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अकादमिक विचलन PDF Print E-mail
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Thursday, 17 July 2014 12:07

जनसत्ता 17 जुलाई, 2014 : वाजपेयी सरकार के छह साल के दौरान उस पर शिक्षा के भगवाकरण के आरोप लगते रहे। अब आइसीएचआर यानी भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष पद पर हुई नई नियुक्ति के चलते मोदी सरकार पर भी वैसे ही आरोप लगने शुरू हो गए हैं। परिषद के नए अध्यक्ष के तौर पर वाइ सुदर्शन राव का चयन क्यों किया गया, अकादमिक नजरिए से इसका कोई संतोषजनक जवाब पाना मुश्किल है। जिन दिनों चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के बीच विवाद चरम पर था, वाइ सुदर्शन राव चुपचाप आइसीएचआर के अध्यक्ष पद पर बिठा दिए गए। वारंगल के काकातीय विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रह चुके राव की कोई खास अकादमिक उपलब्धि नहीं रही है, इसलिए स्वाभाविक ही इतिहासकारों के लिए वे लगभग एक अनजान शख्सियत रहे हैं। लेकिन समस्या पद और कद का मेल न होने तक सीमित नहीं है। जाति-प्रथा को लेकर राव की टिप्पणी की वजह से भी यह कहा जा रहा है उन्हें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद जैसी अत्यंत महत्त्वपूर्ण संस्था की कमान सौंपे जाने का क्या औचित्य है। 

रोमिला थापर और डीएन झा समेत कई जाने-माने इतिहासकारों ने इस नियुक्ति पर हैरत जताई है और राव की अकादमिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। अपने ब्लॉग पर लिखी एक टिप्पणी में राव ने कहा है कि जाति-व्यवस्था प्राचीन काल से बहुत अच्छे से चल रही थी और हमें किसी कोने से उसकी शिकायत नहीं मिलती। वे यह भी कहते हैं कि इस प्रथा को शोषणकारी व्यवस्था मान लेने की गलती की जाती है। जाहिर है, जाति-व्यवस्था के चलन को वे सही ठहरा रहे हैं। क्या इसी नजरिए के कारण उन्हें इतिहास अनुसंधान से जुड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था के अध्यक्ष पद के लिए चुना गया? यह आशंका पहले से जताई जा रही थी कि अगर केंद्र में भाजपा को सत्ता में आने का मौका मिला तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पाठ्यक्रमों को अपने सोच के मुताबिक ढालने और शिक्षा से जुड़े नीति निर्धारक स्थानों


पर अपनी पसंद के लोगों को बिठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। यह अंदेशा अब सही साबित होता दिख रहा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जाति-प्रथा को महिमामंडित करने वाले राव इतिहास संबंधी शोध कोे कैसी दिशा देना चाहेंगे। पर क्या वे बताएंगे कि जिस व्यवस्था का वे गुणगान कर रहे हैं उसमें नरेंद्र मोदी की क्या जगह होगी? शायद इस असुविधाजनक सवाल के बारे में राव ने सोचा न हो। वे महाभारत की निश्चित तारीख तय करने के लिए उतावले हैं, भले इसके बारे में उनके पास कोई तथ्यात्मक आधार न हो। 

इतिहास लेखन तथ्यों से वास्ता रखता है, अपने वर्णनात्मक रूप में भी वह इस कसौटी की अवहेलना नहीं कर सकता। लेकिन जहां इतिहास लेखन को अपने पूर्वग्रहों को पोसने-परोसने और प्रचार का हथियार मान लिया जाए, वहां तथ्यों की बलि चढ़ाने और मनचाहे निष्कर्ष निकालने-थोपने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगती है। फिर शिक्षण प्रचार-तंत्र का हिस्सा हो जाता है और इसका सबसे ज्यादा खमियाजा विद्यार्थियों और आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। हो सकता है आइसीएचआर में हुआ बदलाव महज एक शुरुआत हो, आगे और भी अकादमिक संस्थाओं के निर्णायक पदों पर राव जैसे लोग काबिज हो जाएं। लेकिन लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, यह भी होता है कि तमाम संस्थाओं की मर्यादा बनी रहे।  


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