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ताक पर मर्यादा PDF Print E-mail
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Thursday, 24 July 2014 11:48

जनसत्ता 24 जुलाई, 2014 : जन-प्रतिनिधियों से लोकतंत्र की मर्यादा के अनुरूप आचरण की अपेक्षा की जाती है। पर इसकी अनदेखी के उदाहरण सामने आते रहते हैं। अगर वे सत्तापक्ष के हों तो मर्यादा की हदें पार करने से भी गुरेज नहीं करते। ताजा मामला न्यू महाराष्ट्र सदन में ठहरे शिवसेना सांसदों के व्यवहार का है। इन सांसदों की मांग थी कि उन्हें महाराष्ट्र के व्यंजन परोसे जाएं। न्यू महाराष्ट्र सदन में खानपान की जिम्मेदारी आइआरसीटीसी को सौंपी गई है, जो भारतीय रेल में खानपान सेवा संचालित करती है। ये सांसद कई दिन से सदन में बिजली, पानी, साफ-सफाई, भोजन-व्यवस्था आदि से जुड़ी शिकायतें कर रहे थे। पिछले हफ्ते इन्होंने प्रेसवार्ता बुलाई और फिर संवाददाताओं के साथ भोजन कक्ष में गए और वहां रखे बर्तन वगैरह उठा कर फेंकना शुरू कर दिया। वहां तैनात कर्मचारियों को अभद्र शब्द कहे। फिर रसोई में गए, जहां आइआरसीटीसी के आवासी प्रबंधक अरशद जुबैर कर्मचारियों को भोजन आदि से संबंधित निर्देश दे रहे थे। खबर है कि इन सांसदों ने उनकी गर्दन पकड़ी और उनके मुंह में जबरन रोटी ठूंस दी। जुबैर उस वक्त रोजे पर थे। उनकी धार्मिक भावना को जो ठेस पहुंची होगी, उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जुबैर ने अपनी वर्दी पहन रखी थी और उस पर उनके नाम की पट््िटका भी लगी थी। फिर भी शिवसेना सांसदों ने उनके साथ यह दुर्व्यवहार किया तो यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ऐसा जानबूझ कर किया होगा। 

शिवसेना के नेताओं, कार्यकर्ताओं की उग्रता किसी से छिपी नहीं है, खासकर मुसलिम समुदाय के प्रति उनका बैर-भाव जब-तब उजागर होता रहा है। लेकिन पार्टी के सांसदों ने जो शपथ ली है, क्या उनकी निगाह में उसका कोई मूल्य नहीं है? क्या अपने सांसद होने की गरिमा का इन्हें तनिक खयाल नहीं है? हालांकि इस घटना पर न्यू महाराष्ट्र सदन के आवासी आयुक्त ने आइआरसीटीसी और अरशद जुबैर से माफी मांग ली है, महाराष्ट्र के मुख्य सचिव ने घटना की जांच कराने के बाद उचित कार्रवाई का वचन भी दिया है। मगर इस तरह अरशद की भावनाओं को पहुंची


चोट पर मरहम नहीं लगाया जा सकता। इन दिनों रमजान चल रहा है और रोजा रखे किसी व्यक्ति के सामने खाना-पीना भी उचित नहीं माना जाता। ऐसे में इन सांसदों ने अरशद के मुंह में जबरन रोटी ठूंसी तो यह उनकी आस्था को चोट पहुंचाने के लिए ही किया होगा। इससे मुसलिम समुदाय के प्रति शिवसेना की नफरत की भावना एक बार फिर जाहिर हुई है। तो क्या सांसद बन जाने के बाद भी वे पूरे देश और पूरे समाज के लिए नहीं सोचते? वहां खानपान को लेकर एतराज को इस तरह जाहिर करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके विश्वास पर भी सवालिया निशान लगाता है। इसके लिए वे रसोई का ठेका किसी और कंपनी को दिलाने का सुझाव दे सकते थे। ऐसा नहीं माना जा सकता कि महाराष्ट्र सदन का प्रबंधन इतने सांसदों की मांग या उनकी शिकायतों को नजरअंदाज कर देता। मगर शिवसेना के लोग संयम नहीं जानते। जिस तरह वे जोर-जबर्दस्ती से अपनी बात मनवाने के आदी रहे हैं, पार्टी के सांसद भी उसी तरीके से न्यू महाराष्ट्र सदन में पेश आए। इस मामले में शिवसेना अफसोस जताने के बजाय अपने सांसदों की बदसलूकी को जायज ठहराने में लगी है। राजनीतिक भ्रष्टाचार की तमाम करतूतें सत्ता का बेजा फायदा उठाने का परिणाम होती हैं। पर इस तरह का व्यवहार भी सत्ता के दुरुपयोग का ही मामला है।


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