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परिधान का प्रश्न PDF Print E-mail
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Wednesday, 16 July 2014 01:55

जनसत्ता 16 जुलाई, 2014 : विशिष्ट लोगों के मनोरंजन, मेलजोल आदि के लिए बनी संस्थाओं, उनके कार्यक्रमों आदि के नियम-कायदों में जैसी औपनिवेशिक मानसिकता अपने देश में दिखाई देती है वैसा शायद ही दुनिया में कहीं और देखने को मिले। इसका ताजा उदाहरण चेन्नई के तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन क्लब में धोती पहन कर जाने की वजह से मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को प्रवेश से रोक दिए जाने की घटना है। बीते शनिवार को इस क्लब में मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस अरुणाचलम की पुस्तक का लोकार्पण था। इस अवसर पर न्यायाधीश डी हरिपरनथामन भी आमंत्रित थे। पर उन्हें रोक दिया गया, क्योंकि वे धोती पहने हुए थे। क्लब के नियम-कायदे अंगरेजों के समय बने थे और वही अब तक लागू हैं। अंगरेजी चलन की वेश-भूषा ही वहां मान्य है। न्यायमूर्ति हरिपरनथामन के साथ जो सलूक हुआ, उस पर स्वाभाविक ही सवाल उठे हैं। क्लबकर्मियों के इस व्यवहार पर अंगुलियां उठीं, पर वे तो चले आ रहे नियमों का पालन कर रहे थे। इसलिए जल्दी ही बहस क्लबों के जड़ नियम-कायदों की तरफ मुड़ गई। इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं है। खुद हरिपरनथामन ने याद दिलाया है कि अस्सी के दशक में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर को भी वहां के जिमखाना क्लब में इसलिए अंदर जाने से रोक दिया गया था कि उन्होंने धोती पहन रखी थी। ताजा विवाद में कुछ लोगों का तर्क है कि जब स्कूलों में गणवेश निर्धारित होता है, खिलाड़ियों और प्रशासकों वगैरह के लिए वेश-भूषा तय है, न्यायालयों में वकीलों-जजों के लिए पहनावा निर्धारित है, तो फिर क्लबों में ऐसा नियम होने पर एतराज क्यों होना चाहिए। मगर ऐसी दलीलदेने वाले इस बात को नजरअंदाज क्यों कर जाते हैं कि ये नियम-कायदे इन जगहों पर जाने वाले अतिथियों और सामान्य लोगों पर लागू नहीं होते। न्यायमूर्ति हरिपरनथामन उस क्लब के सदस्य की हैसियत से नहीं, बल्कि अतिथि के रूप में वहां गए थे। 

यह समस्या महज क्लबों तक सीमित नहीं है, अनेक सरकारी आयोजनों में भी पहनावे आदि को लेकर ऐसे ही नियम-कायदे तय हैं। बल्कि


कई बार उनके निमंत्रण-पत्रों पर हिदायत होती है कि मानक भारतीय परिधान में ही आएं। जिस देश में रहन-सहन और परिधान आदि के मामले में काफी विविधता हो, वहां अंगरेजी चलन के पहनावे को वरीयता देने या उसे ही मानक मानने का क्या औचित्य है? पहनावा व्यक्ति की संस्कृति, उसकी पहचान का अंग है। पश्चिम बंगाल में धोती और दक्षिण के राज्यों में वेष्ठि वहां की सांस्कृतिक पहचान हैं, जनसामान्य में इन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता है। मगर अभिजन वर्ग के लिए बने स्थलों के कर्ता-धर्ता और उनके लिए सार्वजनिक धन से कार्यक्रम आयोजित करने वालों के लिए यह भावना शायद कोई अर्थ नहीं रखती। नहीं तो क्लबों आदि में मेहमानों के प्रवेश को लेकर वही नियम लागू न रहने देते, जो सदस्यों के लिए बने हैं। फिर, सदस्यों के लिए भी औपनिवेशिक नियमों को ढोने की क्या तुक है? निर्धारित दायित्व या किसी खास भूमिका के लिए परिधान संबंधी नियम सारी दुनिया में हैं, पर बाकी अवसरों के लिए अपना पहनावा चुनने की आजादी रहती है। बस सार्वजनिक मर्यादा या शालीनता को ठेस न पहुंचती हो। धोती-कुर्ता पुरुषों के लिए वैसे ही पारंपरिक परिधान रहा है, जैसे महिलाओं के लिए साड़ी। अलबत्ता इन्हें धारण करने के रंग-ढंग में थोड़ा फर्क नजर आता है। समय के साथ पैंट-शर्ट या कमीज का चलन बढ़ता गया है, पर इसका यह मतलब नहीं कि उसे अनिवार्य मान लिया जाए। इस तरह तो दुराग्रहों का कोई अंत नहीं रहेगा। लिहाजा, ऐसे नियम-कायदों को बदला ही जाना चाहिए।


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