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बहस : चयन या संचयन PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:31

विक्रम गुप्ता

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : कोश की अनिवार्य विशेषता बताते हुए एवी केल्ट ने अपनी पुस्तक ‘द सेंटरी डिक्शनरी साइक्लोपीडिया ऐंड एटलस’ में लिखा है: ‘द कलेक्शन नॉट ए सेलेक्शन’ यानी शब्दों का संचयन, न कि चयन। जाहिर है किसी भी भाषा के शब्दकोश में उस भाषा के ही शब्दों का संचयन होना चाहिए। ‘वर्धा हिंदी शब्दकोश’ इस सिद्धांत के विपरीत दिखाई पड़ता है। यह कोश महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा राम प्रकाश सक्सेना के प्रधान संपादकत्व में तैयार हुआ। उन्होंने इसका पूरा श्रेय वर्धा विश्वविद्यालय के उपकुलपति को दिया है। इस शब्दकोश पर विवाद का मुख्य कारण है, इसमें अंगरेजी शब्दों की भरमार। सवाल है कि इसमें प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों का हिंदीकरण कहां तक उचित है? क्या इसके पीछे कोई साजिश है या बदलते समय में हिंदीतर और हिंदी प्रदेशों में मिश्रित रूप में प्रयुक्त हो रहे शब्दों के अनुसार यह शब्दकोश तैयार करने की एक नई कोशिश? उद्देश्य चाहे जो हो, पर ये दोनों प्रश्न हिंदी के भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं। 

विभूतिनारायण राय ने इस शब्दकोश के ‘प्राक्कथन’ में लिखा है कि ‘‘इस भाषा के शब्दकोश निर्माण का पहला गंभीर प्रयास उन्नीसवीं शती के अंत में नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा हुआ। और फिर बाद में ज्ञानमंडल, बनारस और हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग जैसी संस्थाओं, फादर कामिल बुल्के, हरदेव बाहरी और डॉ. रघुवीर जैसे व्यक्तिगत प्रयासों से अच्छे शब्दकोश बीसवीं शती के पूर्वार्ध में बनाए गए। इन शब्दकोशों को अगर ध्यान से देखें तो दो महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। शुरुआती शब्दकोशों में ब्रजभाषा के शब्दों की भरमार है और उनमें अधिकांश अब साहित्य या बोलचाल की भाषा में प्रयोग नहीं होते हैं।’’ इन कथनों का क्या अर्थ लगाया जाए? यही कि जब तक आप अंगरेजी शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते, तब तक आधुनिक नहीं हैं। या फिर ऐसा शब्दकोश, जिसमें अंगरेजी शब्दों का हिंदीकरण कर दिया गया हो, वह आधुनिक की श्रेणी में आता है! 

कोई भी शब्द तब तक तकनीकी शब्द की श्रेणी में नहीं आ सकता, जब तक कि वह व्यवहार में प्रयुक्त न हो। पर इसका यह अर्थ कतई नहीं होना चाहिए कि व्यवहार-मात्र में होने के कारण उसे हिंदी शब्दकोश में शामिल कर दिया जाए। शब्दकोश में इस्तेमाल किए जा रहे या किए जाने वाले शब्दों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करके उसकी प्रयुक्ति की एक समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए, जैसा कि अंगरेजी आदि भाषाओं में होता है। मसलन, कुछ दिनों पहले ‘ट्विटर’ शब्द को ऑक्सफर्ड डिक्शनरी ने मात्र सात वर्ष के प्रचलन के बाद अपना लिया था, जिस पर काफी विवाद हुआ, जबकि किसी भी शब्द को ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में अपनाने के लिए उसका दस वर्ष तक प्रचलन में होना जरूरी था। क्या हिंदी शब्दकोशों में इस तरह का कोई नियम-कायदा है? 

दूसरा सवाल है कि क्या उच्चतम स्तर पर विद्वानों या अध्येताओं के जरिए व्यवहार में प्रयुक्त शब्दावलियों को शब्दकोश में डाल देने मात्र से नया सोच पैदा हो जाता है या फिर उस भाषा के अस्तित्व को तहस-नहस करने की कोशिश की जाती है? ऐसा लगता है कि इस शब्दकोश में अंगरेजी शब्दों की बहुतायत प्रविष्टि करके यह साबित करने की कोशिश की गई है कि हिंदी का कोई अस्तित्व ही नहीं है! 

संपादक महोदय ने भूमिका में लिखा है कि ‘‘कंप्यूटर और इंटरनेट के क्षेत्र में इंग्लिश के वर्चस्व को भी अपनी हिंदी चुनौती दे रही है। आज इसके बोलने वालों और पढ़ने-लिखने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। बढ़ते भारतीय बाजार के कारण वैश्विक धरातल पर हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। विदेशी इसलिए भी अधिक रुचि ले रहे हैं कि हिंदी उन्हें इस बाजार में घुसपैठ के अवसर प्रदान करने में सक्षम है। हिंदी का अध्ययन करने वाले ऐसे विदेशी अध्येताओं के लिए अच्छे शब्दकोशों की आवश्यकता है।’’ इस कथन का क्या अर्थ लगाया जाए? यही कि यह शब्दकोश विदेशी हिंदी अध्येताओं और हिंदी-अंगरेजी मिश्रित भाषा के प्रयोक्ताओं के लिए बनाया गया है? क्या इस शब्दकोश में प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों का अर्थ फादर कामिल बुल्के के


शब्दकोश से उदाहरण स्वरूप नहीं लेना चाहिए था? साथ ही इस शब्दकोश का निर्माण करते समय कुछ प्रामाणिक हिंदी-हिंदी शब्दकोशों को केंद्र में नहीं रखना चाहिए था? 

इस शब्दकोश को लेकर बहुत सारे प्रश्न बुद्धिजीवियों के हैं और हिंदी भाषा अध्येताओं के भी। पर इन सभी प्रश्नों की जवाबदेही सफाई के रूप में भी नहीं पेश की जा सकी है। 

प्रधान संपादक महोदय ने भूमिका में लिखा है: ‘‘हिंदी में कोशों की परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी से आरंभ हो गई थी। बीसवीं शताब्दी के अंत तक कई शब्दकोश बाजार में आ गए। कई कमियां होते हुए भी डॉ. कामिल बुल्के का अंगरेजी-हिंदी कोश अच्छा माना जाता है। संप्रति कोश विज्ञान और कोश निर्माण विज्ञान बहुत विकसित हो चुके हैं। वैज्ञानिकता की कसौटी पर हिंदी का एकाध कोश ही शत-प्रतिशत खरा उतरेगा।’’ यह सर्वविदित है कि हिंदी का प्रथम कोश अमीर खुसरो का ‘खालिकबारी’ माना जाता है। यह कोश हिंदी-फारसी में था। 1829 ई. पादरी आदम ने हिंदी-हिंदी कोश लिखा। अगर हम पादरी आदम के कोश के आधार पर हिंदी कोश का उद्भव उन्नीसवीं शती मानें तो अनेक प्रश्न उठते हैं, जैसे कि हिंदी का उद्भव 1000 ई. के आसपास है, तो शब्दकोश लगभग आठ सौ वर्ष बाद कैसे? आदि। इन सबके बीच फिर हिंदी भाषा, कोश, व्याकरण, साहित्य आदि के उद्भव पर प्रश्नचिह्न लगने लगेगा। 

कोश की भूमिका में यह भी दावा किया गया है कि ‘‘अभी तक के हिंदी शब्दकोश वर्णक्रम में नहीं हैं। यह कथन सामान्य व्यक्ति को आश्चर्य चकित अवश्य करता है, लेकिन हिंदी समाज बहुत कम ही हिंदी शब्दकोशों का प्रयोग करता है। इंग्लिश शब्दकोश हर शिक्षित परिवार में मिल जाएगा, लेकिन कई हिंदी प्राध्यापकों के घर में भी हिंदी शब्दकोश नहीं मिलेगा। एक सर्वेक्षण से यह पता चला है कि कई हिंदी प्रोफेसर यह बताने में असमर्थ रहे कि हिंदी का ज्ञान शब्द ‘ज’ वर्ण में मिलेगा।’’ अंगरेजी की तरह हिंदी में सिर्फ छब्बीस वर्ण नहीं, बल्कि बावन ध्वनियां हैं। इन ध्वनियों के आधार पर शब्दकोश में शब्दक्रम की योजना हलंत, अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग, स्वर, व्यंजन, संयुक्त वर्ण के क्रम में प्रयुक्त होती हैं। अगर ये सब छोटी-छोटी चीजें किसी भाषा अध्येता या प्रयोक्ता की जानकारी में नहीं हैं, तो यह उस व्यक्ति की कमी है, जो इसे सुधारने की कोशिश नहीं करता। बौद्धिक स्तर पर हिंदी की स्थिति बहुत दयनीय है। इसका कारण यह है कि दैनिक जीवन में हम हिंदी के साहित्यिक शब्दों का कम इस्तेमाल करते हैं। 

प्रत्येक भाषा के दो रूप होते हैं- साहित्यिक भाषा और जनभाषा या बोलचाल की भाषा। कोई भी भाषा अपनी जनभाषा से ही नया स्वरूप धारण करती है। भाषाई विकास के और भी आयाम हो सकते हैं और इन्हें समझने के लिए उपलब्ध अन्य शब्दकोशों को भी देखा जाना चाहिए। हिंदी शब्दसागर, समांतर हिंदी कोश, वृहत हिंदी कोश आदि को इसलिए नहीं देखा जाना चाहिए कि भाषा की साहित्यिक क्लिष्टता बरकरार रहे, बल्कि इसलिए भी देखा जाना चाहिए कि उसमें हिंदी का अपना वजूद छिपा हुआ है, उसका अपना अस्तित्व, पहचान और उसका इतिहास बना हुआ है। इन्हीं परंपराओं के बल पर हिंदी सतत प्रवहमान है।


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