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कभी-कभार : असावधान और अप्रामाणिक PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:14

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : ‘तद्भव’ के नए अंक में उसके कथाकार-संपादक अखिलेश के संपादकीय का एक अंश यह है: ‘...फिर क्या करे साहित्य? क्या वह गैरराजनैतिक हो जाए? निश्चय ही यह परिणाम कुछ लोगों को पसंद आएगा, जो बड़ी आत्मश्लाघा के साथ साहित्य की स्वायत्तता का गुणगान करते हुए राजनीति-निरपेक्ष रचनाशीलता की पैरवी करते हैं और समाज-निरपेक्ष रचनाएं लिखते हैं। दरअसल, साहित्य में राजनीति-निरपेक्षता की वकालत भी अपने वास्तविक अर्थ में एक प्रकार की खतरनाक राजनीति है जो अंतत: वंचित, प्रताड़ित वर्ग की मुखालफत और वर्चस्वशाली समुदाय की हिफाजत करती है।’ कवि अरुण कमल ने इसी अंक में अपने आत्मवृत्तांत में एक जगह लिखा है: ‘जिन्हें कलावादी कहा जाता है वे भी अपनी कला, कला के मूल्यों के प्रतिबद्ध और समर्पित होते हैं और उनके लिए जान देने तक को तैयार रहते हैं। वे कला के व्यवसायीकरण, बाजार और व्यावहारिक पूंजीवादी मूल्यों का विरोध करते हैं। हिंदी में जो अपने को कलावादी मानते हैं वे वास्तव में बाजारवादी और सत्तावादी हैं, जबकि बाहर कलावाद के सभी आंदोलनों ने ग्लैमर और सत्ता का विरोध किया।’ 

दोनों ही वक्तव्यों में यह नहीं बताया गया है कि हिंदी में कलावादी कौन है, क्योंकि किसी का नामोल्लेख नहीं है। हूं कि नहीं, मुझे दशकों से एक तबके द्वारा कलावादी कहा जाता रहा है, सो तर्क के लिए मान लेता हूं कि हूं। मेरे अलावा कृष्ण बलदेव वैद, कमलेश, ध्रुव शुक्ल, मदन सोनी, उदयन वाजपेयी, शिरीष ढोबले, तेजी ग्रोवर, रमेशचंद्र शाह, जयशंकर, नंदकिशोर आचार्य, गगन गिल विनोदकुमार शुक्ल को, कुछ लोगों द्वारा (जैसे राजेंद्र यादव द्वारा) कलावादी माना गया है। वैसे तो इन सभी की अलग-अलग शैली, अलग-अलग दृष्टि है और अलग-अलग राजनीति भी, पर मोटे तौर पर उन्हें ऐसे लेखक कहा जा सकता है, जो कि साहित्य की स्वायत्तता में विश्वास करते हैं। उनमें से कई, जैसे मैं, यह भी मानते-कहते आए हैं कि साहित्य अपने आप में राजनीति है और उसे किसी और राजनीति का उपनिवेश नहीं होना चाहिए: जैसे तथाकथित राजनीति वैसे ही साहित्य भी मानवीय स्थिति, समय, समाज, व्यक्ति आदि को देखने-समझने-बदलने की विधा है। इनमें से किसी ने कभी भी साहित्य की समाज-निरपेक्षता की वकालत न अपने लिखे, न अपने किए में की है। ये सभी लेखक लोकप्रिय लेखक नहीं हैं और उन्होंने कभी बाजार या व्यवसायीकरण या सत्ता की कोई हिमायत या वकालत की है। उनमें से मुझे छोड़ कोई सत्ता से संबद्ध नहीं रहा- हममें से कोई सत्ता-समर्थक नहीं रहा है। शाह सा’ब को पद्मश्री मिला, बाकी किसी को कोई बड़ा पुरस्कार भी नहीं- मुझे साहित्य अकादेमी पुरस्कार और कबीर सम्मान मिले। उत्तर प्रदेश सरकार का भारत भारती सम्मान मैंने अस्वीकार भी किया। वंचितों और प्रताड़ितों के प्रति कोई असंवेदनशीलता या सक्रिय जागरूकता का कोई साक्ष्य उनके लिखे-कहे से नहीं निकाला जा सकता। अलबत्ता, सामाजिक परिवर्तन को लेकर उनकी अपनी अलग-अलग दृष्टियां हैं, जिनका उन्हें लोकतंत्र में और साहित्य के जनतांत्रिक परिसर में रखने और व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। आपकी सामाजिक दृष्टि से असहमत या अपनी कोई और दृष्टि रखने वाला समाज-निरपेक्ष या समाज-विरोधी नहीं हो जाता! 

जब आप दूसरों के बारे में बौद्धिक असावधानी और बिना साक्ष्य या प्रमाण के आरोप लगाते हैं तो उन दूसरों द्वारा अपनी स्थिति स्पष्ट करने को आप ‘आत्मश्लाघा’ कह कर अपनी बेईमानी ढांप नहीं सकते। कलावादी बताए जाकर लांछित लेखकों ने सांप्रदायिकता, धार्मिक उन्माद, जातीय हिंसा और असहिष्णुता का, अवसर आने पर, सख्त विरोध किया है। हाल के महीनों में इसी स्तंभ के जरिए नए राजनीतिक प्रलोभनों का मैंने ही जम कर विरोध किया है, कविताएं लिखी हैं। ऐसे में ऐसे असावधान और अप्रामाणिक आरोप पढ़ कर क्लेश होता है। शायद हम अच्छे लेखक न हों, आपकी जमात के न हों, पर मानवीय अंत:करण की आवाज उठाने, प्रतिरोध करने और अकेले पड़ कर अपने सच पर कायम रहने में हम किसी से पीछे नहीं हैं, न रहे हैं। 


चिथड़े समय में थिगड़ा कला

हमारा समय बिखरा और विपर्यस्त समय है: उसे न तो एकीकृत ढंग से देखा-समझा जा सकता है और न ही किसी सुसंगत सामान्यीकरण में सरलीकृत किया। उसकी जटिलता, विडंबना और अंतर्विरोध जगजाहिर है। महास्वप्न घूरे पर पड़े हैं, पर हमने सपना देखना छोड़ा नहीं है। समय हमारी पकड़ में नहीं आता, पर उसके किसी न किसी हिस्से को स्वायत्त करने की कोशिश हमने छोड़ी नहीं है। हमेशा की तरह, उसमें जो है और जो नहीं है, जो हो सकता है और जो होगा के बीच निरंतर द्वंद्व चलते रहते हैं। कला का ऐसे समय से कई तरह का संबंध हो सकता है: वह ऐसे समय के विपर्यास को अनदेखा कर सकती है- समय को उसके हाल पर छोड़ कर काल पर ध्यान एकाग्र कर सकती है, वह बिखरे समय को रचने-खोजने का दुस्साहस कर सकती है, वह समय को प्रतिबिंबित करने का आसान और सुपरिचित रास्ता अपना सकती है। 

सीरज सक्सेना की नई कलाकृतियां, जो इंदौर की रिफलेक्शन्स गैलरी में इन दिनों दिखाई जा रही हैं, समय के साथ, कम से कम अपना, एक नया संबंध प्रस्तावित करती हैं। हमारे


एक शास्त्रीय कवि की पृच्छा रही है: ‘फटा गगन-पट कौन सिएगा?’ सीरज की नई कला का प्रस्ताव एक तरह से फटे समय-पट को सीने का नहीं, उसमें कुछ थिगड़े लगाने और उसे, जितना वह उनके कैनवास में अंट सकता है, रफू करने का है। यह रफूगीरी समय के उस रूप को बहाल करने की नहीं है, जो रूप वह इधर खो चुका है। यह उसे थोड़ा-सा व्यवस्थित करने भर के लिए है ताकि वह बिल्कुल ही फटेहाल न लगे। यह समय की चादर को मैली होने से बचाने का जतन करना नहीं है- यह उस मैली हुई और होती जाती चादर को थोड़ा-बहुत रफू कर पहनने का उपक्रम भर है।

कलाकृतियां कलाकार की यात्रा की लागबुक भी होती हैं। उनमें यादें, इच्छाएं, सपने, अवसाद, भूलें, छवियां और खुशियां आदि कतरनों की तरह गड््डमड््ड होती हैं। अकस्मात कोई याद किसी छवि से; कोई सपना किसी अवसाद से; कोई खुशी किसी इच्छा से मिल जाते हैं और कलाकार उन्हें अपने कैनवास पर विन्यस्त कर देता है: उनमें तालमेल, अपने तरह की लयात्मकता लगभग स्वत:स्फूर्त होते हैं। जितना कला को कलाकार रचता है उतना ही कला कलाकार को भी रचती है। न कला कलाकार के बिना, न कलाकार कला के बिना। कला कहीं न कहीं परिधान भी होती है, जिससे हम अपने निहंग होने, निहत्थे होने को ढंकते हैं। सीरज सक्सेना की कला, अपने इस नए, उत्तेजक और कल्पनाशील चरण में ऐसा ही परिधान है, जो पल भर के लिए सही, हमें अपने समय के चिथड़ेपन का कला के थिगड़ेपन से सामना कर पाने का न्योता देती है। 


नादीन गार्डिमर

दक्षिण अफ्रीकी लेखिका नादीन गार्डिमर का हाल में निधन हुआ। एक बड़ी कथाकार होने के साथ-साथ उन्होंने विपुल आलोचनात्मक लेखन भी किया था। मैं उनके ऐसे गद्य का एक चार वर्ष पहले प्रकाशित संचयन ‘टेलिंग टाइम्स’ (ब्लूम्सबरी) देख रहा था, जिसका एक अध्याय उन प्रश्नों को लेकर है, जो पत्रकार कभी नहीं पूछते। पहला ही प्रश्न जीवन में सबसे बड़े अभाव को लेकर है, जिसके उत्तर में गार्डिमर कहती हैं कि कोई भी अफ्रीकी भाषा न सीख पाना उनके जीवन की सबसे बड़ी कमी रही है। ‘सबसे सफेद झूठ आपने क्या बोला’ प्रश्न के उत्तर में उनका कहना है कि ‘वे ठीक से बता नहीं सकतीं। रंगभेद में गुप्त पुलिस निगरानी में रहते हुए उन सबको, जो उस सत्ता का सक्रियता के साथ विरोध करते थे, सिद्धहस्त झूठा बना दिया था। आप झूठ बोलते थे जब पुलिस यह दरयाफ्त करती थी किसी के बारे में जिसे वह पकड़ना चाहती थी; आप उससे अपनी मुलाकातों के बारे में, उसकी गतिविधियों को लेकर झूठ बोलते थे: बोलना पड़ता था, क्योंकि आप अपने को और दूसरों को बचाना चाहते थे!

यह पूछे जाने पर कि क्या लेखक को खाना पकाना भी आना चाहिए, वे बड़ी बेबाकी से कहती हैं कि हाथी दांत की मीनार में कोई रसोई नहीं होती। वहां जो काम होता है उसके लिए आम कामों, हरेक के अस्तित्व की उद्विग्नताओं की दरकार होती है, हालांकि हम लेखक इसके बारे में बहुत शिकायत करते रहते हैं। इस लेखिका ने लेखिकाओं के लिए आरक्षित पुरस्कार से अपना एक उपन्यास वापस ले लिया था। उस बारे में पूछे जाने पर उनका कहना है कि मैं नहीं सोचती कि किसी लेखक के साहित्य को परखने के लिए इस बात को ध्यान में लेना चाहिए कि वह स्त्री है या पुरुष। मुझे लगता है कि अपनी कल्पना में हम उभयलिंगी होते हैं। अगर लेखक काले-गोरे होने या स्त्री-पुरुष होने या समलैंगिक होने के आधार पर अपनी उपलब्धियों को मापते हैं तो मुझे लगता है कि वे अपने हित और लक्ष्य को क्षति पहुंचा रहे हैं। आखिरकार हमें नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ पुरुषों या उभयलिंगियों के लिए कोई अलग से पुरस्कार नहीं है!

नादीन किसी देश या संस्कृति के साहित्य को संकीर्ण और अपने आप पर्याप्त मानने का विरोध करती रहीं। उनका मत था कि हर साहित्य में मनुष्यता अपना कुछ पाती है, जो कि सारी विशिष्टताओं के बावजूद संभव होता है। उस पर सबका अधिकार है और किसी का भी विशेषाधिकार नहीं। जिन लेखकों ने साहित्य को एक विश्वव्यापी लोकतंत्र मानने और उसे स्पष्ट करने की अथक चेष्टा की उनमें हमारे समय में नादीन अग्रणी थीं। ऐसा करते हुए वे हमेशा न्याय, सत्य और करुणा के पक्ष में मुखर और सक्रिय रहीं।


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