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नौकरशाही का दुर्ग-द्वार PDF Print E-mail
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Thursday, 24 July 2014 11:46

मृणालिनी शर्मा

 जनसत्ता 24 जुलाई, 2014 : संघ लोकसेवा आयोग की गिनती आजाद भारत के उन सर्वोच्च संस्थानों में की जाती है

जिनके कामकाज पर शायद ही कभी अंगुली उठी हो। एकाध बार छोटी-मोटी शिकायतें सामने आर्इं तो उनको दूर करने में आयोग ने देर नहीं की। सिविल सेवा परीक्षा के मौजूदा विवाद पर गौर करें तो आप पाएंगे कि यह भी आयोग द्वारा समय-समय पर अपनी परीक्षा प्रणाली को समाज और बदलती शिक्षा के आईने में और बेहतर बनाने की दिशा की ओर उठाए गए कदम का ही एक पक्ष है। कोठारी समिति की सिफारिशों के वर्ष 1979 से लागू होने के बाद हर दस वर्ष में समीक्षा के लिए समितियां गठित की गर्इं और उनके परिणाम भी बहुत सकारात्मक रहे हैं। 1990 में सतीशचंद्र समिति और 2000 में अलघ समिति के सुझावों को पूरे देश ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया। थोड़ी चूक 2011 में अंगरेजी के दबाव में जरूर हुई है और उपलब्ध आंकड़े भी इसके गवाह हैं। लेकिन इन्हीं आंकड़ों के आधार पर विवाद को हल भी किया जा सकता है, जिसके संकेत सरकार दे रही है। इसीलिए पहले आंकड़ों, तथ्यों के मद््देनजर इस विवाद को समझने की कोशिश करते हैं। 


मौजूदा विवाद सीसेट (सिविल सविर्सेस एप्टिट्यूट टेस्ट) 2011 की परीक्षा से शुरू हुआ है। इससे पहले तीन चरणों वाली इस परीक्षा के पहले चरण का नाम प्रारंभिक परीक्षा (प्रिलिमिनरी एग्जाम) था, जिसका उद््देश्य लाखों परीक्षार्थियों की भीड़ की छंटनी करना था ताकि मुख्य परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों की जांच एक विस्तृत परीक्षा के आधार पर गंभीरता से की जा सके। अभी तक तीन बार सिविल सर्विसेज परीक्षा सीसेट के सांचे में हो चुकी है और इन्हीं तीन सालों में भारतीय भाषाओं के माध्यम से अंतिम रूप से चुने जाने वाले उम्मीदवारों की संख्या पंद्रह-बीस प्रतिशत से घट कर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई है। 

हाल में घोषित 2014 के अंतिम परिणामों में कुल चुने हुए 1122 अधिकारियों में से भारतीय भाषाओं में परीक्षा के माध्यम से चुने गए मात्र तिरपन हैं, जिनमें छब्बीस हिंदी माध्यम से हैं। एक और चौंकाने वाला आंकड़ा है कि जहां तीन वर्ष पहले तक भारतीय भाषाओं के माध्यम से चुने जाने वाले पहले सौ रैंक में बीस से ज्यादा होते थे, अब एक भी नहीं है। एक आंकड़ा और। अंतिम सफल उम्मीदवारों में ज्यादातर इंजीनियरी और दूसरे व्यावसायिक विषयों के हैं। इतिहास, राजनीतिशास्त्र, साहित्य धीरे-धीरे शून्य की तरफ बढ़ रहे हैं और सबसे दुखद पक्ष यह कि ग्रामीण भारत पूरी तरह बाहर हो गया है। अधिकतर सफल उम्मीदवार शहरी और कोचिंग संस्थानों से निकले हैं।  

भारतीय भाषाओं के कम होने का सबसे प्रमुख कारण है सीसेट परीक्षा में लागू किए गए नए बदलाव। वर्ष 2010 तक पहले चरण की परीक्षा चार सौ पचास अंकों की थी। तीन सौ अंकों का एक वैकल्पिक विषय, जिसमें इतिहास, राजनीतिशास्त्र, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान समेत लगभग बीस विषयों में (भाषाओं को छोड़ कर) कुछ भी हो सकता था। और डेढ़ सौ अंकों का सामान्य ज्ञान। वर्ष 2001 से लागू सीसेट में चार सौ पचास अंकों के बजाय दो-दो सौ के दो पर्चे हैं। प्रथम प्रश्नपत्र में दो सौ अंकों का सामान्य ज्ञान और दूसरे प्रश्नपत्र में समझ, तर्कशक्ति और आंकड़ों के विश्लेषण के साथ-साथ बाईस से पचीस अंकों की अंगरेजी। फिलहाल विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा सीसेट का यह दूसरा प्रश्नपत्र ही है। 

पहली आपत्ति- यहां अंगरेजी कैसे आ गई, जबकि इस चरण में किसी भी भारतीय भाषा का प्रश्नपत्र शामिल नहीं है। माना देश और दुनिया की जरूरतों के लिए अंगरेजी का ज्ञान जरूरी है, लेकिन हर परीक्षार्थी को मुख्य परीक्षा में तो दसवीं तक की अंगरेजी का पर्चा पास करना अनिवार्य है ही, किसी भी एक मातृभाषा के पर्चे के साथ-साथ। अंगरेजी के पक्षधरों की इसी कुटिल चाल के विरोध में छात्र अनशन और विरोध कर रहे हैं। 

चालीस वर्ष पहले प्रसिद्ध शिक्षाविद और वैज्ञानिक दौलत सिंह कोठारी ने भी अंगरेजी की अहमियत को माना जरूर था, लेकिन उसे भारतीय भाषाओं के बराबर का दर्जा दिया था। इसीलिए प्रारंभिक परीक्षा में न अंगरेजी थी, न हिंदी समेत कोई भारतीय भाषा। यहां अंगरेजी के आने से ग्रामीण विद्यार्थी पहले चरण में ही बाहर हो गए हैं। 

सीसेट के दूसरे प्रश्नपत्र की और एक बड़ी खामी सौ नंबरों से भी अधिक समझ (कमप्रिहेंसिव) और तर्कशक्ति के ऐसे प्रश्नों को शामिल करना है, जो अक्सर एमबीए और इंजीनियरिंग की परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यही कारण है कि सत्तर से अस्सी प्रतिशत इंजीनियरिंग आदि के छात्र पहले चरण को पार कर आसानी से मुख्य परीक्षा में पहुंच रहे हैं। 

तर्कशक्ति आदि की परीक्षा लेना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन पहली बात तो यह है कि ऐसे कुछ प्रश्न मुख्य परीक्षा में भी पूछे जाते हैं। दूसरी खामी यह कि इसी चरण में इतने ज्यादा प्रश्नों के कारण जहां इंजीनियरिंग के छात्रों को फायदा होता है, मानविकी विषयों के छात्र घाटे में रहते हैं। कोढ़ में खाज यह भी कि इन प्रश्नों का अंगरेजी से हिंदी में अनुवाद बेहद कठिन भाषा में है और कई बार त्रृटिपूर्ण भी। सीमित समय के दबाव में भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों से बहुत-से प्रश्न इन बाधाओं के चलते छूट जाते हैं। 

सीसेट की अंतिम और बहुत बड़ी खामी इस चरण के दोनों प्रश्नपत्रों के लिए अलग-अलग न्यूनतम अर्हता अंक निर्धारित करना है। सामान्य ज्ञान के पहले परचे के लिए न्यूनतम अंक पंद्रह प्रतिशत रखे गए हैं तो दूसरे पर्चे के लिए पैंतीस प्रतिशत, यानी कि जो इंजीनियरिंग और विज्ञान के छात्र पहले प्रश्नपत्र के सामान्य ज्ञान, जिसमें इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र होते हैं, में तो पंद्रह प्रतिशत पाकर भी मुख्य परीक्षा में पहुंच जाएंगे। इतिहास या साहित्य पढ़े हुए छात्रों को दूसरे प्रश्नपत्र की अंगरेजी आदि को पार करते हुए कम से कम पैंतीस प्रतिशत अंक सफल होने के लिए जरूरी हैं। इन्हीं बाधाओं का नतीजा है कि जहां पहले पैंतालीस से पचास प्रतिशत भारतीय भाषाओं


में पढ़े हुए छात्र, विशेषकर ग्रामीण अंचलों के, मुख्य परीक्षा तक पहुंच जाते थे, अब वे घट कर पंद्रह प्रतिशत से भी नीचे आ गए हैं।

यहां एक प्रसिद्ध पत्रिका में छपे कार्टून की याद आ रही है। कार्टून में एक विशाल बरगद का पेड़ है और उसके नीचे खड़े हैं हाथी, कुत्ता, लोमड़ी, गिलहरी या छिपकली जैसे जीव-जंतु। जंगल का राजा कौन हो इसका पैमाना यह रखा गया है कि जो सबसे पहले पेड़ पर चढ़ जाएगा वही राजा। क्या हाथी और लोमड़ी या गिलहरी की क्षमता को एक पैमाने से मापा जा सकता है। प्रशासनिक सेवाओं के नए परिवर्तन इसी अंदाज से किए गए हैं। निश्चित रूप से हिंदी माध्यम के छात्रों को इसका नुकसान ज्यादा हुआ है। लेकिन दूसरी भारतीय भाषाएं भी उतने ही घाटे में हैं। 

याद होगा 2013 की शुरुआत में मुख्य परीक्षा में भी ऐसे परिवर्तन करने की कोशिश की गई थी, जो अगर लागू हो जाते तो भारतीय भाषाओं में जहां आज पांच प्रतिशत चुने जा रहे हैं तब शायद यह आंकड़ा शून्य के करीब पहुंच जाता। यह तो अच्छा हुआ कि 2013 में सभी भाषाभाषी लोगों की तरफ से विरोध हुआ और सरकार को भाषा संबंधी अपनी कुछ सिफारिशें वापस लेनी पड़ीं। सीसेट का मुद्दा उस समय कुछ कारणों से छोड़ दिया गया था। लेकिन अब वक्त आ गया है कि सरकार इस पर गंभीरता से विचार करके इसे सुलझाए। 

समाधान का एक तुरंत विकल्प तो यह है कि सीसेट के दूसरे प्रश्नपत्र से अंगरेजी का हिस्सा तुरंत हटा दिया जाए। समझ, तर्कशक्ति और दूसरे ऐसे प्रश्न कम से कम रखे जाएं और जो रखे भी जाएं उनकी भाषा सहज, बोधगम्य हो। बेतुके और दुरूह अनुवाद से हिंदी की स्थिति और कमजोर होती है; अंगरेजी भाषी लोगों को मखौल उड़ाने का मौका भी मिलता है। तर्कशक्ति जैसे प्रश्नों के बजाय सामान्य ज्ञान के प्रश्न बढ़ाए जा सकते हैं जिससे कि जो पलड़ा अभी इंजीनियरिंग और एमबीए के छात्रों की तरफ झुका हुआ है, वह सभी के लिए न्यायसंगत हो। यहां इस बात को फिर से दोहराने की जरूरत है कि मुख्य परीक्षा में भी तो बहुत सारे प्रश्न आपकी समझ, तर्कशक्ति की जांच के लिए होते ही हैं।

सन 1990 में सतीश चंद्र समिति ने निबंध का परचा भी इसीलिए शामिल किया था। अगर आयोग ग्रामीण भारत के साथ वाकई न्याय करना चाहता है तो वर्ष 1979 से जो प्रारंभिक परीक्षा चली आ रही थी, कुछ रद्दोबदल के साथ तुरंत उसकी वापसी हो। 

वैसे तो अच्छा यही होगा कि कोई आयोग संघ लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा समेत वन सेवा, चिकित्सा सेवा, इंजीनियरिंग, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और दूसरी सभी परीक्षाओं की पद्धति की समीक्षा करे। वर्ष 1974 में कोठारी आयोग को इन सभी परीक्षाओं की समीक्षा के लिए कहा गया था। भारतीय भाषाओं में उत्तर देने की शुरुआत सिविल सेवा परीक्षा के लिए की गई थी। इस उम्मीद के साथ कि धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं में उत्तर देने का माध्यम दूसरी परीक्षाओं में भी उपलब्ध होगा। यहां हमें कोठारी आयोग के उन शब्दों को याद रखने की जरूरत है कि जिन अधिकारियों को भारतीय भाषाएं नहीं आतीं उन्हें देश की प्रशासनिक सेवाओं में आने का कोई अधिकार नहीं है; उन्हें साहित्य-संस्कृति का ज्ञान भी उतना ही जरूरी है। अच्छा हुआ कि सीसेट के बहाने फिर से शिक्षा और प्रशासन के संबंधों पर बहस हो रही है। कर्मचारी चयन आयोग, बैंक, बीमा और यूजीसी की परीक्षाओं में भी माध्यम-भाषा पर विचार करने की जरूरत है। 

देश में पिछले दिनों लगातार लॉ कॉलेज और तरह-तरह के विश्वविद्यालय खुल रहे हैं। इन सबकी भी परीक्षा का माध्यम अंगरेजी ही है और जब प्रवेश करने वाले अंगरेजी माध्यम के हैं तो वहां किताबें और पढ़ाने वाले भी खालिस अंगरेजी के हैं। ऐसे में क्या दूर देहात में अपनी भाषा से पढ़ने वाले छात्र कभी लॉ कॉलेज, आइआइएम या दूसरे संस्थानों में दाखिला पाने को सोच भी सकते हैं! 

कभी-कभी बिना अंगरेजी जाने आप तमिलनाडु, महाराष्ट्र या गुजरात में एक प्रशासक के रूप में कैसे काम कर सकते हैं। इसका संक्षिप्त उत्तर यह है कि अंगरेजी का मैट्रिक तक का ज्ञान तो ठीक है, लेकिन उसकी आड़ में जब केवल अंगरेजी को आपकी क्षमताओं की कसौटी मान लिया जाता है तो यह देश के गरीबजन और उनकी भाषा के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम ने लिखा है कि उनकी स्कूली शिक्षा तमिल माध्यम से हुई जहां संस्कृत भी पढ़ाई जाती थी और इसीलिए जब वे उत्तर प्रदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे तो हिंदी सीखने-समझने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई। 

वैसे भी प्रशासनिक सेवाओं में आने वाले अधिकारियों को उस राज्य की भाषा सिखाई ही जाती है। अगर कुछ कम अंगरेजी बोलने वाले प्रशासन में प्रवेश पा भी गए तो क्या उन्हें थोड़ा और प्रशिक्षण देकर बेहतर नहीं बनाया जा सकता। 2013 की मुख्य परीक्षा में पूछे गए निबंध का एक विषय था ‘क्या औपनिवेशिक मानसिकता भारत की सफलता में बाधक हो रही है’। ऐसा ही एक विषय था ‘क्या हम भारतीय ढोंगी हैं’। संघ लोकसेवा आयोग या सत्ता को खुद सोचने की जरूरत है कि इन विषयों की कसौटी पर वे कितना खरा उतरते हैं।


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