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ब्रिक्स का हासिल PDF Print E-mail
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Thursday, 17 July 2014 12:08

जनसत्ता 17 जुलाई, 2014 : रूस, चीन, ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका के समूह का छठा शिखर सम्मेलन शायद अब तक का सबसे सफल सम्मेलन कहा जाएगा। अक्सर ऐसी वार्ताएं आपसी सहयोग, निवेश और व्यापार बढ़ाने की सहमति जता कर ही पूरी हो जाती हैं। लेकिन ब्राजील के समुद्रतटीय शहर फोर्तालेजा में ब्रिक्स का ताजा शिखर सम्मेलन एक अहम फैसले के साथ संपन्न हुआ। सभी पांच सदस्य देशों की सहमति से एक विकास बैंक की स्थापना करने की घोषणा की गई। यों इस तरह का बैंक शुरू करने की सैद्धांतिक सहमति ब्रिक्स के पिछले यानी डरबन सम्मेलन में ही बन गई थी। लेकिन उसके कोष, सदस्य देशों की हिस्सेदारी और संचालन के तौर-तरीकों को लेकर तब कोई साफ रूपरेखा नहीं बन सकी। अब ब्रिक्स ने ये मसले सुलझा लिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए पड़ोसी देश भूटान को चुना। पर किसी बहुपक्षीय बातचीत के लिए उनकी पहली विदेश यात्रा ब्राजील की रही और इसमें भारत को अहम कामयाबी मिली। इस अवसर पर मोदी को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय मसलों पर भी बातचीत का मौका मिला। मोदी ने उनसे सीमा विवाद स्थायी रूप से हल करने की इच्छा जताई। इस बारे में चीन का रुख अब भी साफ नहीं है। पर जिनपिंग ने इक्कीस सदस्य देशों वाले एपेक यानी एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग के नवंबर में होने वाले शिखर सम्मेलन में शिरकत के लिए मोदी को न्योता देकर सौहार्द का संकेत जरूर दिया है। 

ब्रिक्सके तत्त्वावधान में विकास बैंक स्थापित करने का प्रस्ताव सबसे पहले भारत की तरफ से ही आया था। पर तब से यही धारणा थी कि इसके कोष में चीन का हिस्सा औरों से अधिक होगा। पर मोदी ने जोर दिया कि सबकी समान भागीदारी हो। और आखिरकार यह बात मान ली गई। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुभवों के मद््देनजर इसकी अहमियत समझी जा सकती है। विश्व बैंक के फैसलों को अमेरिका और जापान ज्यादा प्रभावित करते हैं, क्योंकि उसमें उनका हिस्सा अधिक है। विश्व बैंक का अध्यक्ष अमूमन कोई अमेरिकी ही होता आया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का कोई यूरोपीय। फिर, इन दोनों वैश्विक वित्तीय संस्थानों की ऋण देने की नीति विकासशील देशों को रास नहीं आती, क्योंकि वे


बहुत तरह की शर्तें जोड़ देते हैं। समान भागीदारी की बात स्वीकार कर लिए जाने का व्यावहारिक नतीजा यह होगा कि ब्रिक्स का कोई देश अपनी मनमर्जी नहीं चला सकेगा, जैसा कि चीन को लेकर अंदेशा था। विकास बैंक का मुख्यालय चीन के सबसे बड़े व्यापारिक शहर शंघाई में होगा, पर बैंक की अध्यक्षता का पहला मौका भारत को मिलेगा। इसकी एक क्षेत्रीय शाखा दक्षिण अफ्रीका में होगी। सौ अरब डॉलर से शुरू होने वाला यह बैंक ब्रिक्स के सदस्य देशों और अन्य विकासशील मुल्कों को ढांचागत परियोजनाओं और दूसरे विकास-कार्यों के लिए कर्ज देगा। बैंक की एक और अहम भूमिका आकस्मिक निधि या आपातकालीन मदद की होगी। 

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कड़वे अनुभवों को देखते हुए बहुत-से विकासशील देश ब्रिक्स बैंक की तरफ आकर्षित हो सकते हैं। हो सकता है इसका दूरगामी असर यह भी हो कि अमेरिका, यूरोप और जापान विश्व बैंक और मुद्राकोष की रीति-नीति में कुछ बदलाव लाने के बारे में सोचें। अलबत्ता यह कब और किस हद तक होगा, इसके बारे में कुछ कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। ब्रिक्स के सभी सदस्य देश बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले हैं और जी-20 में भी सहभागी रहे हैं। जी-20 में उनकी सहभागिता ने एक समय दुनिया को बड़ी राहत दी थी। जब 2008 की मंदी के दौर में अमेरिका गहरे संकट में था और अन्य विकसित देशों के भी हाथ-पांव फूले हुए थे, ब्रिक्स के सदस्य देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को कमोबेश संभाले रखा। अपने विकास बैंक के साथ ब्रिक्स विश्व की आर्थिक गतिविधियों में और भी उपयोगी भूमिका निभा सकता है। 


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