मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
मनीऑर्डर का इंतजार PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Saturday, 19 July 2014 11:43

अविनाश कुमार चंचल

जनसत्ता 19 जुलाई, 2014 : लगता है, इस हफ्ते भी घर पर पैसे नहीं भेजा पाऊंगा। दो दिन बचे हैं और काम इत्ता। व्यस्त! पिछले दो महीने से घर पैसे नहीं भेज पा रहा। समझता हूं कि घर इंतजार में होगा, मां भी। हर महीने पैसे अकाउंट में भेजने की कोशिश करता हूं, लेकिन इस बार काम थोड़ा ज्यादा है, इसलिए! याद है, जब तक कॉलेज में रहा, घर से हर महीने पांच तारीख तक पैसे अकाउंट में आते रहे। अगर कभी देर हो जाए तो कैसा महसूस होता था! मकान किराया, अखबार का पैसा, किराना वाले का उधार, और भी बहुत कुछ। जो हर महीने के एक तय तारीख को चुकाना जरुरी होता था।

लेकिन जब खुद की बारी आई है तो निश्चिंत पड़े हैं। काम का बहाना है। जहां रहता हूं, वहां एक ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा है। भीड़ इतनी कि पूछो मत। इंटरनेट बैंकिंग अभी तक मेरे गांव वाली शाखा तक नहीं पहुंच पाई है। मनीऑर्डर की सुविधा होगी शायद! कल सिंगरौली के एक गांव में रहूंगा तो डाक घर जाकर एक बार पता कर लूंगा। मनीऑर्डर सुरक्षित रहेगा, यह कहना मुश्किल है। बचपन में कितनी बार अपने गांव के डाकिये को मार खाते, लोगों को उससे झगड़ा करते देखा है। शहरों में रहने वाले लोग अपनी मेहनत और नौकरी से  कमाया हुआ पैसा भेजते और वह उन पैसों से दारू पी जाता। बाद में बतौर कर्ज चुकाता रहता।

लेकिन मनीऑर्डर की खुशी! आह! जब भी घर में मनीऑर्डर आता, पूरा घर खुशी के झूले पर दिन भर डोलता रहता। जब मौसी के यहां कश्मीर के बॉर्डर पर तैनात मौसा मनीऑर्डर भेजते थे, उनकी मां कितनी खुश होती थी! डाकिये को बख्शिश दी जाती, शाम को बाजार से मिठाई लाकर बांटी जाती। महीनों इंतजार होता। ज्यादा देर होने पर चिट्ठी लिखी जाती- ‘बेटा, तबीयत खराब है... बहू को बच्चा होने वाला है... चापाकल बनवाना है... खेत में पानी पटाने का मौसम आ गया है... अबकी सोच रहे हैं बारिश में खप्परा ठीक करवा लें... होली में न सही, छठ में तो सबके लिए साड़ी लेना ही होगा न...! तो जितनी जल्दी हो सके पैसा


मनीऑर्डर कर दो!’ उधर से बेटे की चिट्ठी आती- ‘इस बार मनीऑर्डर भेजने में देरी हो रही है। सरकार पैसा नहीं दे रही... छुट्टी का पैसा ज्यादा काट लिया है... इस महीने बीमार पड़ गए... डॉक्टर को दिखाना पड़ गया... जल्द ही पैसे भेजेंगे... छठ तक कोशिश करेंगे खुद आने की... तब तक सकुशल रहिए...!’

मां परेशान होती। गांव के साहूकारों से सैकड़ा पर ब्याज सहित कुछ पैसे उधार लिए जाते। घर के काम निपटाए जाते और मनीऑर्डर का इंतजार किया जाता। एक दिन डाकिया आता। अंगूठा लगवा कर मनीऑर्डर पकड़वा जाता। फिर सारे उधार चुकता किए जाते। घर के बाकी बचे काम पूरे किए जाते और दो-तीन दिन रुक कर बेटे को मनीऑर्डर मिलने की सूचना भेजी जाती। मेरा घर उतना खुशनसीब रहा नहीं कि कोई मनीऑर्डर भेजे। मेरे घर में भले मनीऑर्डर नहीं पहुंचा हो, लेकिन वह आसपास रहने वालों के मनीऑर्डर का इंतजार और मिलने की खुशी में सहभागी रहा है। स्वाभाविक ही है कि मेरे घर को भी तो कभी लालसा हुई होगी! काश, मेरे घर भी आता मनीऑर्डर! हालांकि अब शायद ही आता हो मनीऑर्डर। तकनीक और बैंकिग की सुविधा ने उस लंबे इंतजार के बाद मिलने वाली खुशी को गायब कर दिया है। अच्छा है, अब जिंदगी आसान है! फिर भी जाने क्यों मन कर रहा है एक बार मनीऑर्डर घर भेजने का! शायद इसी बहाने मेरा घर भी मनीऑर्डर की खुशी को अपनी यादों में सहेज सके।    


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta


आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?