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नीरो के मेहमान PDF Print E-mail
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Thursday, 24 July 2014 11:44

कृति श्री

जनसत्ता 24 जुलाई, 2014 : ‘रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था।’ इतना शायद हम सब जानते हैं। लेकिन आगे की कहानी कहीं अधिक भयावह है। जब रोम जल रहा था तो लोगों का ध्यान बंटाने के लिए नीरो ने अपने बाग में एक बड़ी पार्टी रखी। लेकिन समस्या रात में रोशनी के अभाव की थी। नीरो के पास इसका समाधान था। उसने रोम के कैदियों और गरीब लोगों को बाग के इर्द-गिर्द इकट्ठा किया और उन्हें जिंदा जला दिया। इधर रोम के कैदी और गरीब लोग जिंदा जल रहे थे और उधर इसके प्रकाश में नीरो की ‘शानदार पार्टी’ आगे बढ़ रही थी, जिसमें शरीक नीरो के मेहमान थे- व्यापारी, कवि, पुजारी, दार्शनिक, नौकरशाह आदि।

दीपा भाटिया की सशक्त डॉक्यूमेंटरी ‘नीरोज गेस्ट्स’ में इस कहानी को उद्धृत करते हुए विख्यात जन-पत्रकार पी साईनाथ इतिहासकार टैसीटस के हवाले से कहते हैं कि नीरो के मेहमानों में से किसी ने भी इस पर सवाल नहीं उठाया कि प्रकाश के लिए इंसानों को जिंदा क्यों जलाया जा रहा है। बल्कि सभी जलते इंसानों की रोशनी का पूरा लुत्फ ले रहे थे। पी साईनाथ आगे कहते हैं कि यहां समस्या नीरो नहीं है। वह तो ऐसा ही था। समस्या नीरो के मेहमान थे, जिनमें से किसी ने भी इस पर आपत्ति नहीं की। इस कहानी को आज के भारत से जोड़ते हुए साईनाथ आज के नीरो और उसके मेहमानों की पूरी फौज को जिस तरीके से इस फिल्म में बेनकाब करते हैं, वह स्तब्ध कर देने वाला है। पी साईनाथ उन लाखों-करोड़ों लोगों के दुख-दर्द को शिद्दत से बयान करते हैं जो आज नीरो और उनके मेहमानों के लिए ‘जिंदा जलने’ को बाध्य हैं। डॉक्यूमेंटरी दरअसल किसानों की, खासकर विदर्भ के किसानों की आत्महत्या और भारत में बढ़ती असमानता पर है। इस पूरे मामले में मीडिया नीरो के मेहमानों की तरह ही काम कर रहा है।

पी साईनाथ बताते हैं कि जब विदर्भ में आठ-दस आत्महत्याएं प्रतिदिन हो रही थीं तो उसी समय मुंबई में ‘लैक्मे फैशन वीक’ चल रहा था, जिसे कवर करने के लिए मुंबई में करीब पांच सौ पत्रकार मौजूद थे। लेकिन विदर्भ की आत्महत्याओं को कवर करने के लिए कोई भी पत्रकार नहीं था। आत्महत्या के आर्थिक पहलुओं की पड़ताल करते हुए यह डॉक्यूमेंटरी बताती है कि ये आत्महत्याएं एक तरह से हत्या हैं जो सरकार की अमीरपरस्त और साम्राज्यवादपरस्त नीतियों का नतीजा


है। इसी का परिणाम है कि भारत में असमानता किसी भी देश से कहीं तेज गति से आगे बढ़ रही है। पी साईनाथ के मुताबिक- ‘भारत में सबसे तेज गति से विकसित होने वाला सेक्टर आईटी सेक्टर नहीं है। यह ‘असमानता’ का सेक्टर है।’ 

असमानता की चर्चा करते हुए पी साईनाथ एक सच घटना बताते हैं। जब धीरुभाई अंबानी की मौत हुई तो अखबार वालों ने प्रशंसा भाव से यह रिपोर्ट छापी कि उनकी चिता के लिए साढ़े चार सौ किलोग्राम चंदन की लकड़ी इस्तेमाल हुई और इसे कर्नाटक से मंगाया गया। उसी दौरान कर्नाटक के ही गुलबर्ग शहर के एक गांव में एक दलित सुशीलाबाई के पति की मौत हो गई। उस गांव में यह प्रथा है कि दलित अपने परिजनों को दफनाते हैं, जबकि गांव की ऊंची कही जाने वाली जातियां अपने परिजनों को जलाती हैं। लेकिन इस दलित को दफनाया गया और जलाया भी गया, क्योंकि ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोगों ने गांव के नजदीक उसे दफनाने की इजाजत नहीं दी। जब दफनाने की प्रक्रिया चल ही रही थी, उसी समय उन लोगों ने जबर्दस्ती इसे बीच में ही रोक दिया। मजबूरन सुशीला बाई ने अपने पति के शरीर को चिता के हवाले किया, लेकिन लकड़ी और तेल का पूरा इंतजाम न कर पाने के कारण वह शरीर आधा ही जल पाया। यह है इस देश के एक गरीब दलित की नियति। उसका दलित होना मौत के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। यह डॉक्यूमेंटरी फिल्म इसलिए भी देखनी चाहिए कि इसे देख कर हम अपने आपसे सवाल कर सकें कि कहीं हम भी तो नीरो के मेहमानों में शामिल नहीं हो चुके हैं?


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