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सुविधा की दूरी PDF Print E-mail
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Tuesday, 22 July 2014 11:45

जनसत्ता 22 जुलाई, 2014 : जम्मू-कश्मीर के अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले उतरने की घोषणा की है। पर यह मजबूरी का फैसला है या मर्जी का? राज्य के मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि उन्होंने दस दिन पहले ही सोनिया गांधी से मुलाकात कर बता दिया था कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ मिल कर विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगी। इसके बाद कांग्रेस के पास अकेले चुनाव का सामना करने के अलावा क्या रास्ता रह जाता है? उमर का कहना है कि उन्होंने अपनी तरफ से गठजोड़ तोड़ने का एलान इसलिए नहीं किया, क्योंकि वे अवसरवादी नहीं दिखना चाहते थे। फिर अब वे क्यों यह जताना चाहते हैं कि इसकी पहल उनकी तरफ से हुई थी? मजे की बात यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के दोनों दलों की राहें जुदा होने के बावजूद राज्य की राजनीति में इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। न तो मुख्यमंत्री ने फिलहाल कांग्रेस के मंत्रियों से इस्तीफा देने को कहा है न कांग्रेस ने यह साफ किया है कि उसके मंत्री सरकार में बने रहेंगे या बाहर आ जाएंगे। पर कांग्रेस ने यह जरूर कहा है कि वह उमर सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करने देने के पक्ष में है। दरअसल, यह मजबूरी या सुविधा का अलगाव है, और विधानसभा चुनाव के बाद अगर दोनों पार्टियों को मिल कर सरकार बनाने की सूरत दिखी तो गठबंधन बहाल करने में वे देर नहीं करेंगी। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस की दोस्ती और समय-समय पर उनके बीच तकरार का इतिहास पुराना है। वर्ष 2008 में एक बार फिर दोनों दलों का गठजोड़ बना, जब चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर उभरी थी। करीब छह साल सत्ता में साझेदारी के बाद दोनों पार्टियां विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ना चाहती हैं तो इसके पीछे खासकर लोकसभा चुनाव का अनुभव है। लोकसभा चुनाव में दोनों का सफाया हो गया। राज्य के कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि उनके उम्मीदवारों के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं ने काम नहीं किया, न उन्हें वोट दिए। लिहाजा, साथ चुनाव लड़ने से जो फायदा होना चाहिए था वह नहीं मिला। यही शिकायत नेशनल कॉन्फ्रेंस को भी कांग्रेस से है। लोकसभा चुनाव में


शिकस्त खाने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी नेता नेशनल कॉन्फ्रेंस से गठबंधन तोड़ने की वकालत करने लगे थे। पर शायद राहुल गांधी और उमर की दोस्ती उनकी इस मांग के आड़े आती रही। कांग्रेस का यह भी आरोप है कि लोकसभा चुनाव के बाद राज्य सरकार ने जो लोकलुभावन कदम उठाए हैं, उनके श्रेय से उसे दूर रखा गया है। विधानसभा चुनाव में तो उमर अब्दुल्ला यह कोशिश और भी खुल कर करेंगे। इस तरह कांग्रेस न तो राज्य सरकार की उपलब्धियों का श्रेय ले पाएगी, न उसकी नाकामियों से पल्ला झाड़ने की स्थिति में होगी। इसका अहसास उसे अभी से होने लगा है। मुद्दों की तलाश में कांग्रेस ने कहना शुरू किया है कि राज्य में खाद्य सुरक्षा कानून पर ठीक से अमल नहीं हुआ। कुछ दिनों में कुछ और भी नुक्ते खोज लिए जाएंगे। पर बात घूम-फिर कर वहीं आ जाएगी कि अब कांग्रेस इन्हें किस मुंह से उठा रही है। अकेले चलने का जोखिम समझते हुए उसने पीडीपी का साथ मिलने की संभावना टटोली, पर पीडीपी तैयार नहीं हुई। लोकसभा चुनाव में वह अपने दम पर ही घाटी को फतह कर चुकी है। दूसरे, कांग्रेस को साथ लेकर उमर सरकार के कामकाज की अपनी आलोचना की धार वह कुंद नहीं करना चाहती थी। लिहाजा, विधानसभा चुनाव का रास्ता कांग्रेस के लिए बहुत कठिन हो गया है। उसकी उम्मीद इसी बात पर टिकी होगी कि चुनाव के बाद पीडीपी या नेशनल कॉन्फ्रेंस में से किसे उसकी जरूरत पड़ेगी।


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