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Wednesday, 16 July 2014 01:53

पवन कुमार गुप्त

 जनसत्ता 16 जुलाई, 2014 : बहुत-से ऐसे मसले हैं जहां अगर मोदीजी मन बना लें तो दूरगामी और बड़े सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं। इसमें सबसे अहम है भाषा का सवाल।

आजादी के बाद हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं लगातार कमजोर पड़ी हैं। भाषाओं और संस्कृति की विविधता, जो हमारी ताकत होनी चाहिए थी, हमारी कमजोरी बना दी गई है। अंगरेजीपरस्त बुद्धिजीवियों ने भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के सामने खड़ा करके अंगरेजी के वर्चस्व को इस देश में लगातार बढ़ाया। गैर-हिंदी प्रदेश का व्यक्ति भले ही अंगरेजी न जाने, पर उसे हिंदी से बैर हो गया है। नेहरूजी ने इसमें बड़ी चालाकी से अहम भूमिका निभाई। उनकी और उन जैसों की यह चालाकी समझने वाले देश में एकमात्र बड़े नेता डॉ लोहिया थे, जिनका अंगरेजीपरस्त मीडिया और बुद्धिजीवी हमेशा मखौल बनाते रहे। आज जो भी मोदी कर रहे हैं उसमें भी सबसे बड़ी रुकावट अंदरूनी ही है। 

गैर-हिंदी समुदाय के अंगरेजीदां लोग मोदी की पहल को चुनौती देने के लिए हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच झगड़ा करवाने की भरपूर कोशिश करेंगे। इसलिए रणनीति यह होनी चाहिए कि हिंदी से ज्यादा अहमियत अन्य भारतीय भाषाओं को दी जाए। केंद्र और राज्यों के बीच संवाद का माध्यम राज्य की भाषा हो। देश में सरकार और विश्वविद्यालयों द्वारा हजारों गोष्ठियां, सेमिनार और कॉन्फ्रेंस होते रहते हैं। इनमें अधिकतर में, भाषाई विविधता के बहाने या विदेशियों का बहाना बना कर, संवाद की भाषा अंगरेजी ही हो जाती है। इससे हमारा बड़ा नुकसान होता है। 

देश में अंगरेजी के बोलबाले के बावजूद, सहजता से और सही अंगरेजी बोलने वाले, लाखों में नहीं, केवल हजारों में हैं। इनमें अधिकतर अंगरेजी के साथ-साथ पश्चिमी विचारों (प्रगतिशील क्रांतिकारी से लेकर पूंजीवाद तक पूरा दायरा) से भी प्रभावित हैं और कहीं न कहीं पश्चिम से जुड़े भी हैं। इन्हें भारतीय साहित्य, दर्शन, सभ्यता का ज्ञान भी पश्चिम के विचारकों और अंगरेजी किताबों से ही मिला होता है। इन्हें देश, देशजता की कोई समझ नहीं। इन्हें भारतीय सभ्यता की बात करने वालों में आरएसएस की बू आने लगती है। इनके विचारों में मौलिकता ढूंढ़ना मुश्किल होता है। सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित गोष्ठियों में ये ही लोग हावी होते हैं। जो इक्क-दुक्के गैर-अंगरेजी दुनिया के लोग आते हैं वे अपनी बात निडरता से कर नहीं पाते, क्योंकि उनमें या तो आक्रोश (इस भाषाई अन्याय के खिलाफ) जरूरत से ज्यादा होता है या वे खुद हीन भावना से ग्रसित होते हैं। इस प्रकार हमारी विचार की दुनिया में वृद्धि नहीं हो रही। 

हम पश्चिम से आयातित और कभी-कभी चुराए हुए विचार दोहराते रहते हैं। या फिर अपनी सभ्यता की महानता की बेसुरी ढपली बजाते रहते हैं। विचार की मौलिकता का बड़ा संबंध निज भाषा से होता है। इसलिए मोदीजी अपनी भाषा में बोलें (जहां हो सके गुजराती में भी) और उसका जिस प्रदेश में वे हों उसमें अनुवाद की व्यवस्था करवाई जाए। हर राजधानी और बड़े विश्वविद्यालयों में भारतीय संसद की तर्ज पर साथ-साथ देश की पंद्रह-सोलह भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था हो। 

यह सेमिनार हॉल दूसरों को भी किराए पर उपलब्ध कराया जाए। हमें भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद करवाने पर जोर देना होगा और इसके लिए शिक्षित पढ़े-लिखे नौजवानों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे पढेÞ-लिखे, अंगरेजी न जानने वाले वर्ग के लिए, रोजगार का भी एक नया आयाम खुलेगा। 

हमारा तो मोदीजी को यह सुझाव रहेगा कि वे जब भी भारत के किसी राज्य में जाएं तो हिंदी में न बोल कर गुजराती में बोलें और उसका अनुवाद उस प्रदेश की भाषा में हो। और जब वे किसी विदेशी से बात करें तो हिंदी में, जिसका (दोतरफा) अनुवाद उस विदेशी की भाषा और उससे हिंदी में करने की सहूलियत हो। 

भारतीय भाषाओं का साहित्य अंगरेजी में तो अनूदित हो जाता है, पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में यदा-कदा ही होता है। इस पर भी मोदीजी जोर दे सकते हैं। इसे बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है। अंगरेजी पुस्तकें जितनी आसानी से देश में मिल जाती हैं- दुकानों और इंटरनेट के जरिए भारतीय भाषाओं की किताबें नहीं मिलतीं। सरकार इस कमी को अपनी पहल पर पूरा कर सकती है। खादी की दुकानों की तर्ज पर भारतीय भाषाओं की पुस्तकों की दुकानें देश भर में खोली जा सकती हैं। 

सरकारी हिंदी को सरल और सहज बनाने की भी जरूरत है। अभी हम फंसे हुए हैं। एक तरफ हिंदी पत्रकारिता में अंगरेजी शब्दों का बेवजह चलन बढ़ा दिया गया है और दूसरी तरफ अत्यंत क्लिष्ट और बेतुका-सा अनुवाद अंगरेजी शब्दों का होता है। दोनों से बचने की जरूरत है। 

अंगरेजी शब्दकोश में हर वर्ष कुछ शब्द दूसरी भाषाओं से स्वीकार कर लिए जाते हैं। ऐसा हमें अपनी भाषाओं में भी करना चाहिए। भारतीय भाषाएं एक-दूसरे के शब्द और अंगरेजी के शब्द अपनी भाषा में समाहित कर सकती हैं, बशर्ते वे शब्द हमारी भाषा में पहले से न हों। विशेषकर आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से। 

नालंदा में अकूत साहित्य था- धर्म, दर्शन, आयुर्वेद, वास्तु, शिल्प, कला आदि विषयों पर। यह पूरा पुस्तकालय जला दिया गया और प्राय: समस्त साहित्य जलकर राख हो गया। पर बहुत कम लोगों को मालूम है कि सातवीं से लेकर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के बीच इस संपूर्ण साहित्य का भारत और तिब्बत के विद्वानों ने मिल कर तिब्बती में अनुवाद कर लिया था। तिब्बती लिपि, भाषा और व्याकरण का निर्माण ही इस आशय से किया गया कि नालंदा का साहित्य जो संस्कृत में था, उसका हूबहू अनुवाद (भावानुवाद और शब्दानुवाद, दोनों) तिब्बती में हो सके। इसलिए संस्कृत में जितने उपसर्ग और निसर्ग हैं उतने ही तिब्बती में। 

तिब्बती दुनिया


की एकमात्र ऐसी भाषा है, जो न सिर्फ संस्कृत के सबसे निकट है बल्कि उससे अनुवाद करके हम वापस नालंदा के मौलिक साहित्य को पुनर्जीवित कर सकते हैं। दलाई लामा और अन्य विद्वान जब चीन के आक्रमण से बच कर भारत आए तो वे अपने साथ तकरीबन पचासी-नब्बे फीसद पांडुलिपियां ला सकने में सफल हुए। ये आज भारत में उनके पास सुरक्षित हैं। यह अनुवाद का काम बड़ा है इसलिए सरकारी सहयोग के बिना संभव नहीं। एक बार संस्कृत में अनुवाद होने के बाद इसे अन्य भारतीय भाषाओं में भी करने की जरूरत है। आज तक किसी भी सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया है। मोदीजी इस पर ध्यान दें तो अच्छा रहेगा। यह एक लंबी सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से भी सशक्त पहल होगी और इसके कूटनीतिक पहलू भी हैं। 

चीन ने तो अपने यहां धर्म और संस्कृति को नष्ट करने का ही काम किया। हमें याद रखना चाहिए कि वहां की सांस्कृतिक क्रांति का एक अहम पहलू परंपरा, धर्म और संस्कृति की विरासत और जड़ों को खत्म करना था। अब वह कूटनीति की दृष्टि से बौद्ध धर्म और दर्शन पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है। हमारे अफसरान और नेतागण इसे कितना समझते हैं, कहना मुश्किल है, क्योंकि जिस तरह से नए बन रहे नालंदा विश्वविद्यालय में चीन का हस्तक्षेप है, जिस तरह के आधुनिक विचारधारा के लोगों को वहां रखा गया है और जिस तरह तिब्बती विद्वानों को उस पूरी प्रक्रिया और योजना से दूर रखा गया है, उससे तो अलग ही संकेत मिलते हैं। शायद भारतीयता को समझने का दावा करने वाली नई सरकार कुछ करे, ऐसी उम्मीद हम रख सकते हैं।  

बाबा रामदेव मोदी के समर्थक रहे हैं। इनसे सरकार को मदद लेनी चाहिए। हर सरकारी स्कूल में बाबा द्वारा प्रशिक्षित एक शिक्षक, जो बच्चों को स्वस्थ रहने के गुर सिखाए, को नियुक्त किया जाए। आजकल तो ठेके का जमाना है। पतंजलि योगपीठ को ठेका भी दिया जा सकता है, बिना नए शिक्षकों की नियुक्ति के। 

ये लोग योग, प्राणायाम, घरेलू उपचार, स्वास्थ्यवर्धक भोजन और आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान स्कूली बच्चों को दे सकते हैं। साथ ही हर गांव के लोगों को भी प्रशिक्षित किया जा सकता है। स्वामी रामदेव की राजनीति को छोड़ दें तो भी यह मानना पड़ेगा कि उन्होंने योग और स्वास्थ्य की दृष्टि से एक बड़ा काम किया है। उनके उत्पाद भी उच्च कोटि के हैं। इनमें से कुछ दवाइयां, अर्क और अन्य भोजन के पदार्थ गांव स्तर पर तैयार हो सकते हैं। 

हमारे यहां के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की एक जायज शिकायत यह रहती है कि उन्हें सरकारी आंकड़े एकत्रित करने के लिए कई बार स्कूल से हटा कर इन कामों में लगा दिया जाता है। इसके अलावा, हमारे जैसे बड़े और भौगोलिक दृष्टि से भिन्न देश में बहुत कम ऐसे स्थान हैं, जहां से मौसम संबंधी जानकारी मिल पाती है। मसलन टिहरी भौगोलिक दृष्टि से एक बड़ा क्षेत्र है, पर यहां वर्षा और तापमान मापने के एक या दो स्थान ही हैं। जबकि यहां हर बीस-चालीस किमी पर मौसम (वर्षा और तापमान) में बड़ा फर्क हो जाता है। हमारा प्रस्ताव है कि हर सरकारी स्कूल में यह अनिवार्य कर दिया जाए कि वे हर दिन के अधिकतम और न्यूनतम तापमान और बारिश का रिकॉर्ड रखें। 

यह कोई मुश्किल काम नहीं और बच्चे ऐसा करते हुए बहुत कुछ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सीखेंगे। ये आंकड़े फिर सरकारी मौसम विभाग को उपलब्ध करवाए जा सकते हैं। इसी तरह स्थानीय खेती, पैदावार, पशुओं की किस्में और उनकी संख्या, स्थानीय कारीगरी, बाजार, स्थानीय पेड़-पौधों, वनस्पति की किस्में, विविधता का आकलन भी बच्चे आसानी से कर सकते हैं। इससे उनकी जानकारी भी बढ़ेगी, उनकी अवलोकन शक्ति, शोध करने की प्रवृत्ति और क्षमता का विकास होगा।  

स्कूलों में अपने क्षेत्र की भाषा के अलावा भारत की एक और भाषा या संस्कृत सीखना अनिवार्य कर दिया जाए। कक्षा पांच तक भाषा और गणित पर जोर हो। शेष सभी विषय सम्मिलित रूप से पढ़ाए जाएं। इसमें भी पढ़ाई पुस्तक पर केंद्रित न होकर स्थानीय परिवेश पर हो।  

उच्च शिक्षा में इतिहास और समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम को भारतीय दृष्टि से पढ़ाने की जरूरत तो है ही, साथ-साथ इसे शोधोन्मुख करने की भी आवश्यकता है, पर इसे ठीक से सोच-समझ कर ही करना उचित रहेगा। पहले सही लोगों को चयनित करके इस पर एक समिति बनाई जा सकती है, जो अपना सुझाव रखे। आजकल मूल्य शिक्षा की बड़ी बातें होती हैं, पर इसे अलग से न पढ़ा कर इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि मूल्यों को विविध विषयों में कैसे पिरोया जा सकता है। मैं दो प्रमुख राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों को जानता हूं जहां मूल्य-शिक्षा पर गंभीरता से काम हो रहा है- आइआइटी, हैदराबाद और आइआइटी (बीएचयू)। यहां इन बातों पर बहस शुरू कराई जा सकती है कि मूल्यों को विविध विषयों के साथ जोड़ कर किस प्रकार पढ़ाया जाए।


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