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गाजा पर भारत की उलझन PDF Print E-mail
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Wednesday, 23 July 2014 11:42

पुष्परंजन

 जनसत्ता 23 जुलाई, 2014 : तुर्की, अमेरिका का मित्र देश है, और नाटो मंडली का सक्रिय सदस्य।

लेकिन तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तैयप एर्दोआन ने यह तोहमत लगाने में जरा भी देर नहीं की कि सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चार ईसाई देश हैं, और गाजा पट्टी में इजराइल के ताबड़तोड़ हमले का समर्थन कर रहे हैं। तुर्की की संसद, ‘तुर्कीये बुयुक मिलेत मेसलिसी’ (संक्षेप में मेसलिस) में गाजा पट्टी पर हमले की गूंज लगातार हुई है। पिछले जुमे के दिन तुर्की की ‘मेसलिस’ में इजराइली आक्रमण के विरुद्ध सभी पार्टियों के सांसदों ने बाकायदा प्रस्ताव पास किया। तुर्क सांसदों ने फिलस्तीनी बच्चों, महिलाओं, निर्दोष नागरिकों पर हमले को तुरंत रोकने और सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की। उसके एक दिन बाद, 19 जुलाई शनिवार को ब्रिटेन की संसद ‘हाउस ऑफ कॉमंस’ के अड़तीस सदस्यों ने मांग की कि फिलस्तीनियों पर हमले फौरन रोके जाएं, और गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक की तरफ इजराइली सेना को बढ़ने न दिया जाए। 


इन अड़तीस ब्रिटिश सांसदों में से चौबीस विपक्षी लेबर पार्टी के थे, जिन्होंने संसद में पेश प्रस्ताव में कहा कि इजराइल ने चौथे जेनेवा समझौते का उल्लंघन करते हुए सैनिक कार्रवाई की है। इस प्रस्ताव पर सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी के एक सांसद ने हस्ताक्षर किया है। इसमें सात लिबरल डेमोक्रेट पार्टी के सांसद भी हैं, जो कैमरन की सरकार में गठबंधन सहयोगी हैं। हालांकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन इजराइल को पूर्ण समर्थन देने के रुख पर कायम हैं। कैमरन ने कहा कि फिलस्तीनी हमलावर इजराइली नागरिकों पर आक्रमण अविलंब बंद करें। ब्रसेल्स स्थित यूरोपीय संसद ने भी हमला अविलंब रोकने का प्रस्ताव पास किया है। 

सवाल यह है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी गाजा पर लोकसभा में बहस क्यों नहीं करा सकती? हम यह नहीं कहते कि तुर्की, ईरान, अरब की संसदों में जिस तरह से इजराइल के खिलाफ इकतरफा प्रस्ताव पास हुआ, वैसा ही प्रस्ताव भारतीय संसद में पास हो। लेकिन भाजपा और उसके समर्थक दलों को ब्रिटेन के निचले सदन ‘हाउस आॅफ कॉमंस’ की तरह लोकसभा में गाजा पर बहस, और विपक्ष द्वारा प्रस्ताव रखने में क्या दिक्कत है? भाजपा की लाइन यह है कि फिलस्तीन और इजराइल दोनों भारत के मित्र हैं, इसलिए ‘संवेदनशील विषय’ पर संसद में चर्चा नहीं होनी चाहिए। 

दरअसल, अपने देश में विदेश नीति तय करने वाले नौकरशाह साठ-सत्तर के दशक के सोच से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। उनके इस सोच से भाजपा भी इत्तिफाक  रखती है। इसके पीछे आने वाले छह महीनों में पांच राज्यों में होने वाला चुनाव, और उससे जुड़ा वोट बैंक है। भाजपा, ऐसी किसी बयानबाजी में फंसना नहीं चाहती, जिससे इस देश का मुसलमान मतदाता नाराज हो जाए, या हिंदू मतदाता उससे सवाल करे कि आप इजराइल के विरुद्ध क्यों जा रहे हो। क्योंकि जब भी इजराइल, फिलस्तीनी इलाके  में तबाही मचाता है, इस देश का कट््टर हिंदू मतदाता सोचता है कि इसी तरह का कड़ा जवाब हमें पाकिस्तान को देना चाहिए।

भाजपा, आगे कुआं, पीछे खाई की स्थिति में फंसी है। विपक्ष को लगता है कि भाजपा के असली चेहरे को उघाड़ने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा। यों गाजा पट्टी पर हमले का लंबा इतिहास है, पर हम 2008 की ही बात करते हैं, जब इजराइली सैनिकों ने चौदह सौ फिलस्तीनियों को मार डाला था। 2012 में भी गाजा पट्टी पर हमला हुआ था, जिसमें 177 फिलस्तीनी मारे गए थे। सवाल यह है कि आज जिस संत-भाव से कांग्रेसी और वामपंथी लोकसभा में बहस की मांग कर रहे हैं, वही लोग 2008 और 2012 में गाजा पर संसद में चर्चा से क्यों चूक गए? तब इजराइल से हथियार आयात पर रोक की आवाज क्यों नहीं बुलंद हुई थी? 

राज्यसभा में सोमवार को सिर्फ चर्चा हुई, और उस दौरान कांग्रेस, वामपंथी, जद (एकी), तृणमूल कांग्रेस, बसपा, सपा जैसे दलों ने यह संदेश देना चाहा कि हम सेक्युलर हैं, और फिलस्तीनियों के साथ खड़े हैं। इसके बरक्स विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने राजग की लाइन के अनुरूप कहा कि भारत के दोनों मित्र हैं, इसलिए हमें निष्पक्ष रहना चाहिए। 

वर्ष 2003 में राजग सरकार के समय तब के इजराइली प्रधानमंत्री अरियल शेरोन भारत आए थे। उस समय मुसलिम छात्रों और वामपंथियों ने व्यापक विरोध-प्रदर्शन किया था, सैकड़ों गिरफ्तार किए गए थे। उन दिनों संघ ने शेरोन के खिलाफ  प्रदर्शन की भर्त्सना की थी। तब संघ के प्रवक्ता राम माधव ने कहा था कि इजराइल और भारत, आतंकवाद के विरुद्ध साथ-साथ लड़ रहे हैं, इसलिए हमारे द्विपक्षीय संबंध प्रगाढ़ रहेंगे। इससे बहुत पहले वीर सावरकर इजराइल के अस्तित्व में आने पर खुशी से झूम उठे थे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के विरुद्ध भारतीय वोट पर उन्होंने काफी गुस्से का इजहार किया था। 

आठ मई 2003 को तब के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र ने अमेरिकन यहूदी कमेटी के एक डिनर भाषण में स्पष्ट कहा था कि भारत, अमेरिका और इजराइल आतंकवादियों के निशाने पर रहे हैं, और हम एक होकर इनके विरुद्ध लड़ेंगे। ब्रजेश मिश्र का यह बयान राजग की मध्य-पूर्व नीति का आईना है। मगर, अकेले संघ की हम क्या बात करें, इजराइल से दोस्ती गांठने में दूसरी सरकारें भी आगे रही हैं। 

भारत पहला गैर-अरब मुल्क था, जिसने फिलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को मान्यता दी थी। वर्ष 1975 में नई दिल्ली में पीएलओ का कार्यालय खुला, और 18 नवंबर 1988 को फिलस्तीन को बतौर देश, भारत ने मान्यता दी थी। नवंबर 1997 और अप्रैल 1999 में यासिर अरफात जब नई दिल्ली आए, तो लगा था कि पूरी दुनिया में उनका


सबसे करीबी दोस्त कोई है, तो भारत है। लेकिन कांग्रेस के नेता कब तक गुटनिरपेक्षता, अरब समर्थक नीति, फिलस्तीन से दोस्ती निभाने का अभिनय करते रहते? वर्ष 1978 में मोशे दयान की गुप्त भारत यात्रा से यह संकेत गया था कि इजराइल ने भारत से अपना तार जोड़ रखा है। आखिरकार जनवरी 1992 में भारत को इजराइल से पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित करना ही पड़ा। इसी का परिणाम था कि शरद पवार, कपिल सिब्बल, कमलनाथ, एसएम कृष्णा जैसे नेता इजराइल जाते रहे। 

निजाम बदला, तो सन 2000 में जसवंत सिंह बतौर विदेशमंत्री तेल अबीब की यात्रा पर गए। 2007 में इजराइल में आयोजित हाइटेक कृषि कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पधार चुके हैं। यह ‘नमस्ते शेरोन’ और ‘शालोम मोदी’ के सौहार्दपूर्ण आदान-प्रदान का नतीजा था कि गुजरात में इजराइली कंपनियों ने सोलर, थर्मल पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, फार्मास्यूटिकल, जल पुनरावर्तन के क्षेत्र में अरबों रुपए का निवेश किया। पंद्रहवीं लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष रहीं सुषमा स्वराज ने 2 अप्रैल, 2008 को जेरुसलम यात्रा के दौरान बयान दिया था कि इजराइल भारत का सबसे विश्वस्त मित्र है। आज सुषमा स्वराज विदेशमंत्री है, और मोदीजी बदल चुकी सत्ता के सर्वेसर्वा, तो भला कैसे वे अपने ‘सबसे विश्वस्त मित्र’ के विरुद्ध बयान दें? 

रूस के बाद इजराइल से ही इस समय भारत रक्षा क्षेत्र में सबसे ज्यादा आयात करता देश है। रक्षा निर्माण में उनचास प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के बाद अब इजराइली कंपनियां यूएवी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली, रेडियो कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे क्षेत्र में साझा निर्माण के लिए आगे आना चाहती हैं। क्या मोदी सरकार चाहेगी कि गाजा युद्ध पर लोकसभा में चर्चा करा कर इजराइल को नाराज करे? यों भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह लाइन नहीं है। लेकिन क्या यह जरूरी नहीं कि दक्षिणी इजराइल में रहने वाले अस्सी हजार भारतीय यहूदियों की सुरक्षा पर लोकसभा में चर्चा की जाए? देखने की बात है कि भारतीय नेताओं की, इजराइल में बसे इस ‘मिनी इंडिया’ में कोई दिलचस्पी है, या नहीं।

गाजा पट्टी, मिस्र और इजराइल के बीच 360 वर्ग किलोमीटर का छोटा-सा टुकड़ा है, जो आधी दिल्ली के बराबर है। इजराइल ने 1967 के युद्ध में इस पर कब्जा जमा लिया था, और कोई चार दशक बाद 2005 में इसे फिलस्तीन को वापस किया। इस इलाके  को खाली करने के दौरान आठ हजार इजराइली उजड़ गए। कहने के लिए गाजा में हमास का शासन है, लेकिन उसकी सीमाओं, जल और वायु क्षेत्र पर इजराइल का नियंत्रण है। रामल्ला, वेस्ट बैंक पर शासन कर रहे फतह के नेता महमूद अब्बास और गाजा पट्टी से निर्वाचित हमास नेता इस्माइल हानिया ने पिछले महीने ‘यूनिटी गवर्नमेंट’ बनाने की घोषणा की, तो इजराइल ने इनसे संबंध तोड़ लिया। चुनी हुई सरकार के बावजूद, इजराइल हमास को आतंकवादी संगठन मानता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में फिलस्तीन के गैर-सदस्यीय दर्जे (नॉन मेंबर स्टेटस) को अटकाने में अमेरिका, इजराइल और उसके पश्चिमी मित्र आगे रहे हैं।

इस बार लड़ाई किशोर उम्र के लड़कों के अपहरण और उनकी हत्या के बाद भड़की है। सोलह साल के दो किशोर नफताली फ्रेंकेल, गिलाड शार, और उन्नीस साल का इयाल इफ्राक  जून के दूसरे हफ्ते अगवा कर लिए गए। इन तीनों इजराइली किशोरों की लाशें दो सप्ताह बाद मिलीं। इजराइल को शक हमास पर था। इसकी प्रतिक्रिया में दो जुलाई को तारिक  अबू कादिर नामक एक सोलह साल के फिलस्तीनी किशोर को अगवा कर लिया गया। दो दिन बाद फिलस्तीनी किशोर तारिक की जली हुई लाश मिली। इसके बाद दोनों तरफ से जो मारकाट मची, उसके मंजर भयानक हैं। 

यह अफसोसनाक है कि दोनों तरफ के बेकसूर लोग मर रहे हैं और उजड़ रहे हैं। लेकिन ‘आॅपरेशन प्रोटेक्टिव एज’ में इजराइल का नुकसान पांच प्रतिशत भी नहीं है। सत्रह दिन की लड़ाई में मृतकों का आंकड़ा पांच सौ पार कर चुका है। चार हजार से अधिक घायलों के लिए अस्पतालों में जगह नहीं है। एक लाख से अधिक फिलस्तीनी संयुक्त राष्ट्र के सड़सठ शिविरों में हैं। मिस्र द्वारा रखे युद्ध विराम प्रस्ताव के नामंजूर होने पर चकित होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे प्रस्ताव को कौन स्वीकार करता कि सिर्फ गाजा में रहने वाले शस्त्रविहीन हो जाएं, और इजराइली हथियारों से लैस रहें? युद्ध विराम प्रस्ताव नामंजूर होते ही इजराइली हमले तेज हो गए। 

संयुक्त राष्ट्र, हमले को रोकने की अपील हफ्ते भर में दो बार कर चुका है। मगर जब इजराइल अपने पर आ जाता है, तो संयुक्त राष्ट्र की भी नहीं सुनता। ऐसी हिंसा को रोकने और सुलह-सपाटे के वास्ते चार गुटों का समूह ‘मिडल-इस्ट क्वार्टरेट’ अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, रूस, यूरोपीय संघ के साथ जर्मनी सक्रिय हुआ करता था। पर वहां भी कोई सुगबुगाहट नहीं है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चाहिए कि दोनों ‘मित्रों’ को शांत करने का प्रयास करें। इससे उनके ‘विश्व नेता’ बनने का मार्ग प्रशस्त होगा!


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