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मौत की उड़ान PDF Print E-mail
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Saturday, 19 July 2014 11:48

जनसत्ता 19 जुलाई, 2014 : तकनीकी खराबी, पायलट की गलती या किसी और वजह से कई बड़े विमान हादसे हो चुके हैं। लेकिन मलेशियाई एअरलाइंस के विमान एमएच-17 के साथ जो हुआ, वह कोई हादसा नहीं था। अभी तक मिले सारे संकेत इसी बात के हैं कि मलेशियाई एअरलाइंस के विमान एमएच-17 को पूर्वी यूक्रेन में रूस से लगी सीमा के पास मार गिराया गया। नतीजतन चालक दल समेत विमान में सवार सभी दो सौ पंचानबे लोग मारे गए। विमान नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम से कुआलालंपुर जा रहा था। मलेशियाई एअरलाइंस के लिए पांच महीनों के भीतर यह दूसरा बड़ा झटका है। आठ मार्च को उसका विमान एमएच-370 हिंद महासागर के ऊपर उड़ान के दौरान रहस्यमय तरीके से लापता हो गया था। उससे संबंधित कोई सुराग आज तक नहीं मिल सका है। मगर इस बार रहस्य का वैसा आवरण नहीं है। विमान मिसाइल के हमले का शिकार हुआ, इस बात से कोई इनकार नहीं कर रहा है। अलबत्ता यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेंको ने इसके पीछे वहां के अलगाववादियों का हाथ बताया है, जबकि अलगाववादियों के नेता आंद्रेई पुरगिन ने यूक्रेन की सेना पर दोष मढ़ा है। 

शक की सुई विद्रोहियों की तरफ जाती है, तो इसकी कई वजहें हैं। विमान को मार गिराए जाने की घटना जिस इलाके में हुई वह कुछ महीनों से विद्रोहियों का गढ़ बना हुआ है। दूसरे, वे पिछले दिनों यूक्रेन के दो लड़ाकू विमानों को निशाना बना चुके हैं। इसलिए उनकी इस दलील में दम नहीं दिखता कि उनके पास तीन हजार मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर किसी विमान को निशाना बनाने की क्षमता नहीं है। तो क्या यूक्रेन के विद्रोही अतंरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के डर से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं? मामले की जांच शुरू हो गई है, और सारे तथ्य सामने आने के लिए हमें थोड़ा इंतजार करना होगा। लेकिन इस घटना के कई आयाम ऐसे हैं जिन्होंने सारी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। विमान के मार गिराए जाने की खबर आने के चंद मिनटों के भीतर भारत सहित कई देशों की विमानन कंपनियों ने फैसला किया कि वे अमेरिका और यूरोप आने-जाने के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल नहीं करेंगी। इससे


अमेरिका और यूरोप के लिए उनके सफर की लागत थोड़ी बढ़ जाएगी, क्योंकि उन्हें अपेक्षया लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। पर ज्यादा बड़ा पहलू पेशेवर नहीं, इस घटना के बाद पैदा हुआ अंतरराष्ट्रीय तनाव है। रूस पर पहले से यह आरोप है कि वह यूक्रेन के अलगाववादियों की मदद करता आ रहा है। कहा जा रहा है कि इन विद्रोहियों ने रूस से हासिल विमान-रोधी प्रणाली का इस्तेमाल किया होगा। अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो रूस के लिए दुनिया को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। 

यूक्रेन की बाबत रूस के रवैए से खफा अमेरिका ने पहले ही उस पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, अब उसने कुछ और प्रतिबंध लगा दिए हैं। यूरोप के देशों पर भी अमेरिका इस तरह के कदम उठाने का दबाव डाल सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की निंदा करने और उसे हर रूप में अस्वीकार्य करार देने में रूस हमेशा आगे रहा है। लेकिन क्या उसकी यह साख बनी रह सकेगी? हथियारों और सैन्य उपकरणों की चोरी-छिपे बिक्री दुनिया के हर हिस्से में होती रही है। कूटनीतिक इरादे से भी कहीं-कहीं ये विद्रोही गुटों को मुहैया कराए जाते हैं। आखिर आइएसआइएस और यूक्रेन के विद्रोहियों के पास इतने हथियार कहां से पहुंचे? इस लिहाज से देखें, तो चीन और सऊदी अरब से लेकर रूस और अमेरिका तक अनेक ताकतवर देशों के दामन दागदार नजर आएंगे। इसलिए यह हैरत की बात नहीं कि आतंकवाद को लेकर हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जताई जाने वाली चिंता रस्म अदायगी ही साबित होती रही है।


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