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पुस्तकायन : विद्रोही स्वर PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:12

ओम निश्चल

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : विष्णु नागर के नए संग्रह जीवन भी कविता हो सकता है को लोक, समाज और राजनीति के आलोक में देखा-परखा जाना चाहिए।

हमारे समय के अनेक कवियों ने कविता को सत्ता और शक्तिकेंद्रों के सम्मुख एक जुझारू अभिव्यक्ति के रूप में बदलने का काम किया है। खासतौर पर पत्रकारिता या सामाजिक कर्म से जुड़े कवियों के यहां कविता उसी तरह आती है, जिस तरह जीवन के जद्दोजहद के बुनियादी मुद्दे। मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, ऋतुराज, ज्ञानेंद्रपति, आलोक धन्वा, असद जैदी और विष्णु नागर की कविता ने यह काम बखूबी किया है। विष्णु नागर की कविता बाहर से धुले-पुंछे लगते समाज और उच्चादर्शों का राग अलापती हुई राजनीति को केंद्र में रखती है। पर ऐसा भी नहीं है कि वह केवल राजनीतिक और सामाजिक विडंबनाओं की बात करती है, बल्कि वह आत्मा के उपचार के लिए शहद जैसी सूक्तियां भी सृजित करती है, अपने आप से बतियाती भी है। 

संग्रह के शीर्षक को ही देखें तो यह एक बेहतरीन सूक्ति की तरह है। कवि कहता है, ‘जीवन भी कविता हो सकता है।’ यानी जीवन को कविता जैसा होना चाहिए। जीवन लय, छंद और ताल में उपनिबद्ध हो तो कहना ही क्या। पर क्या ऐसा है! शायद नहीं, क्योंकि जीवन-जगत का छंद कहीं टूट गया है। जैसा कि किसी कवि ने कहा है, एक समूचा वाक्य टूट कर कहीं बिखर गया है। आज ऐसी ही स्थिति है। विष्णु नागर के नए संग्रह में जीवन से दूर छिटक गए छंद और लय की तहरीरें दर्ज हैं। कविताओं में कोई शिल्पगत चाकचिक्य नहीं, पर इनके भीतर की ध्वनियां दूर तक सुनाई देती हैं। निस्संदेह, कविता अपनी अर्थवत्ता में ही ध्वनित होती है। कुछ बड़ी और प्राय: छोटी कविताओं के इस संग्रह में अनेक धारदार कविताएं हैं और ऐसी भी कि लगती छोटी हैं, पर बड़े अर्थ देने वाली हैं। वे पढ़ते ही चेतना के आर-पार गुजर जाती हैं। 

विष्णु नागर की कविता में एक तत्त्व शुरू से सक्रिय रहा है; वह है उनकी व्यंग्य विदग्ध चेतना। पत्रकारिता ने उनकी कवि-संवेदना को एक अलग तरीके से दीक्षित और संस्कारित किया है। कबीर कहते रहे हैं, निर्भय निरगुन गाऊंगा। यह निर्भयता ही कवि की असली पहचान है, जो किसी सत्ता से अनुकूलित-पोषित और निर्दिष्ट न हो। वे चाहते तो एक तटस्थ रुख अपना कर सत्ता के चहेते कवि बन सकते थे, पर जैसा एक समय नेपाली ने लिखा कि ‘मैं भी लहरों में बह लेता तो मैं भी सत्ता गह लेता/ ईमान बेचता फिरता तो मैं भी महलों में रह लेता।’ 

पर विष्णु नागर ने अपने पत्रकारीय जीवन, व्यंग्य और कविताओं में हमेशा विद्रोही लीक अपनाई। ‘शुक्रवार’ के संपादक के तौर पर इसी निर्भयता और वैचारिक प्रतिबद्धता का उन्होंने अंत तक परिचय दिया और अलग हुए तो अपने लेखकीय मान की रक्षा के लिए ही। जब देश भर में अच्छे दिनों की नाद-अनुनाद चल रहा था, एक राजनेता नायक की तरह प्रस्तुत किया जा रहा था, नागर ने देशभक्ति के इस प्रायोजित उन्माद को एक चुनौती के रूप में लिया। अब जब अच्छे दिनों का मुलम्मा उतर रहा है, नागर के इस संग्रह की अनेक कविताएं याद आ रही हैं, जो उन्हें धर्मनिरपेक्ष सद्भावी, पर निर्भीक कवि के रूप में प्रस्तुत करती हैं। 

सदा हिंदुत्ववाद, संकीर्णतावाद, बाजारवाद को अपनी कविताओं में निशाने पर रखने वाले विष्णु नागर की कविताओं का चरित्र पहली नजर में राजनीतिक बेशक हो, पर वे अपने व्यापक काव्यबोध में इंसानी जज्बात की कद्र करने वाले कवि हैं। पहले उनकी कुछ राजनीतिक तौर पर दो टूक कविताओं पर बात कर ली जाए। ‘उनका कद’, ‘जब भी मैंने वोट दिया’, ‘हिंदुत्व के बावजूद’, ‘मोदी’, ‘बर्बर’, ‘लोकतंत्र’, ‘हमारे अनुभव’ जैसी कविताओं में कवि अपने राजनीतिक बोध से परिचालित है। उनके पिछले


संग्रह में भी कई कविताएं राजनीतिक व्यंग्य का सटीक उदाहरण हैं। 

पिछले कुछ दशकों से देश में हिंदुत्ववाद का एजेंडा राजनीति में प्रायोजित तरीके से लाया गया है। एक सतही किस्म के राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक बोध ने सत्ता को साम, दाम, दंड, भेद के कुटिल प्रतिमानों में बदल दिया है, जिसकी परिणति हम अयोध्या और गुजरात प्रकरण में देख चुके हैं। एक जननायक के रूप में उभरे मोदी पर लिखी नागर की कविता किसी भी सत्तावान, पर अकेले पड़ चुके व्यक्ति का खाका है, जिसमें वे कहते हैं: ‘मोदी के घर में उसके कई सेवक हैं/ उसका वहां कोई भाई, कोई बहन नहीं/ उसके आंगन में खेलता कोई बच्चा नहीं/ उसके अनुयायी लाखों में हैं/ उसका कहने को भी कोई मित्र नहीं/ यों तो पूरा गुजरात है उसका/ मगर उसके घर पर उसका इंतजार करने वाला कोई नहीं/ उसे प्रधानमंत्री बनाने वाले तो बहुत हैं/ उसे इंसान बना सके, ऐसा कोई नहीं।’ 

यहां ‘बेचो-बेचो’ वाला मौजूदा बाजारवादी समय भी है और ‘किसी दिन उनकी स्त्री बन कर रहना’ जैसी लाजवाब कर देने वाली कविता भी। एक अचूक पौरुषेय सुख के आह्लाद से भरी, पर किसी दिन स्त्री की तरह सोचने-देखने लग जाने की ख्वाहिशों को शब्द देती यह कविता दरअसल, परस्परावलंबन का संतुलन साधती कविता है। यह दुनिया अचानक बदली-बदली-सी लगने लगे, अगर पुरुष प्रजाति में ऐसी ख्वाहिशें पैदा हो जाएं। ‘बुढ़ापे में पति’ कविता भारतीय पतियों की मानसिकता का पर्याय है तो ‘तोप’ हीनग्रंथियों में जीने वाले इंसान का कद बताती है। यहां मतदान करने की नागरिक विवशताओं का इजहार है, तो सांप्रदायिकता की खेती करने वाले नायकों की निर्मनुष्यता का आख्यान भी। छोटी-छोटी बातों में जीवन कैसे गर्क हुआ जा रहा है और यह समाज सच्चाई से मुंह मोड़े हुए है, इस पर कवि के अफसोस भी दर्ज हैं। 

नागर का निजी कवि-मन भी यहां तमाम कविताओं में दिखता है, जब वे मालवा में बसे अपने कस्बे शाजापुर की यात्रा पर होते हैं। सरवटे बस स्टैंड पर होते हैं या देवास के लिए बस पर सवार होते हैं। मां को याद करते हैं और उन मांओं को भी, जिन्हें बड़े होकर बच्चे भूल जाते हैं; पर ऐसे में भी वे उस शख्स की पीड़ा भूल नहीं जाते, जो जमीन पर खून की उल्टियां करने के बावजूद पूछने पर संकोच से यही कहता हो, ‘अब तो मेरा हाल पहले से बहुत अच्छा है।’ आखिरकार उन्होंने अपने भीतर के संगीत या कविता को कभी इतना आच्छादित नहीं होने दिया कि वे बाहर का आदिम शोर न सुन सकें। 

इससे उलट वे उन धीमी और कोमल आवाजों की उपेक्षा से घबरा उठते हैं, जिन्हें हम सुन नहीं पाते या जिन आवाजों से खतरे की घंटियां लगातार बजती हैं, उन्हें हम लगातार अनसुना किए रहते हैं। नाटकीय होते जा रहे जीवन की एक छोटी कविता में उनका कवित्व खिल उठता है: ‘मैं बिना आंसुओं के रोता हूं/ बच्चों से कुछ तो सीखता हूं।’ 

जीवन भी कविता हो सकता है: विष्णु नागर; अंतिका प्रकाशन, शालीमार गार्डन, गाजियाबाद; 150 रुपए। 


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