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पुस्तकायन : भाषा का उर्वर प्रदेश PDF Print E-mail
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Sunday, 20 July 2014 09:10

वागीश शुक्ल

जनसत्ता 20 जुलाई, 2014 : लक्ष्मीधर मालवीय हिंदी के उन शलाका पुरुषों में हैं, जिनका जोड़ अब शायद नहीं है। वे अस्सी बरस के हैं, विश्वविद्यालयी सेवा से कब के अवकाश प्राप्त हो चुके हैं, पर उनमें अब भी हिंदी में मानक शोध-कार्य का ऐसा स्पृहणीय उत्साह वर्तमान है, जिसकी उपस्थिति युवतम शोधार्थियों में भी कहीं नहीं दिखाई देती। शब्दों का रास उनके कुछ निबंधों का संग्रह है। ये निबंध कुछ हद तक आत्मपरक भी कहे जा सकते हैं, क्योंकि संयोगवश इनसे मालवीयजी की निजी तपस्या और साधना का कुछ परिचय भी हमें प्राप्त हो जाता है, किंतु मुख्यत: इन सभी निबंधों की चिंता और पीड़ा का केंद्रबिंदु हिंदी है, हमारी भाषा जिसके प्रति हमारे घोर उपेक्षा-भाव को यह संग्रह पग-पग पर गहरी वेदना और आक्रोश के साथ उजागर करता है। 

मालवीयजी अपने को ‘कापालिक’ कहते और अपने काम की तुलना शवसाधना से करते हैं। निश्चय ही देव और बिहारी जैसे भुलाए-बिसारे और विश्वविद्यालयों के वर्तमान पाठ्यक्रमों और शोधकर्म से बहिष्कृत लेखकों को स्मरण करना मसान जगाना ही है। इन महाकवियों की रचनाओं का शुद्ध पाठनिर्धारण और संपादन-प्रकाशन जिस बारीकी और परिश्रम का फल है वह मालवीयजी के  ही किए हो सकता था, इसे निस्संकोच स्वीकार करना पड़ेगा। हिंदी उच्च शिक्षा के जिम्मेदारों में से बहुसंख्य ने कोई पोथी तो दूर, पोथी का कोई चित्र तक नहीं देखा है, लगभग शत-प्रतिशत कैथी लिपि तो दूर, पुरानी हस्तलिखित, यहां तक कि पुराने टाइप में छपी, नागरी लिपि पढ़ने में अपने को अशक्त बताते हैं। उर्दू-प्रेम का बहुत दिखावा है, पर उस लिपि को पढ़ने वालों का हिंदी में अकाल है और रचनाकार हिंदी गजल के नाम पर उर्दू का विरूपण करते जा रहे हैं। सूर, तुलसी, कबीर को पढ़ाने वाले नहीं दिखाई देते। थोड़ी ही अतिशयोक्ति होगी अगर मैं यह कहूं कि अधिकतर छात्रों और अध्यापकों के लिए हिंदी का आदिकाल मुक्तिबोध से प्रारंभ होता है। ऐसे माहौल में यह देख कर विस्मय होता है कि कोई अपने जीवन को इस काम में लगा रहा है कि श्रीपति मिश्र, देव और बिहारी की रचनाएं वर्तमान और भविष्य के लिए अपने प्रामाणिक रूप में सुरक्षित रह सकें, उनके शब्द जैसे वे कहे गए हमारे पास पहुंचें। 

बड़ी उम्र में पहुंचने के बाद भी मालवीयजी नई भाषाएं सीखते रहे हैं और हिंदी के शब्द को उन्होंने हर पिटारे में खोजा है। जापानी में छिपे हिंदी शब्द, जापान के मंदिर में उत्कीर्ण नागरी अक्षर, इन्हें मालवीयजी की ही जैसे प्रतीक्षा थी कि वे हम पर अपने राज खोलें। विशेषकर उर्दू और फारसी सीख कर उन्होंने हमें माध्यकालीन कवियोंके शब्द-प्रयोग के खजानों तक पहुंचा दिया है। इसमें संस्कृत-हिंदी की शास्त्र-परंपरा के गहरे ज्ञान ने उनकी भरपूर मदद की है। बिहारी के पहले दोहे में ‘भव-बाधा’ न होकर ‘भौबाधा’ है, इसका निश्चयन केवल फारसी लिपि की पांडुलिपि ही नहीं करती, यह तर्क भी करता है कि प्रारंभ में ही तगण (गुरु, गुरु, लघु) का अमांगलिक प्रयोग कवि न करेगा। यह दिग्दर्शन मात्र है, महकते चावल की पकी हांड़ी में से सिर्फ एक दाना। ऐसी नजर के अभाव में ही ‘मेरी भवबाधा’ पढ़ते हुए कुछ विद्वान यह कहते पाए गए हैं कि बिहारी की सतसई का क्रमनिर्धारण अमांगलिकता-दोष से ग्रस्त है। 

शब्द की शुद्धता के प्रति मालवीयजी के आग्रह ने उन्हें वर्तमान टाइपसेटिंग की अधुनातन तकनीकी की ओर भी खींचा है और उन्होंने अपना प्राय: सारा लेखन लेटेक पर किया है, जो मुक्त साफ्टवेयर समाज की मानवता को अनूठी देन है। मैं चाहता हूं कि हिंदी बिरादरी इसका निरपवाद प्रयोग करे, ताकि मुद्रण में भी आगे बढ़ पाने के रास्ते खुल सकें। लेटेक के नए अवतारों (जैसे जीटेक) के आने के बाद यूनीकोड का समावेशन संभव है और फांट की अनुपलब्धता के बहाने भी नहीं बचे। मैं युवतर पीढ़ी से यह आग्रह करता हूं कि उन्हें मालवीयजी से जो कई चीजें सीखनी चाहिए उनमें तकनीकी का सुचारु विनियोजन भी है, जो उन्हें इ-मेल और फे सबुक से आगे भी हिंदी को पहुंचाने में मदद करेगा। 

मालवीयजी शब्दों का (और जाहिर है कि फिर वाक्यों का भी) अपमान होता देख कर खीझते हैं। वे बुरी तरह खीझते हैं। किसी तरह की लागलपेट के बगैर खीझते हैं। वस्तुत: हिंदी भाषा को उन्होंने भारत और उसमें भी मुख्यत: मध्यदेश, की प्राणनाड़ी के रूप में देखा है और इसकी दशा-कुदशा का प्रतिबिंबन भी वे इस भाषा में ही करते हैं। उदय प्रकाश और लीलाधर जगूड़ी की बात करते हुए भी मालवीयजी उनके बहाने भाषा-चिंतन में ही लगे दीखते हैं। 

इस चिंतन के ओर और छोर पर तो पतंजलि का ‘क: शब्द:= क्या है शब्द?’ टंगा हुआ है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि मालवीयजी की बात समझने और उनके दर्द में साझा करने के


लिए व्याकरण की तलहटी में ही उतरना होगा। जिसे भी हिंदी से लगाव है, उसे यह चिंता होनी ही चाहिए कि हिंदी के शब्दकोशों में ऐसी भूलें क्यों हैं जैसी अन्य भाषाओं के शब्दकोशों में नहीं दीखतीं। अध्ययन-अध्यापन से सीधे जो लोग नहीं जुड़े हैं उन्हें भी यह सोचना चाहिए कि क्यों हिंदी साहित्य के अध्यापकों को अपनी ही लिखी पुस्तकें पाठ्यक्रम में रखनी पड़ती हैं। यों, मालवीयजी के इस कटु प्रश्न पर सोचते समय हमें यह भी नहीं भुलाना चाहिए कि अभिज्ञानशाकुंतल का सश्रम संपादन प्राय: उसे छात्रोपयोगी बनाने के लिए किया गया है; यही बात जायसी ग्रंथावली के साथ सच है, और यही विश्वसाहित्य के अन्य अनेक रत्नों के साथ भी। वस्तुत: विश्वविद्यालयी पांडित्य की अवधारणा में खोट नहीं है, खोट कामचोरी और काहिली की उस फितरत में है, जिसने पठन-पाठन समेत सभी कर्मक्षेत्रों को बंजर कर दिया है। उर्वरता की वापसी तो मालवीयजी जैसों के पसीने से होने वाली सिंचाई से ही हो सकेगी। इस अर्थ में विचारणीय है कि जहां के पाठ्यक्रम से जायसी अभी बाहर नहीं कर दिए गए हैं, वहां भी अग्रवालजी के संपादन के प्रति प्राय: उदासीनता क्यों देखने को मिलती है, या यह है कि जब देव और बिहारी को कोई पढ़ाना ही नहीं चाहता तो इन संपादनों का कौन कद्रदान होगा। किंतु उत्तर भी बहुत पहले भवभूति ने दे रखा है- काल निरवधि है, पृथ्वी विपुल है, कोई मेरा समानधर्मा होगा ही। 

समानधर्मा होने का यहां यह अर्थ नहीं है कि वह मालवीयजी की तरह अस्सी बरस की उम्र में देवकाव्यकोश का संपादन करेगा। जो भी शब्द की आवाज सुन सकता है, वह समानधर्मा है। संयोग कि संस्कृत में ‘रास’ का अर्थ ‘नाच’ के साथ ‘चीख’ भी है। इन निबंधों को पढ़ते समय ऐसा लगता है कि मालवीयजी ने नाचते हुए शब्दों की चीखें भी सुनी हैं। उन्होंने देव का एक छंद उद्धृत करते हुए लिखा है कि इसमें कहरवा की धुन सुनाई देगी, आचार्य शुक्ल भी देव का एक (अन्य) छंद पढ़ते हुए कहा करते थे कि लगता है जैसे तबला बज रहा हो। जब शब्दों के नृत्य-संगीत की इतनी समझ बनती है, तभी उनका चिल्लाना भी सुनाई देता है। यह क्षमता विकसित करना ही समानधर्मा होना है। 

‘छिछोरेपन की भाषा’ शीर्षक निबंध में मालवीयजी ने भाषा के नकाबपोश फूहड़ इस्तेमाल को लेकर बहुत तीखी टिप्पणियां की हैं और वर्तमान पॉप-संगीत में बरती जा रही भाषा को लताड़ते हुए उसकी जड़ों को हजारों साल पहले से शुरू साभ्यतिक गिरावट में खोजा है। वस्तुत: मालवीयजी की चिंताएं इस गिरावट को ही लेकर हैं, उनके आंकड़े जरूर भाषिक व्यवहार से लिए गए हैं। उन्होंने अनुनासिकता को भूभागविशेष के बाशिंदों की शारीरिक कमियों तक तलाशने की कोशिश की है और भूभाग की, जिसे अंगरेजी अखबारों की तर्ज पर वे भी ‘गाय पट््टी’ कहते हैं, आर्थिक विपन्नता पर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट को मूल अंगरेजी में अपनी किताब के  भीतर जगह दे रखी है। 

इस निबंध संग्रह को इसलिए भी पढ़ना चाहिए कि हमारी भाषा का दुर्विनियोजन हमें किन संकटों से दो-चार होने के लिए विवश कर रहा है इस पर सोचना शुरू हो, इसलिए भी कि हमारी विरासत क्या, कहां और कितनी है और हम उसे कैसे अपने भीतर पहचान, संभाल और सक्रिय कर सकते हैं, इस पर सोचना शुरू हो। जीवन के नौवें दशक में प्रविष्ट हो चुके दूरस्थ जापान के एक पहाड़ी गांव में बैठे एक ज्ञानवृद्ध, वयोवृद्ध व्यक्ति की निस्वार्थ भाव से की जा रही साहित्यसेवा भी हममें कुछ कहीं जगा सकती है, और दूरंदेश चेतावनियां भी हमें कुछ सिखा-सहेज सकती हैं। यों तो वेदव्यास बहुत पहले कह गए थे कि ‘बांह उठा कर पुकार रहा हूं कोई मेरी बात सुन नहीं रहा है’, किंतु यह तो विवाद से परे है कि उनकी बात सुनने से हित ही होगा। हित-वचन बोलने के लिए हम मालवीयजी के कृतज्ञ हैं। 

शब्दों का रास: लक्ष्मीधर मालवीय; आदित्य प्रकाशन, 2/18 अंसारी रोड, नई दिल्ली; 495 रुपए। 


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