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विवाद के बीज PDF Print E-mail
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Tuesday, 22 July 2014 11:44

जनसत्ता 22 जुलाई, 2014 : जीएम यानी जीन-संशोधित बीजों या फसलों को लेकर कुछ वर्षों से काफी तीखा विवाद रहा है। इसके पक्षधर जहां जीएम तकनीक से फसलों की कीटरोधी प्रजातियां विकसित होने और पैदावार बढ़ने की दलील देते रहे हैं, वहीं अनेक कृषि वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, जैव विविधता और स्वास्थ्य के मसलों पर सक्रिय संगठनों ने जीएम फसलों को लेकर लगातार आगाह किया है। आलोचकों का कहना है कि जीएम की तरफदारी में किए जाते रहे दावे अतिरंजित हैं। फिर, सेहत और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर की अनदेखी हरगिज नहीं की जा सकती। जहां वैज्ञानिक समुदाय भी बंटा हो और बड़े पैमाने पर परस्पर विरोधी आकलन हों, वहां अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं होता। ऐसे में फूंक-फूंक कर ही कदम रखा जाना चाहिए। अगर मसला पूरी कृषि प्रणाली, खाद्य सुरक्षा और लोगों की सेहत से जुड़ा हो, तो सावधानी की और भी जरूरत है। इसलिए जेनेटिक इंजीनियरिंग मंजूरी समिति ने जैसी हड़बड़ी दिखाई है उससे कई सवाल उठते हैं। 

पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाली इस समिति ने चावल, सरसों, कपास, बैंगन जैसी कई प्रमुख फसलों के जीएम बीजों के जमीनी परीक्षण की इजाजत दे दी है। जाहिर है, इस अनुमति का मकसद इन जीएम फसलों की खेती का रास्ता साफ करना है। समिति के इस फैसले पर और बहुत-से लोगों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच ने भी सवाल उठाए हैं। बीते शनिवार को जारी एक बयान में मंच ने इसे देश की जनता के साथ धोखा करार दिया है। लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में भाजपा ने कहा था कि जमीन की उर्वरा-शक्ति और लोगों के स्वास्थ्य पर जीएम फसलों के दीर्घकालीन असर का सर्वांगीण वैज्ञानिक आकलन किए बगैर ऐसे बीजों की बाबत कोई निर्णय नहीं किया जाएगा। फिर इतने ही दिनों में दीर्घकालीन असर का पता कैसे लगा लिया गया कि पर्यावरण मंत्रालय की समिति ने जमीनी प्रयोग शुरू करने के लिए हरी झंडी दे दी? अगस्त 2012 में कृषि मंत्रालय की संसदीय समिति ने पूरी तरह जीएम फसलों के खिलाफ अपनी रिपोर्ट दी थी; इस समिति में भाजपा के सदस्य


भी शामिल थे। सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से गठित विशेषज्ञ समिति ने भी इसी तरह की राय दी थी। उसने सर्वोच्च अदालत को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा कि जीएम फसलों पर तब तक रोक रहनी चाहिए, जब तक इस मसले पर एक स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण का गठन नहीं हो जाता। 

जेनेटिक इंजीनियरिंग मंजूरी समिति को संसदीय समिति की सिफारिश और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बनी विशेषज्ञ समिति की राय न मालूम रही हो, यह नहीं माना जा सकता। फिर, उसने इस सब की अनदेखी कैसे कर दी? पर्यावरण मंत्रालय भाजपा के घोषणापत्र में दिए गए आश्वासन से भी क्यों मुकर गया? इस सब से यह संदेह पैदा होता है कि कहीं जीएम लॉबी को खुश करने की मंशा या इसका दबाव रहा होगा। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर को उस चीज की फिक्र नहीं है, जिसके वे मंत्री हैं। उद्योग-हितैषी दिखने के उत्साह में उनके मंत्रालय ने थोड़े ही दिनों में कई पर्यावरण-विरोधी फैसले किए हैं। केवल पैदावार बढ़ने के तर्क पर जीएम बीजों को नहीं अपनाया जा सकता, क्योंकि खाद्य का मतलब केवल किसी तरह पेट भरना नहीं होता, यह भी होता है कि वह सेहत के लिए मुफीद हो। फिर, खाद्य सुरक्षा की दलील देकर जीएम बीजों की वकालत करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि हर साल देश में कितना अनाज, सब्जियां और फल बर्बाद हो जाते हैं। पहले इस बर्बादी को रोकने का जतन क्यों नहीं किया जाता!   


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