इस तरह के अपराध उजागर हो सकें। 

बच्चों को इस तरह के अपराध के बारे में जागरूक करने के लिए स्कूल के साथ-साथ अभिभावकों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। अभिभावकों को तो अपराध के बाद साहस के साथ सामने आना होगा। 

इस तरह के अपराध को रोकने के लिए कानून से ज्यादा जरूरी है जागरूकता। स्कूलों में एक नियमित अंतराल पर शिक्षकों के लिए भी काउंसलिंग की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि वे जागरूक हो सकें। कानून का भय और समाज में जागरूकता बढ़ा कर ही बच्चों के साथ यौन शोषण जैसे घिनौने कृत्य रोके जा सकते हैं। इस काम में देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अपनी भूमिका निभाए। अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो देश के भविष्य


को बेहतर नहीं बना सकते हैं। बच्चों को देश में सुरक्षित माहौल देना हमारा दायित्व ही नहीं कर्तव्य भी है। 

मलेशियाई विमान हादसे में करीब तीन सौ लोगों के मारे जाने की खबर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मचे कोलाहल और शोरगुल के बीच दो दिनों तक राष्ट्रीय मीडिया इन दो खबरों को उस आवेग से नहीं उठा पाया, जिसकी ये हकदार हैं। देर से ही सही, मीडिया ने इस ओर ध्यान दिया। लखनऊ का हत्याकांड दिल्ली के निर्भया कांड जैसा ही जघन्य है। दिल्ली में निर्भया बलात्कार के वक्त इस घिनौनी वारदात के खिलाफ माहौल बनाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और लगातार कवरेज की वजह से सरकार बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बनाने को मजबूर हुई थी। सोनिया गांधी से लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को सामने आकर बयान देना पड़ा था। बलात्कारियों को सख्त से सख्त सजा के लिए न्यायमूर्ति जेएस वर्मा के सुझावों पर कानून में बदलाव किए गए थे, पर चिंता का सबब तो कड़े कानून के बावजूद ऐसे अपराधों पर अंकुश नहीं लग पाना भी है। 

दरअसल, अगर गहराई में विचार करें तो बलात्कार हमारे समाज का एक ऐसा नासूर है, जिसका इलाज कड़े कानून के अलावा हमारे रहनुमाओं की इससे निबटने की प्रबल इच्छाशक्ति का होना भी है। बलात्कार से निबटने के लिए समाज के रहनुमाओं की इच्छाशक्ति तो दूर की बात है, जरा महिलाओं को लेकर उनके विचार देखिए। शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद कहते हैं- लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है। कुदरत ने, अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वे घर संभालें और अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें। राम जन्मभूमि न्यास के महंथ नृत्यगोपाल दास की बात सुनिए: महिलाओं को अकेले मठ, मंदिर और देवालय में नहीं जाना चाहिए। अगर वे मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पति, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए, नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है। 

अब जरा महिलाओं को लेकर राजनेताओं के विचार जान लेते हैं। लंबे समय तक गोवा के मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस नेता दिगंबर कामत ने कहा था: महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए, क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है। समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आने वाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव का बयान: अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वे संसद में आर्इं तो वहां सीटियां बजेंगी। पूर्व कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने तो सारी हदें तोड़ते हुए कहा था कि: बीवी जब पुरानी हो जाती है तो मजा नहीं देती है। इन बयानों को देख कर ऐसा लगता है कि महिलाओं के प्रति हमारे समाज का सोच धर्म, जाति, संप्रदाय से ऊपर उठ कर तकरीबन एक है और यही सोच महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध की जड़ में है। 

धर्मगुरुओं और नेताओं के इस तरह के बयानों से समाज के कम जागरूक लोगों में यह बात घर कर जाती है कि महिलाएं तो मजा देने के लिए हैं या मजे की वस्तु हैं। इस तरह के कुत्सित विचार जब मन में बढ़ते हैं तो वे महिलाओं के प्रति अपराध की ओर प्रवृत्त होते हैं। उन्हें इस बात से बल मिलता है कि उनके नेता या गुरु तो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते ही नहीं हैं। 

सर्वोच्च न्यायालय भी समय-समय पर बलात्कार के खिलाफ चिंता जता चुका है। कुछ वक्त पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने यह जानना चाहा था कि क्या समाज और व्यवस्था में कोई खामी आ गई है या सामाजिक मूल्यों में गिरावट आती जा रही है या पर्याप्त कानून नहीं होने की वजह से ऐसा हो रहा है या फिर कानून को लागू करने वाले इसे ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं। कानून लागू करने वालों की बलात्कार को लेकर क्या राय है, वह मुलायम सिंह यादव बता चुके हैं। मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार के बारे में बहुत ही लापरवाह तरीके से कहा कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। उत्तर प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार हो और उसके मुखिया कहें कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं तो फिर तो इस तरह की ‘गलतियों’ को पुलिस भी उसी आलोक में देखेगी और तफ्तीश करेगी। 

बलात्कार के खिलाफ कानून लागू करने वालों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का सवाल उचित है। इसके बारे में पूरे समाज को गंभीरता से विचार करना होगा। समाज के हर तबके के लोगों को बलात्कार के इस नासूर के खिलाफ एक जंग छेड़नी होगी, ताकि हमारी बेटियां और बहनें महफूज रह सकें। राजनीतिक बिरादरी को संवेदनशीलता दिखाते हुए इस बारे में आगे आकर पहल करनी होगी। 


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