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भाषा से आगे PDF Print E-mail
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Friday, 18 July 2014 09:15

कुमारेंद्र सिंह सेंगर

जनसत्ता 18 जुलाई, 2014 : संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के नए संस्करण से साफ समझ आ रहा था कि हिंदी भाषी या अन्य भारतीय भाषाओं के प्रतिभागियों को लिए अवसर पूरी तरह भले ही समाप्त न हों, पर लगभग खत्म जरूर हो जाएंगे। ऐसी आशंका को सच भी होते देखा गया जब इस बार का परीक्षा परिणाम सामने आया। अंगरेजी की अनिवार्यता ने हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के प्रतिभागियों को बहुत पीछे धकेल दिया। आयोग की परीक्षाओं में अंगरेजी की अनिवार्यता और अन्य भारतीय भाषाओं को समान रूप से लागू किए जाने को लेकर विगत कई वर्षों (सन 1988) से आंदोलन चल रहा है। इस आंदोलन ने कुछ समय पहले हुई परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद और जोर पकड़ा। इसमें प्रतिभागियों के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दूसरे जागरूक नागरिक भी शामिल हो गए, जो हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के भविष्य के प्रति चिंतित हैं।

इस पूरे आंदोलन और विरोध प्रदर्शन को किसी खास दायरे में बांध कर देखने के बजाय हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के अस्तित्व की लड़ाई के रूप में देखने की जरूरत है। माना जा सकता है कि कुछ प्रतिभागी अपने जीवन-यापन, नौकरी, सिविल सेवा में सम्मिलित-सफल होने के लिए अंगरेजी की अनिवार्यता को समाप्त करके हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को लागू किए जाने की मांग कर रहे हों, लेकिन प्रतिभागियों से इतर लोगों का इस मांग में शामिल होना आंदोलन को सार्थकता प्रदान करता है। अगर एक पल के लिए इस आंदोलन को महज नौकरी पाने वालों का संघर्ष, सिविल सेवा में चयनित होने के इच्छुक प्रतिभागियों का विरोध मात्र मान लिया जाए तो भी इस पर अंगुली कैसे उठाई जा सकती है? क्या अपनी भाषा में नौकरी की चाह रखना गलत है? क्या अपनी मातृभाषा को परीक्षा का माध्यम बना कर चयनित होना प्रतिभाशाली न होने की निशानी है? आजादी के छह दशक से ज्यादा गुजर जाने के बाद भी देश की उच्च सेवाओं में नौकरी के लिए भारतीय भाषाओं को भारतीय-अंगरेजों से जूझना पड़ रहा है। क्या यह एक


शर्मनाक स्थिति नहीं है?

आयोग या फिर इस परीक्षा में अंगरेजी की अनिवार्यता के प्रति समर्थन देते लोगों की मानसिकता उस आभिजात्य और चापलूस वर्ग की तरह है जो अंगरेजी शासन में शासकों की गुलामी करने को सहर्ष तैयार हो जाता था। दूसरी ओर, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर संघर्षरत लोग इन भाषाओं को आयोग की परीक्षाओं में लागू करने का संघर्ष नहीं कर रहे हैं, बल्कि भारतीय भाषाओं की अस्मिता, उसके अस्तित्व, उसकी संस्कृति को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। व्यापक फलक में देखा जाए तो आयोग जैसी मानसिकता से ग्रसित ढांचा पूरी तरह से भारतीयता को नकारने का काम कर रहा है। सुनियोजित तरीके से एक षड्यंत्र रच कर उच्चस्तरीय सेवाओं से भारतीय भाषा वाले लोगों को दूर करके अंगरेजी मानसिकता और संस्कृति के पोषक लोगों को स्थापित करवाया जा रहा है। ‘सर्वोच्च ज्ञान अंगरेजी भाषा में ही है’ की मानसिकता युवाओं के दिमाग में भरी जा रही है और भारतीय भाषाओं को महज कहानी-कविता की भाषा बना कर रख देने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन हम सब पता नहीं किस व्यामोह में फंस कर शांति से सब कुछ होता देख रहे हैं। जबकि सिविल सेवा में चयन के आकांक्षियों के लिए नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं के अस्तित्व के लिए एक कदम इस ओर भी उठाने की जरूरत है। 


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