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पुलिस का चेहरा PDF Print E-mail
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Friday, 18 July 2014 09:18

altजनसत्ता 18 जुलाई, 2014 : पुलिस सुधारों की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है। इसे लेकर आयोग बना, कई समितियां गठित की गर्इं, उनके सुझाव आए, मगर उन पर अमल नहीं किया जा सका। यूपीए सरकार के समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कुछ मौकों पर दुहराया कि पुलिस का मानवीय चेहरा बनाने की जरूरत है। पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों से पूछा कि उन्हें पुलिस सुधारों को लागू करने में परेशानी क्या है, पर वहां से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका। इस बार अल्पसंख्यक वर्गों के प्रति पुलिस को संवेदनशील बनाने की रणनीति को लेकर इस महकमे के तीन वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से सौंपी गई रपट में पुलिस सुधार की जरूरत रेखांकित की गई है। यह रपट महाराष्ट्र के संजीव दयाल, उत्तर प्रदेश के देवराज नागर और तमिलनाडु के के. रामानुजम ने तैयार की है। इसमें कहा गया है कि पुलिस पर मुसलिम समुदाय को भरोसा नहीं है। खासकर दंगों के समय उसकी भूमिका पक्षपाती देखी गई है। तमाम अध्ययनों के आधार पर रपट में इसकी वजहें भी तफ्सील से बताई गई हैं। इसकी एक बड़ी वजह पुलिस महकमे में अल्पसंख्यक समुदाय की नुमाइंदगी कम होना है। फिर पुलिस थानों में मंदिर बने होने, पुलिस दफ्तरों में हिंदू देवी-देवताओं के चित्र टंगे होने, पुलिसकर्मियों के तिलक धारण करने से भी मुसलिम समुदाय उन्हें अपने करीब नहीं देख पाता। विभाजन के बाद जिस तरह भारतीय समाज में हिंदू और मुसलिम समुदाय एक-दूसरे के साथ संदेह के वातावरण में रहते आए हैं, उसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति ने और गहरा किया है। फिर मुसलिम समुदाय की छवि कुछ ऐसी बना दी गई है कि हिंदू समुदाय के बहुत सारे लोग उनके प्रति अपेक्षित सद्भाव नहीं रखते। ऐसे में दंगों के समय पुलिसकर्मियों का रवैया भी निरपेक्ष नहीं रह पाता। 

यह रपट पिछली सरकार के समय ही सौंप दी गई थी। अब बारी है, उस पर अमल की। दरअसल, पुलिस सुधारों के मामले में अब तक आए सुझावों को अमली जामा पहनाने की राह में राज्य सरकारें भी रोड़ा अटकाती रही हैं। चूंकि कानून-व्यवस्था


का मामला राज्य सरकारों का विषय है, वे कोई न कोई नुक्ता निकाल कर इन सुझावों को दरकिनार करने की कोशिश करती रही हैं। हालांकि पुलिस को स्वायत्तता देने की बात तो सभी राजनीतिक दल करते रहे हैं, पर हकीकत यह है कि राज्य सरकारें पुलिस का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करती रहती हैं। इसलिए दंगों के समय पुलिस की भूमिका अक्सर सवालों के घेरे में रही है। दंगों पर काबू पाने के लिए पुलिस को विशेष प्रशिक्षण देने की जरूरत पर भी लंबे समय से जोर दिया जाता रहा है, मगर यह राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में कारगर नहीं हो पाता। इसके लिए पहली जरूरत है पुलिस महकमे को अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति संवेदनशील बनाना और इस समुदाय के लोगों की पुलिस में नुमाइंदगी बढ़ाना। लेकिन मुसलिम वोटों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश करने वाले दलों ने भी सत्ता में रहते कभी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। पुलिस में चूंकि ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोगों की नुमाइंदगी अधिक है, उनका जातीय अहंकार और सामंतवादी सोच भी अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति सदाशयता का व्यवहार नहीं करने देता। चूंकि ताजा रपट पुलिस महकमे के वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से आई है, उम्मीद बनती है कि इसके भीतर से ही कुछ सुधार के प्रयास होंगे। पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत बनी रहेगी। देखना है, ताजा रपट के मद्देनजर राजग सरकार क्या कदम उठाती है।


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