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विधायिका का दामन PDF Print E-mail
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Thursday, 24 July 2014 11:49

जनसत्ता 24 जुलाई, 2014 : विधि आयोग ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि विधायिका में दागियों का प्रवेश रोकने के लिए आरोप तय होते ही अयोग्यता का प्रावधान होना चाहिए। यह कोई नया सुझाव नहीं है। निर्वाचन आयोग पिछले पंद्रह साल में कई बार इसकी सिफारिश कर चुका है। लेकिन इस बारे में तब तक कुछ नहीं हो सकता जब तक सरकार या प्रमुख राजनीतिक दल राजी न हों, क्योंकि जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के बगैर यह संभव नहीं है। विभिन्न पार्टियों ने निर्वाचन आयोग की सिफारिश को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लिहाजा, अंदाजा लगाया जा सकता है कि विधि आयोग के सुझाव का क्या हश्र होगा। चुनावी इतिहास यही बताता है कि पार्टियां राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए संजीदा नहीं रही हैं, वे ऐसे लोगों को भी उम्मीदवार बनाती हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे होते हैं। धनबल और बाहुबल जुटाने के चक्कर में उनकी यह कमजोरी बढ़ती गई है। वर्ष 2004 में जो लोग लोकसभा में पहुंचे उनमें चौबीस फीसद आपराधिक मामलों में आरोपी थे। वर्ष 2009 में यह आंकड़ा बढ़ कर तीस फीसद हो गया और सोलहवीं यानी वर्तमान लोकसभा में चौंतीस फीसद। 

यही हाल विधानसभाओं में भी है। इनमें से कई लोग मंत्रिमंडल में भी जगह पा जाते हैं। इससे विचित्र स्थिति और क्या होगी कि ऐसे लोग कानून बनाने और कानून का पालन सुनिश्चित करने के स्थान पर विराजमान हो जाएं। संसदीय लोकतंत्र का दारोमदार सबसे ज्यादा राजनीतिक दलों पर होता है, पर वही इस हालत के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनहीन दिखते हैं। अगर कुछ सकारात्मक पहल हुई है तो उसका श्रेय सर्वोच्च न्यायालय को जाता है। अदालत के ही आदेश पर उम्मीदवारों के लिए अपनी आय-संपत्ति और अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया, जबकि अधिकतर पार्टियां इसके पक्ष में नहीं थीं। फिर, साल भर पहले सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि निचली अदालत से दोषी ठहराए जाते ही आरोपी जनप्रतिनिधि सदन की सदस्यता के अयोग्य मान लिए जाएंगे। इसके चलते तीन सांसदों की सदस्यता जा चुकी है। इस फैसले से पहले, दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधि ऊपरी अदालत में अपील कर अपनी सदस्यता बनाए रखते थे। लेकिन सर्वोच्च अदालत की तरफ से दी गई अयोग्यता संबंधी


यह व्यवस्था फैसले की तारीख से लागू हुई, यानी दस जुलाई 2013 से पहले दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। 

इस साल मार्च में सर्वोच्च न्यायालय ने एक और अहम फैसला सुनाया, वह यह कि जनप्रतिनिधियों से संबंधित मामले निचली अदालत में आरोप तय होने के एक साल के भीतर निपटा दिए जाएं। अयोग्यता संबंधी उसके पिछले फैसले से जोड़ कर यह उम्मीद की गई कि अब दागी सांसदों-विधायकों के लिए ज्यादा समय तक अपनी सदस्यता बनाए रखना संभव नहीं होगा, और पार्टियों को भी सबक मिलेगा। मगर सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बावजूद संबंधित मामलों की सुनवाई में कोई तेजी नहीं दिखती। आरोपियों के रसूख और रुतबे को देखते हुए पुलिस ऐसे मामलों की जांच में कोताही बरतती और टोलमटोल करती रहती है, जिससे आरोप तय होने में ही बहुत समय लगता है। निर्वाचन आयोग का सुझाव था कि आरोप तय होते ही उम्मीदवार की अयोग्यता का प्रावधान उसी स्थिति में लागू हो जब आरोप चुनाव से छह महीने पहले तय किए गए हों। विरोधी दलों के राजनीतिकों को झूठे मुकदमों में फंसाए जाने की आशंका जताए जाने पर बाद में उसने इस अवधि को एक साल करने का प्रस्ताव रखा। मगर पार्टियों ने तब भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यह सचमुच बहुत निराशाजक स्थिति है। अगर पार्टियों को लगता है कि विधि आयोग और निर्वाचन आयोग के सुझाव अव्यावहारिक हैं, तो उन्हें खुद बताना चाहिए कि राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए वे कौन-से कदम उठाने को तैयार हैं! 


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