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जारवा का जीवन PDF Print E-mail
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Monday, 21 July 2014 11:37

ज्योति ठाकुर

जनसत्ता 21 जुलाई, 2014 : अंडमान गई थी तो मकसद घूमना ही था, लेकिन मेरी उत्सुकता वहां की एक जनजाति जारवा के जीवन बारे में जानने की ज्यादा थी। जिस होटल में मैं ठहरी थी, वहां की एक परिचारिका से मैंने बात करनी शुरू की और उसने अपनी सीमा में सहज भाव से मुझे बहुत कुछ बताया। यह खुद अलग-अलग जगहों पर जाकर जारवा समुदाय के जीवन को थोड़ा देखने के अलावा अर्जित जानकारी थी, जिसने मुझे थोड़ा रोमांचित किया तो समूचे समाज के साथ-साथ व्यवस्था की दृष्टि और आग्रहों के प्रति क्षोभ भी पैदा किया। गुस्सा तब भी आया था जब कुछ समय पहले किसी व्यक्ति ने जारवा समुदाय की नृत्य करती कुछ महिलाओं का वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया था। इस तरह गैरकानूनी वीडियो बनाने का काम स्थानीय पुलिस की मिलीभगत के बिना संभव नहीं था। लेकिन जहां इंसानी संवेदनाओं को भी बाजार में बेचना एक कारोबार बनता जा रहा हो, वहां न बेचने वालों के सामने नैतिक प्रश्न होते हैं, न खरीदने वालों को शर्म आती है। ऐसे लोगों को इस बात से रत्ती भर भी मतलब नहीं होता कि जंगली इलाकों में जिंदगी के लिए जद्दोजहद करते जारवा किन तकलीफों से रूबरू होते होंगे, संस्कृति के किस संकट से दो-चार होंगे।

अंडमान के घने जंगलों में रहने वाली यह आदिम जनजाति सेंटीनलीज और ग्रेट अंडमानीज के नाम से भी जानी जाती है। महामारियों के प्रकोप आदि कई वजहों से घटते हुए आज इनकी तादाद महज कुछ सौ रह गई है। चूंकि ये लुप्तप्राय या दुर्लभ होते जा रहे हैं, शायद इसीलिए वहां जाने वाले पर्यटकों के लिए ‘अजूबे’ और ‘दर्शनीय’ हैं। गहरे सांवले रंग के जारवा अगर पेड़ों के झुरमुट में छिपे बैठे हों तो इन्हें देख पाना भी मुश्किल होता है। शिकार या र्इंधन की फिक्र में जब वे इधर-उधर घूमते रहते हैं तो इनके बीच की महिलाएं लकड़ी और खाद्य-पदार्थ आदि इकट्ठा करने में लगी होती हैं। इनकी भाषा, खाने-पीने की संस्कृति- सब हमसे बहुत अलग है। स्त्रियां कमर के ऊपरी हिस्से में कपड़े नहीं पहनती, पुरुष पैसे नहीं कमाते, बच्चे स्कूल नहीं जाते!

कहने को ये भारतीय गणतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन संविधान में दर्ज शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों की व्यवस्था व्यावहारिक रूप से इनके लिए शायद नहीं है। हमारी सरकारों की नजर में इनके लिए आवास और भोजन ही सब कुछ है। जबकि इनके रहन-सहन के कुछ तौर-तरीकों पर ही गौर किया जाए तो पता चलता है कि सरकारों और व्यवस्था की अनदेखी कैसे किसी समाज को एक जगह ठहरे रहने पर मजबूर कर देती है। लकड़ी और पत्तों से बने इनके घर, मूंगे के आभूषण और पैने हथियार साबित करते हैं कि ये कुशल कारीगर हैं। मछली पकड़ने या सुअरों को मारने के इनके तरीके आधुनिक तकनीकों के सहारे


जीने वालों को अचंभे में डाल सकते हैं। इनकी अपनी भाषा है, अपने गीत हैं, विशेष नृत्य हैं। जीवन में संघर्ष और आनंद का ऐसा तालमेल दुर्लभ है। फिर भी ये हमारी तरह ‘सभ्य’ और ‘आधुनिक’ नहीं हैं। जबकि अंग्रेजों के समय से जो घुसपैठ इनके जीवन में शुरू हुई थी, वह दूसरी शक्लों में आज भी जारी है। कभी जो काम बंदूकों से लिया जाता था, वह आज कैमरे से लिया जाता है। यहां आने वाले पर्यटक चुपके से इनकी या इनके बीच की अनावृत्त महिलाओं की तस्वीरें उतार कर और उनके नृत्य के वीडियो बना कर यू-ट्यूब, फेसबुक आदि पर सार्वजनिक कर देते हैं।

मैंने जिन तीन-चार जारवा लोगों को देखा वे या तो सड़क के किनारे काले बुत की तरह खड़े मिले या फिर पेड़ों की झुरमुट में छिपे हुए। ये हम जैसे नहीं हैं, पर यह सच है कि हजारों वर्ष पहले हम इनके ही जैसे हुआ करते थे। युग बीता, सभ्यताएं विकसित हुर्इं। हम आदिम से आधुनिक हुए, फिर उत्तर आधुनिक होने जा रहे हैं। लेकिन क्या हमारी यही ‘उपलब्धियां’ सभ्यता की बुनियादी पहचान हैं? सभ्यता की इस दौड़ में पिछड़ गए समुदायों के लिए हमारे पास क्या योजनाएं हैं? सही है कि स्थानीय प्रशासन की ओर से जारवा लोगों को सुरक्षा, आवास, मुफ्त अनाज आदि कई सुविधाएं दी जाती हैं। बदलाव आ रहा है, इनकी जीवन-शैली भी बदल रही है। लेकिन गति इतनी धीमी है और जितनी तादाद में ये बचे हैं, उसमें बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं बन पाती कि ये भी हमारे साथ जल्दी ही कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो सकेंगे।

हम इन्हें देख कर खुश होकर अंडमान से लौटते हैं और अपने दोस्तों को इस ‘दुर्लभ’ अनुभव के बारे में बताते हैं। लेकिन उसके बाद बचे-खुचे जो जारवा अंडमान के घने जंगलों में बेहाली और संघर्ष से भरा जीवन जी रहे हैं, उससे हमें कोई मतलब नहीं होता। हममें से अधिकतर लोग शायद इसे लेकर जरा भी फिक्र न करें, क्योंकि हमें पता है कि पर्यटन के लिए जाकर जंगलों में न सही, तो उनके अवशेष संग्रहालयों में सही, हम उन्हें देखेंगे ही!


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