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नाहक गतिरोध PDF Print E-mail
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Monday, 21 July 2014 11:44

जनसत्ता 21 जुलाई, 2014 : गाजा के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई पर चर्चा कराने से सरकार के कतराने का कोई औचित्य नहीं है। पिछले हफ्ते संसद के दोनों सदनों में यह मसला कई बार गतिरोध की वजह बना। राज्यसभा तो तीन दिन तक कोई खास काम नहीं कर सकी। सरकार जहां गाजा पर बहस से इनकार करती रही, वहीं विपक्ष अपनी मांग पर डटा रहा। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को पत्र लिख कर अनुरोध किया था कि वे इस विषय पर बहस की इजाजत न दें, क्योंकि इससे दोनों देशों यानी इजराइल और फिलस्तीन से भारत के रिश्तों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उनके पत्र में भले दोनों पक्षों की तरफ संकेत था, पर यह समझना मुश्किल नहीं कि चिंता इजराइल से रिश्ते को लेकर ही रही होगी। वाजपेयी सरकार के समय इजराइल से भारत के संबंध रक्षा, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और कृषि अनुसंधान आदि के क्षेत्र में प्रगाढ़ हुए। मोदी सरकार की दिलचस्पी इस सिलसिले को और आगे बढ़ाने में होगी। लेकिन भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस की सरकार ने ही 1992 में इजराइल से राजनयिक संबंध कायम किए थे। 

अंसारी ने विदेशमंत्री का अनुरोध तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, क्योंकि उसमें यह मान कर चला गया था कि बहस नियम-169 के तहत होगी, जिसमें मतदान का प्रावधान है। जबकि विपक्ष ने नियम-176 के तहत बहस की मांग की थी, जिसमें वैसा प्रावधान नहीं है। अंसारी के फैसले के बाद राज्यसभा में गाजा पर बहस का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन विडंबना यह है कि संसद के दूसरे सदन में इस पर चर्चा नहीं हो सकेगी, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ने इस मामले में विपक्ष की मांग नामंजूर कर दी है। क्या किसी सदन में एक खास मुद््दे पर बहस इसलिए नहीं हो सकती कि वहां सत्तापक्ष का बहुमत है? बहरहाल, सरकार की दलील पर गौर करें, तो उसमें कोई दम नहीं दिखता। संसद में होने वाली बहस देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और ऐसी बहस के बावजूद बाहरी मामलों में सरकार अपना जो भी रुख उचित समझती हो, उसे जारी रख सकती है। इराक पर अमेरिकी हमले


पर संसद में खूब बहस हुई थी, बिना इस बात की परवाह किए कि अमेरिका क्या सोचेगा। 

दुनिया जानती है कि एक लोकतांत्रिक देश में बहुत सारे मुद्दों पर विपक्ष की राय सरकार से अलग या विपरीत हो सकती है। अमेरिका से एटमी ऊर्जा करार को लेकर वामदलों समेत कई पार्टियों का रुख यूपीए सरकार से मेल नहीं खाता था, मगर संसद में इस पर कई बार चर्चा हुई और भाजपा ने भी उसमें भरपूर शिरकत की थी। और पीछे जाएं, तो दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संसद में कितनी बार चर्चा हुई होगी! क्या पूर्वी यूक्रेन में मलेशियाई एअरलाइंस के विमान को मिसाइल से मार गिराए जाने की घटना पर संसद में इस डर से चर्चा नहीं होनी चाहिए कि कहीं रूस को बुरा लग सकता है! विदेश नीति को इतना नाजुक बनाने की जरूरत नहीं है कि संसदीय बहस से हम डरने लगें। फिलस्तीनियों के मानवाधिकारों का भारत ने हमेशा पक्ष लिया है और फिलस्तीन समस्या का न्यायसंगत और शांतिपूर्ण समाधान निकालने की वकालत की है। हमास के तौर-तरीकों का बचाव नहीं किया जा सकता, पर इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि इजराइल की सैन्य कार्रवाई नितांत गैर-आनुपातिक है जिसने करीब तीन सौ चालीस लोगों की जान ले ली है, जिनमें औरतों और बच्चों समेत अस्सी फीसद आम नागरिक हैं। यह सिलसिला अभी जारी है। इस पर संसद में चर्चा की मांग को बाधित करना अलोकतांत्रिक तो है ही, इससे फिलस्तीन के प्रति भारत की पारंपरिक नीति के बारे में गलत संदेश जाता है।   


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