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दक्षिणावर्त : ऊंचाई का पैमाना PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:35

altतरुण विजय

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : अन्न, जल और शब्द। पर्व और गीत। धरती से जुड़े ये पांच शहर के बाहर आबाद और खुशहाल मिलते हैं। किसान ने इन पांचों को बचाया। लेकिन किसान को गंवार, देहाती और अनगढ़ कहा गया। जिसने हमें गढ़ा, अन्न पैदा किया, जल बचाया और जो भाषा हम बोलते हैं उसके मूल माधुर्य को संजो कर रखा, वह गंवार, गंवई और उजड्ड हो गया। जिसने भाषा को विकृत कर उसे न तो समृद्ध किया, न संवारा, जिसने जल समाप्त किया, अन्न का स्वरूप बिगाड़ा वह शहरी, शालीन, प्रगतिशील और सभ्य हो गया। जैसे पढ़े-लिखे होने का अर्थ हो गया- अंगरेजी जानने वाला। वैसे ही सुसंस्कृत होने के लिए शहरी होना जरूरी हो गया। किसान ने पर्व बचाए, पर्वों पर गाए जाने वाले गीत बचाए, हमारा पहनना, ओढ़ना, बिछाना, शादी की रस्में और कसमें बचार्इं, वह सिर्फ भुखमरी, पलायन, कर्ज से डूबी आत्महत्याओं का पर्याय बन गया। 

धरती से जुड़ा कुछ भी हो, वह इस हजारों साल वाली महान संस्कृति और उसके अहंकारी पुरोधाओं और संरक्षकों के देश में तिरस्कृत ही हो रहा है। तमिलनाडु में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को एक स्थानीय क्लब में प्रवेश से इसलिए मना कर दिया गया, क्योंकि वे धोती पहने हुए थे। शरीफ, भद्र, ऊंचे खानदानी और अमीर लोगों को अगर क्लब में जाना हो तो उनके जैसा होकर ही जाया जा सकता है। यानी अंगरेजों की जूठन पर पले लोगों की तरह बनो। अंगरेजी बोलो तो ऐसा लगे कि सच में अंगरेज के पालतू की दुम हिल रही है। हिंदी, तमिल या बांग्ला बोलो तो ऐसे बोलो कि मुंह से लेकर सारे बदन में बेहद जलन, तपन और पीड़ा हो रही है। तब लगेगा कि आप बहुत ऊंचे पढ़े-लिखे हैं। ऊंचाई अब इस बात से नापी जाती है कि आपकी अपनी जमीन, जल और जुबान से कितनी दूरी बढ़ गई है। 

तमिलनाडु में तमिल का अपमान है, वेष्टि यानी धोती का अपमान है तो तमाम हिंदी प्रदेशों में हिंदी हीनता का पर्याय है। यह कहना आत्मवंचना होगी कि हिंदी प्रदेशों की सरकारें और नेता हिंदी को बढ़ाने में दिलचस्पी ले रहे हैं या हिंदी के प्रति उनके मन में उत्साह, उमंग और सम्मान का भाव है। उनमें से हर एक के बच्चे और पोते-पोतियां, नातिन-नाती सिर्फ अंगरेजी की चमक प्रतिभासित कर रहे हैं। हिंदी में बात करिए तो कहेंगे अंकल आप बहुत कठिन हिंदी बोल रहे हैं। पापा कहेंगे, देखिए आप जैसे लोग ही हिंदी को पॉपुलर नहीं होने दे रहे हैं। इतनी डिफिकल्ट लैंग्वेज बना दिया है हिंदी को। संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में हिंदी का स्तर और उसकी आवश्यकता कम कर दी जाती है तो बड़े नेता (दूसरी पार्टियों के) आकर हमसे कहते हैं कि अगर इस तरह से हिंदी जबर्दस्ती चलाई तो आइएएस और आइपीएस का बेड़ा गर्क हो जाएगा। कोई स्टैंडर्ड ही नहीं रहेगा। अंगरेजी के बिना शासन चला सकते हैं? 

कोई उनसे यह नहीं पूछता कि किसान के बिना देश चला सकते हैं? अगर अपनी भाषा ही नहीं बचेगी, जल और शब्द समाप्त हो जाएंगे तो देश बचेगा? 

तमिलनाडु के उच्च न्यायालय में तमिल भाषा में व्यवहार हो, इसे लेकर आंदोलन चल रहा है। संसद में भी इस संबंध में निजी संकल्प पेश किया गया है। जून, 1862 में मद्रास उच्च न्यायालय स्थापित हुआ था। अभी तक सिर्फ अंगरेजी में काम होता है। अगर तमिल बोलने वाले गांववासी उच्च न्यायालय में जाना चाहें, वहां के फैसले समझना चाहें तो उन्हें बड़ी दिक्कत होती है, अंगरेजी जानने वाले वकीलों के पास जाना पड़ता है, अनुवाद कराना पड़ता है। वे अपने देश में और अपनी ही अदालतों से न्याय चाहते हैं, लेकिन उसके लिए उन्हें अंगरेजी सीखना जरूरी है। सन 2014 की यह बात है। आजादी शायद 1947 में ही मिली थी। उसके बावजूद अपने प्रदेश में, अपने क्षेत्र में, दफ्तरी कामकाज में सरकार के व्यवहार में अपनी भाषा स्थापित करने का अर्थ है- जुल्म सहना, पढ़े-लिखे अंगरेजी जानने वाले उच्च पदस्थ और प्रभावशाली लोगों के अपमानजनक ताने सुनना, यह सुनना कि तमिल में व्यवहार की मांग करना देश को पिछड़ेपन की ओर ले जाना है। 

तमिल भाषा दो हजार साल से ज्यादा पुरानी है। संगम साहित्य तो दो सौ से तीन सौ ईसा पूर्व


का है। तिरक्कुरल विश्व के महानतम साहित्य में अग्रणी और श्रेष्ठ स्थान रखता है। पांड्य सम्राटों के समय तिरक्कुरल का समुद्र पार प्रवास हुआ। चीन से लेकर मलेशिया, जापान और कंबोडिया तक में तमिल में प्रस्तर आलेख मिले हैं। सभ्यता, संस्कृति के महानतम उत्कर्ष और विश्वव्यापी प्रभाव का प्रतीक है तमिल भाषा। तिरुवल्लुवर का साहित्य तमिल मानस का सबसे बड़ा रक्षा कवच है। अगर यह कहा जाए कि तमिल भारतीय वांग्मय और सांस्कृतिक धरोहर की श्रेष्ठतम प्रतीकों में से एक है तो यह कहना भी ठीक होगा, अतिरंजना के बिना। लेकिन उसी तमिल में बात करना आज इसलिए पिछड़ेपन और तिरस्कार की बात मानी जाती है, क्योंकि अपनी धरती से जुड़ाव समाज में प्रतिष्ठा और बड़े होने का परिचय ही नहीं है। 

इसलिए आज भी ऐसे क्लब और उनके संचालक जिंदा हैं, जो धोती पहन कर क्लब में आना अस्वीकार्य मानते हैं। दफ्तरों में कितने लोग ऐसे हैं जो कुर्ता-पाजामा, धोती-कुर्ता, अच्छी सिली हुई बराबर इस्त्री की हुई और शायद कलफ भी लगी हुई भारतीय पोशाक पहन कर सरकारी काम करना उचित मानते हैं या ऐसी पोशाक पहन कर आइएएस, आइपीएस या डॉक्टर की कुर्सी पर बैठना शिष्टाचार के अंतर्गत श्रेष्ठ मानते हैं? दिल्ली के आइएएस अफसरों के बीच अगर ऐसी बात कह भी दी जाए तो वे इसे बड़ी गंभीरता से लेकर इतनी जोर से हंसेंगे, इतनी जोर से हंसेंगे कि मेज पर रखा पानी का गिलास शायद गिर जाए और बड़ी मुश्किल से मुंह पर रूमाल लगा कर, तेज हंसने की वजह से आंखों से निकले पानी को पोंछते हुए आपकी तारीफ में यह कहेंगे- ओ माई गॉड, वाट ए फनी जोक। तुमने तो यार आज मेरी दिन भर की थकान उतार दी, ऐसे जोक्स लाते कहां से हो? 

संभव ही नहीं है कि भारत से जो कोई बात जुड़ी हो उसे लागू करने में आपकी शान बढ़ जाए। 

जब नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना तय हो गया था तो दिल्ली के एक बड़े वाइन टेस्टर और अंगरेजी संपादकों की शान समझे जाने वाले महाशय ने एक चैनल पर अपनी आंखें हैरत से चौड़ी करते हुए कहा था- लेकिन वो तो अंगरेजी भी नहीं जानते। 

लेकिन वो तो अंगरेजी भी नहीं जानते। फिर भी हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री बन गए। 

जो अंगरेजी नहीं जानते वे भी हिंदुस्तान के जल, जंगल और जमीन ही नहीं, जुबान को भी बचाते हैं। जो अंगरेजी नहीं जानते वे भी कमबख्त हिंदुस्तानी बने रहते हैं और उनके लिए हमें अदालतों में, दफ्तरों, संघ लोकसेवा आयोग, संसद में, बसों और हवाई अड््डों पर कभी बांग्ला, कभी तमिल, कभी तेलुगू तो कभी हिंदी में कुछ-कुछ व्यवहार करना पड़ता है। अगर हिंदुस्तान के सारे लोग अंगरेजी जानने लग जाएं तो राष्ट्रीय एकता कितनी मजबूत हो जाएगी। कंप्यूटरों का खर्च बच जाएगा। एक भाषा, एक लोग, एक देश, एक जैसे अंगरेजों के चापलूस और उनकी जूठन चाटने वाले। कैसा मनोहारी दृश्य होगा! 

अब तो हिंदी, तमिल या बांग्ला में सोचना भी गुनाह है। अंगरेजी में सोचो, जरूरत हो तो हिंदी में अनुवाद करो और फिर उगलो। हिंदी के सम्मान की बात करना, तमिलनाडु में तमिल और विद्यालय में लागू करना, धोती पहने चेन्नई के क्लब में प्रवेश की मांग करना, किसान के गांव को गुड़गांव के आलीशान अमेरिकी शैली के कबूतरखानेनुमा अपार्टमेंट्स में रहने वालों से ज्यादा प्रतिष्ठा दिलाने की बात करना बड़ी शर्मिंदगी का अहसास दिलाने वाला काम हो गया है। काश, ऐसा हम कर पाएं कि अन्न, जल और शब्द भी कंप्यूटर या डिजिटल सिस्टम से पैदा होने लग जाएं।


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