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मतांतर : स्तुति में विकल मन PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:29

अरुण माहेश्वरी

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : लोकसभा के चुनाव हुए और मोदी सरकार को बने अभी करीब दो महीने हुए हैं। इस बीच रेल बजट, आम बजट और सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई, चीनी मिल मालिकों को दिए गए अरबों रुपए के लाभ, बीमा और प्रतिरक्षा क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश के दरवाजे कुछ और खोल देने और भूमि अधिग्रहण कानून में कॉरपोरेट के पक्ष में संशोधनों के संकेतों से आम लोग इस सरकार की पूरी गति-प्रकृति का अनुमान लगा कर बेहद शंकित हैं। ‘अच्छे दिन’ का सपना आज का सबसे बड़ा मजाक, दुखीजनों के जख्मों पर नमक के छिड़काव का पर्याय लगने लगा है। 

दरअसल, लोग अपने जीवन के अनुभवों, ठोस भौतिक परिस्थितियों से सामाजिक परिस्थितियों का आकलन करते हैं। इसमें विचार भी वही चलते हैं, जिनका वास्तविक जीवन की जरूरतों से संपर्क होता है। जीवन की जरूरतों से एकमेक होकर ही तो विचार सामाजिक विकास की प्रभावशाली शक्ति का रूप लेते हैं। यह भौतिक नजरिया अपनी मूल प्रकृति में ही प्रगतिशील होता है। यह सीधे तौर पर भौतिक उत्पादन की परिस्थितियों यानी प्राकृतिक विज्ञान की उपलब्धियों से जुड़ा होता है। इसीलिए मोदीजी ने अपने प्रचार में महंगाई दूर करने, कुशासन और भ्रष्टाचार को खत्म करने और बड़े लोगों के बजाय आम, सामाजिक जीवन को सुखी बनाने की बातों पर जोर देकर एक प्रकार से प्रगतिशील जनमत को प्रभावित किया था। एक बार के लिए आरएसएस के सभी कोरे खयाली, उन्मादी मुद्दों को ताक पर रख दिया था। 

लेकिन इन सबके विपरीत, भौतिक जीवन की तुच्छताओं के बजाय हमेशा किसी असीम की खोज में शुतुरमुर्ग की तरह सिर गड़ाए बैठे हिंदी के बुद्धिजीवियों की एक घोषित ‘प्रगतिशीलता-विरोधी’ जमात आमजन के क्रमश: बढ़ते उद्वेग से अलग मोदी शासन के आगमन की खुशी में मस्त है। उसे यह अचानक किसी सतयुग का अवतरण, परमार्थ, पुरुषार्थ, आत्मज्ञान, परमात्म ज्ञान, अभूतपूर्व आत्म-मंथन और आत्मदान आदि को जागृत करने वाले नए युग का, गीता के श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:/ अभ्युत्थान धर्मस्य: तदात्मानं सृजाम्यहम्’ की याद दिलाने वाला महान ऐतिहासिक पट-परिवर्तन जान पड़ता है। अब ‘अवसरवादियों’, ‘चाटुकारों’ और ‘नकलचियों’ की नहीं चलेगी! और जिस बात से ये महोदय सबसे ज्यादा खुश हैं वह यह कि अब ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ की राजनीति के दिन लद गए हैं, धर्म चलेगा, धर्म-निरपेक्षता नहीं चलेगी। 

बाइबल का बहुत चालू कथन है- ‘चित्त ही है जो जीवन है, काया का कोई मोल नहीं’। और हमारे बुद्धिजीवी, इसी चित्त के लाइसेंसधारी व्यापारी, जनता की जीवन संबंधी क्षुद्र चिंताओं को दुत्कारते हुए खुशी से उन्मादित हैं, धर्म-रक्षार्थ मैदान में कूद पड़े हैं, लोगों को उनके ‘वास्तविक वर्तमान में मुक्त कराने के लिए’, लेकिन इस धर्मयुद्ध में बाइबल के कथन के विपरीत चाणक्य के नारे ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ (धर्म का साधन शरीर है) के साथ! 

रमेशचंद्र शाह के लंबे लेख (जनसत्ता, 14, 15 जुलाई) से इन तमाम बातों का संदर्भ समझा जा सकता है। उसकी आखिरी पंक्ति है- ‘‘यही वह मार्ग याकि उपाय-कौशल और शक्ति-साधना है, जिसका अवलंबन करके हम अपने वास्तविक वर्तमान में मुक्त हो सकते हैं...।’’

शाहजी के पहले उदयन वाजपेयी का भी एक लेख प्रकाशित हुआ था- ‘शायद कुछ नया हो’ (25 मई)। वे भी यह सोच-सोच कर खुश थे कि अब (1) भारत का पश्चिमीकरण रुकेगा, (2) गणतांत्रिक (आंचलिक) राजनीति का विकास होगा, (3) सब समुदाय अब ‘दृश्य’ होंगे, कोई ‘अदृश्य’ नहीं होगा, (4) जातिवाद की बदनामी कम होगी, और इसमें भी सर्वोपरि, (5) राजनीतिक विमर्श पर कम्युनिस्टों का अदृश्य वर्चस्व कमजोर होगा। 

उनके शब्दों में, ‘‘वैसे तो कोई भी भूमंडलीकरण स्वागतयोग्य नहीं है।’’ वे कभी सोचते हैं कि ‘भूमंडलीकरण’ का सार-तत्त्व है मानव मात्र की ‘प्राणी सत्ता’। क्या इससे वे इनकार कर सकते हैं? भूमंडलीकरण का बहुलांश मानव की इस प्राणी सत्ता से जुड़ा हुआ है। ‘खुला खेल फर्रूखावादी’ के समर्थक उदयन वाजपेयी इस बात से सबसे अधिक खुश हैं कि अब बहुसंख्यक भी अदृश्य नहीं रहेंगे, वे मानव की इस सबसे ‘दृश्य प्राणीसत्ता’ के विरुद्ध क्यों है? सिर्फ इसलिए कि कम्युनिस्टों ने दुनिया के मेहनतकशों को एक करने का नारा दिया था! 

उदयनजी की ऐसी ही किंचित ठोस भावनाओं की


बिल्कुल अमूर्त और वायवीय अभिव्यक्ति है रमेशचंद्र शाह का ‘जनसत्ता’ के दो अंकों में छपा लेख। कोरी असंलग्न, असंबद्ध, बे-सिर-पैर की बातें। फिर भी, यह देखने कि आखिर वे कौन-सी दमित कामनाएं हैं, जिनको सात परदों में छिपा कर व्यक्त करने की गरज से यह समूचा लेख लिखा गया है, हमने बड़े कष्ट और धीरज के साथ इस अपाठ्य पाठ को पढ़ा। 

उनके लेख के पहले अंश का शीर्षक है- ‘शक्ति की करो तुम मौलिक कल्पना’ और दूसरे अंश का- ‘अपनी सभ्यता की शर्तों पर’।

पहले अंश में शाहजी ने जयशंकर प्रसाद के ‘आंसू’ की पंक्ति उद्धृत की है- ‘छलना थी फिर भी, उसमें मेरा विश्वास घना था/ उस माया की छाया में कुछ सच्चा स्वयं बना था।’ 

मोदीजी के राजतिलक पर प्रसादजी का ‘आंसू’! ‘आंसू’ का पहला छंद है- ‘इस करुणा कलित हृदय में/ अब विकल रागिनी बजती’...। और, इसका सबसे लोकप्रिय छंद है- ‘जो घनीभूत पीड़ा थी/ मस्तक में स्मृति-सी छाई/ दुर्दिन में आंसू बन कर/ वह आज बरसने आई।’ तो क्या यह लेख, किसी करुणा कलित हृदय का हाहाकार है, जो इन दुर्दिन में आंसू बन कर बरसने आया है! 

इसी की तलाश में टोह-टोह कर किसी प्रकार हमने इस दुष्कर लेख को पढ़ा। इसमें गांधी आते हैं, अरविंद भी हैं, लेकिन यह ‘करुणा कलित हृदय’ मोदी युग से आह्लादित होकर ‘पुरुषार्थ’ की तलाश में अंत में धर्म-रक्षार्थ बल प्रयोग की शक्ति-साधना के आह्वान में कैसे पर्यवसित होता है, इसका एक विचित्र-सा उदाहरण है यह लेख। दरअसल, शाहजी ने अपने उद्देश्य-साधन के लिए इस लेख में गांधी-अरविंद आदि के बजाय गुरु गोलवलकर का सहारा लिया होता, तो उनका लेख जिस गड़बड़झाले का उदाहरण प्रतीत होता है, वैसा नहीं होता। बात अधिक साफ होती।  

गोलवलकर ने उनके मन की बात, मूलभूत विभेद वाली संस्कृतियों से उत्पन्न समस्याओं का जो ‘नाजी निदान’, यहूदियों के समूल सफाए में, बताया है, वह खुल कर सामने आता। धर्म-रक्षार्थ खड्ग-हस्त होने का अर्थ स्पष्ट हो जाता। अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के युग की समाप्ति पर शाहजी की खुशी का सच बिल्कुल प्रकट रूप में सामने होता। लेख ज्यादा पठनीय होता। 

इसके विपरीत शाहजी ने प्रसाद और फिर, गांधी, अरविंद के सहारे, ‘महाभारतीय सभ्यता के इतिहास चक्र’ के जरिए ‘संघवाद का डंका’ बजाने का जो बीड़ा अपने इस लेख में उठाया है, वही इसको कोरे प्रलाप का रूप देने की वजह बन गया। जीवन की ठोस सच्चाई के विषयों से पूरी तरह कटे होने के कारण वैसे ही यह लेख किसी के काम का नहीं है। जनता आलू-प्याज के भाव गिन रही है और शाहजी आत्मज्ञान और आत्मदान का प्रवचन दे रहे हैं, हजारों सालों की गुलामी से स्वतंत्रता के भाव में उन्मत्त हैं! 

प्रसादजी के ‘कामायनी’ की पंक्तियां हैं- ‘क्यों इतना आतंक ठहर जा ओ गर्वीले!/ जीने दे सबको फिर तू भी सुख से जी ले।’ हमारा कहना है, प्रसाद की इन पंक्तियों के मर्म को ही शाहजी अगर आत्मसात कर लेते तो भारत जो आज है, उस पर उनके रुदन और आंसुओं का ऐसा रूप नहीं होता, मोदीजी के आगमन की खुशी में अभिभूत मन के आंसुओं जैसा। खुशी के इन ‘आंसुओं’ के लिए प्रसाद, गांधी, अरविंद का मिथ्या अवलंब काव्यशास्त्र की दृष्टि से ‘संशय योग’ का विघ्न पैदा करता है, उनके लेख के दीर्घ उपक्रम को हास्यास्पद कलाबाजियों में बदल देता है। 


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