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लक्ष्य के बरक्स PDF Print E-mail
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Wednesday, 16 July 2014 01:56

जनसत्ता 16 जुलाई, 2014 : सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को आजकल आर्थिक विकास का पैमाना माना जाता है। इस कसौटी पर भारत की उपलब्धि पिछले एक दशक में संतोषजनक रही है। बीते दो साल को छोड़ दें, तो पिछले दशक में भारत की औसत विकास दर करीब आठ फीसद रही। लेकिन यह उपलब्धि अधिकांश आबादी के लिए क्या मायने रखती है? आम लोगों के रहन-सहन में सुधार के लिहाज से तस्वीर निराशाजनक ही दिखती है। संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट साल-दर-साल इस हकीकत को रेखांकित करती आई है। संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास रिपोर्ट ने भी इसी तरह की निराशा भरी सूरत पेश की है। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दी सम्मेलन में दुनिया भर के देशों की सहमति से आठ लक्ष्य तय किए गए थे और इन्हें पूरा करने के लिए वर्ष 2015 की समय-सीमा निश्चित की गई। भुखमरी और चरम अभाव की स्थिति समाप्त करने, सभी बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने, स्त्री-पुरुष के बीच विषमता घटाने, एचआइवी-एड्स और मलेरिया जैसे रोगों का उन्मूलन करने, मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम से कम करने, विकास में वैश्विक भागीदारी बढ़ाने और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने आदि को सहस्राब्दी विकास लक्ष्य का नाम देकर एक वैश्विक घोषणापत्र जारी किया गया था। 

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने इन लक्ष्यों के मद््देनजर ताजा प्रगति-रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट बताती है कि मलेरिया, तपेदिक, एचआइवी-एड्स के उन्मूलन की दिशा में तो खासी प्रगति दर्ज हुई है, पर मातृ और शिशु मृत्यु दर के मामले में स्थिति अब भी चिंताजनक है। सबसे बुरी हालत अपने देश की है। भारत इस मामले में दक्षिण एशिया के अपने पड़ोसी देशों से भी फिसड््डी नजर आता है। भारत में 2012 में पांच साल की उम्र तक पहुंचने से पहले चौदह लाख बच्चों की मौत हो गई। वर्ष 2013 में प्रति एक लाख जन्म पर दो सौ तीस स्त्रियों की जान चली गई। यह मातृ मृत्यु दर विकसित देशों की तुलना में चौदह गुना ज्यादा है। यह हालत जननी सुरक्षा जैसी योजनाओं पर सवालिया निशान लगाती है। इसी तरह पांच साल से कम आयु के बच्चों की ऊंची मृत्यु दर से यह सवाल उठता है कि भारत में कुपोषण


से निपटने के कार्यक्रमों और तमाम स्वास्थ्य योजनाओं का हासिल क्या रहा है? जिनका आसानी से इलाज संभव है, ऐसी बीमारियों की वजह से भी हर साल लाखों बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। केवल पोलियो उन्मूलन में भारत ने कामयाबी दर्ज की है। बाकी मामलों में वैसी संजीदगी क्यों नहीं दिखती? दरअसल, कमजोर तबकों के प्रति संवेदनशीलता घटती गई है, राज्य की सबसे बड़ी भूमिका विकास दर को प्रोत्साहित करने और बाजार-हितैषी की होकर रह गई है। सार्वभौम शिक्षा के उद््देश्य को लेकर जरूर बड़ी पहल हुई, जब शिक्षा अधिकार कानून बना। मगर यह कानून लागू होने के कई साल बाद भी, यूनेस्को की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में चौदह लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। 

सहस्राब्दी लक्ष्यों को लेकर विकसित देशों की तरफ से विकासशील और गरीब देशों को सहायता भी दी जाती रही है। पर यह सहयोग कम, स्वांग अधिक साबित हुआ है। विकसित देश सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के नाम पर ज्यादातर मदद कर्ज में राहत, उनसे या विश्व बैंक वगैरह से लिए गए कर्जों का ब्याज चुकाने आदि के लिए देते रहे हैं। कई बार हथियार और अन्य फौजी साजो-सामान खरीदने के लिए दिए गए उधार को भी इसी मद में डाल दिया जाता है। इस तरह एक ओर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता की कमी तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय सहायता, दोनों तरफ से भुखमरी और बीमारी से निपटने के लिए बनाए गए वैश्विक कार्यक्रम को चोट पहुंची है। यह अफसोस की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इन पहलुओं पर खामोश है।  


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