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गांव की सेहत PDF Print E-mail
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Saturday, 19 July 2014 11:47

जनसत्ता 19 जुलाई, 2014 : सार्वजनीन प्राथमिक शिक्षा की तरह स्वास्थ्य सेवा की पहुंच में भी देश की समूची आबादी को लाने की बात कुछ वर्षों से होती रही है। लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, स्वास्थ्य के मोर्चे पर देश की सूरत और बिगड़ी हुई दिखती है। वर्गीय और क्षेत्रीय विषमता पहले से कहीं ज्यादा नजर आती है। गुरुवार को जारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल-2013 के मुताबिक देश के एक तिहाई डॉक्टरों की सेवाएं ही ग्रामीण भारत के लिए उपलब्ध हैं, जबकि वहां देश की दो तिहाई आबादी रहती है। अगर विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता के लिहाज से देखें तो हालत और भी शोचनीय नजर आएगी। लिहाजा, गंभीर रोगों के लिए वहां के लोगों को शहरों का रुख करना पड़ता है। कई मामलों में वहां भी जांच और इलाज की पर्याप्त सुविधा नहीं होती, फिर उन्हें राज्य की राजधानी के किसी बड़े अस्पताल या एम्स की ओर भागना पड़ता है। वहां कतार इतनी लंबी होती है कि बिना सिफारिश या पहुंच के काम नहीं बनता। इस बीच इलाज होने के बजाय बहुत-से रोगियों की हालत और बिगड़ जाती है। उनके परिजनों को भी काफी परेशानी उठानी पड़ती है। ग्रामीण इलाकों में सेहत की तस्वीर सुधारने के लिए कई बार यह प्रस्ताव आया कि चिकित्सा विज्ञान की डिग्री लेने के लिए एक साल गांवों में अनिवार्य सेवा देनी होगी। लेकिन हर बार इस विषय के विद्यार्थियों सहित समूचे चिकित्सक समुदाय की ओर से इसका बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया और आखिरकार इस तरह की कोई योजना जमीन पर नहीं उतर सकी है। हालांकि ऐसी व्यवस्था भी ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए कोई स्थायी हल नहीं है। लेकिन इसका विरोध यह बताता है कि इस मसले पर चिकित्सक समुदाय का क्या रुख है।

सही है कि ग्रामीण इलाकों में जांच के लिए जरूरी उपकरणों से लेकर प्रशिक्षित चिकित्सा सहायकों के अभाव सहित समूचा बुनियादी ढांचा वैसा नहीं है कि कोई डॉक्टर निर्बाध तरीके से वहां अपनी सेवा दे सके।


लेकिन यह भी सच है कि सरकार के भारी खर्च पर चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद निजी क्लीनिक खोलने या शहरों-महानगरों के महंगे कॉरपोरेट अस्पतालों से जुड़ जाने से लेकर देश-विदेश का रुख करने वाले युवाओं की निगाह में ग्रामीण इलाकों में जाना कोई पेशेवर आकर्षण नहीं रखता। इस स्थिति के लिए हमारी स्वास्थ्य नीति ही जिम्मेवार है। स्वास्थ्य के मामले में भारत में सरकारी आबंटन बहुत कम रहा है। दूसरी ओर, निजी क्षेत्र को लगातार बढ़ावा दिया गया है। ऐसे में इलाज कराना दिनोंदिन और महंगा होता गया है। ग्रामीण या कस्बाई इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में जिन डॉक्टरों की नियुक्ति होती भी है, उनमें से ज्यादातर वहां न जाने का कोई न कोई बहाना निकाल लेते हैं। सवाल है गांवों के गरीब लोग बीमारी की हालत में क्या करें! इलाज के अभाव में बीमारियों और हादसों के शिकार बहुत-से लोग जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं। बहुत-से परिवारों को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ता है, या जमीन-मकान बेचना पड़ता है। आंकड़ों के लिहाज से शहरी भारत के हिस्से में देश के दो तिहाई डॉक्टर हैं, पर वहां भी तमाम गरीबों के लिए इलाज कराना मुश्किल बना रहता है। लिहाजा, स्वास्थ्य के मद में सरकारी आबंटन बढ़ाने और सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था को दुरुस्त करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। 


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