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समांतर संसार : अपराध का सिलसिला PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:33

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : बंगलुरु के एक नामी स्कूल में छह वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और उसके बाद स्कूल प्रशासन की खामोशी इस बात का सबूत है कि हमारे समाज में किस प्रकार के वहशी और दरिंदे घूम रहे हैं। अगर एक मासूम बच्ची तक सुरक्षित न हो और स्कूल प्रशासन अपना पल्ला झाड़ने में लग जाए तो इससे यह साबित होता है कि हमारा समाज महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किसी भी स्तर पर गंभीर नहीं है। बंगलुरु की इस घटना पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय को संज्ञान लेकर स्कूलों को दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए। 

पूरे देश में हर दिन औसतन बानबे महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2013 की रपट के अनुसार यों तो हर तरह के अपराध बढ़े हैं, लेकिन चिंता की बात है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। अफसोस की बात है कि इन अपराधों को भी मीडिया में दिखाते समय राजनीति को सामने रखा जाता है। किसी एक राज्य या एक पार्टी को निशाने पर ले लिया जाता है या फिर एक वर्ग को। इसके अलावा दंगों में या भीड़ द्वारा महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की रिपोर्ट दिखाने या उनकी निंदा करने में भी दोहरा मापदंड अपनाया जाता है। ऐसे में चिंता का विषय है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर कैसे रोक लगे। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और असम बलात्कार की सबसे अधिक घटनाओं वाले पहले पांच राज्यों में शामिल हैं।  मगर मीडिया की कवरेज देखें तो ऐसा लगता है जैसे कुछ एक ही राज्यों में ऐसे अपराध हो रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध में राजनीति न सिर्फ समाज की संवेदनहीनता को दर्शाती, बल्कि अपराध के विरुद्ध जंग को भी कमजोर करती है। देश में जिस गति से अपराध बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से पुलिसकर्मियों की संख्या नहीं बढ़ रही है। पुलिस सुधार की बात तो बहुत होती है, पर इस दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है। अदालतें भी कम पड़ रही हैं, उनमें अनगिनत मामले लंबित हैं। इन परिस्थितियों में अपराध को कम कर पाना चुनौती है। हालांकि इसके बावजूद कुछ आशा के संकेत भी मिले हैं। 

एक तो यह कि पुलिस की कार्यक्षमता में कुछ वृद्धि हुई है। 2012 में जहां पुलिस ने साढ़े चौंसठ प्रतिशत मामले निपटाए थे वहीं 2013 में साढ़े अड़सठ प्रतिशत मामले निपटाए गए। मगर हैरानी की बात है कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में बलात्कार की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। 

देश के जिन राज्यों में इन घटनाओं में कमी आई है वह है पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल में बलात्कार के कुछ मामलों में जरूर हंगामा हुआ, पर 2012 में हुई दो हजार छियालीस घटनाओं के मुकाबले 2013 में यह संख्या घट कर एक हजार छह सौ पचासी रह गई। मगर चिंतित करने वाली बात है कि इन घटनाओं में महज चार सौ बाईस मामलों में वारदात करने वाले जान-पहचान वाले थे। यानी ज्यादातर वारदातें बाहरी लोगों द्वारा अंजाम दी गर्इं। यह समाज में घुल रही आपराधिक प्रवृत्ति को उजागर करती है। 

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में अपराधों की संख्या दोगुनी हो गई है। वहां 2012 में बलात्कार के एक हजार नौ सौ तिरसठ मामले दर्ज हुए, जो 2013 में बढ़ कर तीन हजार पचास हो गए। यहां यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार के दौरान दंगों का एक सिलसिला-सा नजर आता है। मुजफ्फरनगर दंगों और वहां हुए महिलाओं के खिलाफ अपराध की वजह से समाजवादी पार्टी को लोकसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा था। इसके बाद भी वहां से लगातार महिलाओं के खिलाफ अपराधों की खबरें मिलती रही हैं। इन वारदातों की गूंज विदेशों में भी पहुंची है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पर चिंता जताई है। 

राजस्थान में भी पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश से अधिक बलात्कार की घटनाएं हुर्इं- तीन हजार दो सौ पचासी। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र


और आंध्र प्रदेश में भी उत्तर प्रदेश से अधिक बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। मध्यप्रदेश में 2013 में देश में सबसे अधिक बलात्कार की घटनाएं हुर्इं- चार हजार तीन सौ पैंतीस। महाराष्ट्र में यह संख्या तीन हजार छह सौ तीन है। ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध अपराध का किसी राजनीतिक दल से कुछ लेना-देना नहीं है, बल्कि समाज का सोच ही इसके पीछे असली दोषी है। इसके बाद पुलिस और कानून आते हैं, जो महिलाओं का विश्वास जीत पाने में विफल रहे हैं। शायद हमारे समाज के ताने-बाने में ही महिला असुरक्षा का बोध है। 

जाहिर है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध हर राज्य में हो रहे हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस पार्टी की सरकार है। मगर मीडिया में राजनेताओं के बयानों से ऐसा लगता है जैसे उन्हें केवल विरोधी पार्टी द्वारा शासित राज्य नजर आते हैं। जिनके खिलाफ यह बात की जाती है वे अपने विरोधियों के राज्य के रिकॉर्ड निकाल कर सामने रख देते हैं। इस तरह एक-दूसरे पर निशाना साधते हुए ये लोग वास्तविक समस्या को भटका देते हैं। 

दरअसल, यह सारा मामला हमारे समाज से जुड़ा है। हमारे समाज में महिलाओं को लेकर गलत सोच को बढ़ावा मिला है। पुरुष करे तो ठीक, पर महिला करे तो गलत जैसा सोच समाज को गलत दिशा में ले जा रहा है। मैं महिलाओं के मुंह नहीं लगता, महिला हो इसलिए माफ कर दिया, चूड़ी पहन के बैठ जा, महिलाओं की तरह रोने लगा, औरत हो तो औरत की तरह रहो ज्यादा हवा में मत उड़ो, तुम लड़की हो इसलिए नहीं पढ़ सकती, अरे लड़की बड़ी हो गई है इसके हाथ पीले कर दो, दो लड़कियां सिर पर बोझ बन कर बैठी हैं जैसी महिला विरोधी बातें हमारे समाज की ही देन हैं। ये धारणाएं बताती हैं कि हमारा समाज महिलाओं को लेकर किस तरह के सोच में जीता है। 

इस मामले में धर्म, समाज, राजनीति सबको आगे आकर महिलाओं की इज्जत-आबरू की रक्षा करनी होगी। घर से निकलते ही हर मोड़, हर गली में कोई न कोई धार्मिक स्थल नजर आ जाता है, पर क्या हमारे जीवन में धर्म कुछ ऐसा कर पाया है कि हम अपराध से बचें। धर्म का नाम लेकर एक-दूसरे के खिलाफ अपराध और अत्याचार का पहाड़ तोड़ दिया जाता है तब भी धर्म चुप रह जाता है। जाहिर है, धर्म हमारे जीवन में व्यावहारिक बदलाव लाने से चूक रहा है, क्योंकि हम धर्म या मजहब की वास्तविक आत्मा से दूर हो गए हैं। 

सरकारें, राजनीतिक दल और समाज के छोटे-छोटे समूह तो अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहेंगे, लेकिन धर्म में सम्मान पाने वाले लोग अगर इस संबंध में लोगों को महिलाओं का सम्मान करने की सख्त हिदायत दें, तो यह समाज की बड़ी सेवा होगी। मगर कभी-कभी विचार आता है कि क्या धर्म इस संबंध में कुछ कर पाएगा? जरूरत है कि महिला सुरक्षा को लेकर किसी भी प्रकार समाज को जागरूक किया जाए। एक बार समाज में सुधार आ गया तो पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है, क्योंकि यह मामला पूरी तरह समाज से जुड़ा है और इसमें राजनीति की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है।


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