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वक़्त की नब्ज़ : सड़क और सरकार PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:38

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : अच्छा लगा पिछले हफ्ते नरेंद्र मोदी को एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देख कर। यह भी अच्छा लगा कि एक अरसे बाद एक असली प्रधानमंत्री इस देश की नुमाइंदगी कर रहा है ब्रिक्स जैसे सम्मेलन में। इस तरह के खुशखयाल मेरे मन में आए ही थे कि मुझे अपने इस भारत महान के एक राष्ट्रीय हाईवे पर यात्रा करने की जरूरत पड़ी। यह मुख्य राजमार्ग है मुंबई और गोवा के बीच और सुनिए इसका हाल।

इस सड़क में गड्ढे थे इतने चौड़े और गहरे कि बारिश के पानी ने इन्हें हौदियों में तब्दील कर दिया था। इन गड्ढों से गुजरे हम कि सामना करना पड़ा स्पीड ब्रेकरों का जो इतने खतरनाक थे कि बहुत सावधानी से गाड़ी चलानी पड़ी। मेरी तो छोटी गाड़ी थी तो इनके ऊपर से गुजरना कठिन था मगर नामुमकिन नहीं। लेकिन जिन बड़े-बड़े सामान ढोने वाले ट्रकों के लिए यह हाईवे बना है उनके लिए रास्ता इतना कठिन साबित हुआ कि कई बार गंभीर हादसे होते-होते रुके। 

बात यह है कि अब ये ट्रक लंबे, आधुनिक और विदेशी किस्म के बन गए हैं। सो अपनी पुरानी, देसी सड़कों पर इनका आना-जाना इतना मुश्किल है कि लुढ़कते हुए चलते हैं। इनके लिए हाईवे बहुत पतले और टूटे-पुराने हैं। ये सड़कें निकलती हैं छोटे गांवों और कस्बों के बीच में से। सो कभी कोई बच्चा दौड़ते-दौड़ते अचानक आ पहुंचता है तो कभी कोई आवारा जानवर। नतीजा यह कि अक्सर भारत के राजमार्गों पर आपको दिखेंगे मरे हुए जानवर और दुर्घटनाग्रस्त वाहन।

भारत के विकास को अगर उसकी सड़कों से नापा जाए तो साबित होगा कि हम दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में भी पिछड़े हैं। अपनी खुद की बात अगर करूं तो मैं अक्सर विदेशों में जब घूमने जाती हूं तो किसी देश के विकास का अनुमान लगाती हूं वहां सड़कों के हाल को देख कर। यह आदत मैंने तब डाली जब पहली बार चीन गई थी कोई बीस साल पहले। हुआ यह कि चीन का मेरा यह पहला दौरा शुरू हुआ शंघाई से जो उस समय काफी हद तक मुंबई जैसा दिखता था यानी कि आलीशान बाजारों के पीछे होती थी पुरानी, पतली गलियां जिनमें झुग्गीनुमा बस्तियां थीं।

इस शहर को देख कर इत्मीनान हुआ मुझे कि हम चीन के इतने पीछे नहीं हैं जितना लोग कहते हैं। फिर बेजिंग पहुंची हवाई जहाज से और वहां से सड़क के रास्ते जाना हुआ चीन की उस महान दीवार को देखने जो दुनिया के अद्भुत नजारों में गिनी जाती है। जिस हाईवे से हम वहां गए वह इतना आधुनिक था कि आज भी भारत में शायद एक ही ऐसी सड़क है और वह है यमुना एक्सप्रेस-वे का वह हिस्सा जो दिल्ली से आगरा तक जाती है।

भारत में अगर आधुनिक सड़कों का इतना गंभीर अभाव है तो इसलिए कि जिस राज परिवार ने इस देश को चलाया है दशकों से उसकी नजरों में गरीबों को आधुनिक सड़कों की कोई जरूरत नहीं थी। सोनिया-मनमोहन सरकार के एक मंत्री ने मुझे इन शब्दों में यह बात समझाई थी कभी, ‘आधुनिक सड़कों की जरूरत उन्हें है जिनके पास मर्सीडीज गाड़ियां हों। गरीबों को कोई जरूरत


नहीं है ऐसी सड़कों की।’

इस मानसिकता के कारण हमारे शासकों ने आम सेवाएं ऐसी बनार्इं देश भर में जो उनके खयाल में गरीबों के लायक थी। सरकारी स्कूल, अस्पताल अगर बेकार हैं तो इसलिए कि हमारे राजनेताओं के खयाल में गरीबों के लिए काफी हैं। हमारे महानगरों में अगर सस्ता आवास न होने के बराबर है तो वह इसलिए कि हमारे शासकों का खयाल है कि गरीब लोग तो पटरी पर भी रह लेते हैं तो उन्हें आवास से क्या मतलब।

इस देश के नए प्रधानमंत्री को यह मानसिकता विरासत में मिली है। इस मानसिकता की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि राजनीतिज्ञों और अर्थशास्त्रियों के अलावा इस सोच में विश्वास रखते हैं बुद्धिजीवी भी और हिंदी फिल्मों के निर्देशक और सितारे भी। 

समस्या यह है कि देश की गरीब जनता बदल गई है। गरीबों के सपनों और मध्यम वर्गीय लोगों के सपनों में अब कोई अंतर नहीं रहा है। आज शायद ही आपको कोई साधू-फकीर भी मिलेगा जिसके भीख के कटोरे में छिपा पड़ा न होगा एक सेलफोन। मुंबई शहर की सबसे गरीब बस्तियों में आज झोपड़ों से उगते दिखेंगे आपको सैकड़ों टीवी के डिश।

इन कच्ची बस्तियों में अगर आप लोगों से बातें करने की तकलीफ करेंगे तो मालूम पड़ेगा आपको कि इनकी मांगें बिल्कुल वैसी हैं जो मुंबई की आलीशान इमारतों में रहने वाले लोगों की होती हैं। इस देश के गरीब लोग भी मांगते हैं अपने बच्चों के लिए अच्छे स्कूल, अपने लिए अच्छी नौकरियां और अपनी बस्ती की गलियों में सफाई और वे तमाम सुविधाएं जो आज तक हमारे राजनेता मानते आए हैं कि सिर्फ मध्यम वर्गीय लोगों को चाहिए। यकीन कीजिए कि चुनावों के दौरान मुझे छोटे गांवों में ‘सीवरेज’ की मांगें सुनने को मिलीं। और हर जगह सुनने को मिलीं शिकायतें गंदगी की। ‘यहां तो जी आते ही नहीं है सफाई करने नगर पालिका के लोग।’ इतनी बार इस जुमले को मैंने सुना कि कानों में गूंजने लग गया था।

प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि गरीबों के जीवन में अगर परिवर्तन लाने की कोशिश करेंगे तो उनके सामने खड़ी हो जाएगी वामपंथी बुद्धिजीवियों की फौज जिनकी मानसिकता अभी बदली नहीं है और जो अपनी नजरों में तरफदारी कर रह हैं गरीबों की। गरीबी हटाने की बहुत बातें तो करते हैं ये लोग लेकिन अगर प्रधानमंत्री ने वास्तव में गरीबी हटाने का प्रयास किया तो गंभीर विरोध होगा इन गरीबों के ठेकेदारों से।


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