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अविश्वास की आंखें PDF Print E-mail
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Wednesday, 23 July 2014 11:40

मनोज कुमार

जनसत्ता 23 जुलाई, 2014 : अपने मित्र से मैंने पूछा कि भाई झूठ के पांव नहीं होते यह तो सुना था, लेकिन अविश्वास की आंखें, यह कौन-सी नई आफत है! इस पर दोस्त ने तपाक से कहा कि यह विकास की देन है। दूसरा सवाल और भी चौंकाने वाला था। समझ नहीं आ रहा था कि विकास की देन अविश्वास की आंखें! खैर, एक पत्रकार और लेखक होने से भी ज्यादा एक बड़ी होती बिटिया के पापा की जिम्मेदारी ने इस पहेली के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ा दी। मैं अपने आसपास तलाश करता रहा कि अचानक एक खबर ने मुझे भीतर तक हिला दिया। एक अखबार में खबर छपी थी कि शहर के एक बड़े शॉपिंग मॉल में चोरी करते हुए दो युवकों को कैमरे ने पकड़ा। अब मुझे अविश्वास की आंखों का अर्थ समझ आने लगा। दोस्त ने जिसे विकास की देन कहा था, वह अविश्वास की आंखें और कोई नहीं, कैमरा ही था। विकास की परवान चढ़ती नई-नई तकनीक के बारे में लिखना अच्छा लगता है। लेकिन बड़े शॉपिंग मॉल में प्रवेश करते ही मैं एक मामूली आदमी हो जाता हूं। किसी ब्रांडेड स्टोर में प्रवेश करते ही डर-सा लगने लगता है। सच कहूं तो अपनी औकात समझ आने लगती है। तिस पर कैमरे की लगातार घूरती आंखें। डर-सा लगता है कि जाने अगले पल क्या हो! ऐसे में कई बार तो शॉपिंग मॉल में जाने का कार्यक्रम ही रद्द हो जाता है। 

सच तो यह है कि मैं ठहरा निपट देहाती आदमी। जेब में दो सौ या पांच सौ रुपए आए तो खुद को शहंशाह समझ बैठता हूं। मेरी इस गफलत को मेरे मुहल्ले का परचून वाला हमेशा बनाए रखता है। वह मुझे कभी इस बात का अहसास ही नहीं होने देता कि मैं फक्कड़ किस्म का लगभग कंगाल हूं और मेरे हाथों में जो दो-पांच सौ रुपए हैं, उनकी कोई वकत नहीं। अपने भीतर ही भ्रम पाले मैं परचून की दुकान में पहुंचता हूं। यहां अविश्वास की आंख नहीं आई है! दुकानदार से सौदा लिया और दो शिकायतें भी ठोंक दीं। कुछ सुख-दुख की बातें भी कर लीं और उधार अलग कर आया। लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी के बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल में ऐसी


सुविधा कहां! उनके पास एक ही रिवाज है। माल देखो, पसंद आया तो बैग में डालो, पैसे दो, बिल लो और चलते बनो। मुहल्ले के परचून के दुकानदार की तरह न तो शिकायत सुनने का मौका, न बतियाने का कोई वक्त। उधार की बातें तो करो ही नहीं। और हां, परचून की दुकान की तरह कुछ भी उठा कर स्वाद नहीं ले सकते। ऐसा किया कि बिल बना। हो सकता है कि इसके चक्कर में अविश्वास की आंखों में आप कैद हो जाएं और कहीं से सायरन बजा और आप धर लिए जाएं। 

विकास की देन अविश्वास की आंखों का विस्तार शॉपिंग मॉल से आपके-हमारे घरों तक आ गया है। अविश्वास इतना बढ़ गया है कि अब हम छिपे कैमरे से एक-दूसरे की निगरानी करने लगे हैं। वैसे तो हम इन्हें सुरक्षा के लिए लगाए हुए कैमरे कहते हैं, लेकिन सच तो यह है कि हम सब घोर अविश्वास के शिकार हैं। सच यह है कि हमारा अपने आप पर से विश्वास उठ गया है। कभी हमारे बुजुर्ग कहते थे कि कई बार आंखों देखी भी सच नहीं हुआ करती है, लेकिन अविश्वास की आंखें बन चुका यह यंत्र जो दिखाता है, वही सच है। लगता है कि मैं फिर अपने गांव की तरफ लौट जाऊं। परचून की दुकान में खड़ा होकर गप्पें हांकू और घर पर बेफिक्री के साथ लौट सकूं। लेकिन अब लौटना भी मुश्किल लग रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह से आपसी विश्वास कहीं गुम हो गया है।      


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