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एक और उत्सर्ग PDF Print E-mail
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Wednesday, 16 July 2014 01:51

कौशल किशोर

जनसत्ता 16 जुलाई, 2014 : गंगा मुक्ति कार्यक्रम के प्रणेता बाबा नागनाथ के अंत की दास्तान अत्यंत दुखद है। वाराणसी में जनमे और पले-बढ़े नागनाथ तिवारी गंगापुत्र निगमानंद की परंपरा के सत्याग्रही संत थे। मणिकर्णिका घाट पर स्थित मठ में उन्होंने 19 जुलाई, 2008 को गंगा मुक्ति के लिए उपवास शुरू किया था। अंत में यह आमरण अनशन साबित हुआ। नागनाथ का संकल्प था, ‘जब तक गंगा बांधों और प्रदूषण के प्रकोप से मुक्त नहीं होगी, तब तक मैं अन्न नहीं ग्रहण करूंगा।’ इस अनशन के दौरान बार-बार उनकी हालत बिगड़ती रही। प्रशासन की मेहरबानी से वे अस्पताल और मठ के बीच झूलते रहे। आखिरकार इस हफ्ते उनकी तपस्या का अंत भी निगमानंद की तरह गहन चिकित्सा कक्ष में हुआ। पिछले तीन सालों में गंगा की अस्मिता के लिए यह दूसरा बलिदान है। 

उनकी शहादत से गंगा मुक्ति आंदोलन को बड़ा झटका लगा है। बाबा ने नरेंद्र मोदी की जीत और उनके प्रधानमंत्री बनने पर सुखद आश्चर्य व्यक्त किया था। सोलह मई को अच्छे दिन शुरू होने की कल्पना से वे अभिभूत हो उठे थे। उन्हें उम्मीद जगी थी कि नई सरकार अविरल गंगा और निर्मल गंगा का लक्ष्य साधने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। पर मोदी सरकार के पहले बजट में कोई सकारात्मक संकेत न पाकर वे बेहद दुखी हुए। हिमालय में सुरंगों का जाल और रेल लाइनों का जंजाल फैलने से होने वाली समस्याएं उन्हें सताने लगी थीं। इस गम से वे उबर नहीं सके और इस दुनिया को अलविदा कह गए। गांधीवादी सत्याग्रही का यह दर्दनाक अंत भारतीय संविधान की मूल भावनाओं पर कठोर आघात का प्रतीक ही माना जाएगा। 

तीन साल पहले विदेश में जमा कालाधन और जन लोकपाल आंदोलन से तप रहे देश में निगमानंद की शहादत के बाद बड़ा हंगामा हुआ। पर बाबा नागनाथ हमेशा की तरह हाशिये पर रहे। किसी ने भी उनकी सुध नहीं ली। पर काशी की धरती बाबा नागनाथ और स्वामी सानंद को कभी भूल नहीं सकेगी। शुक्रवार को उन्होंने नश्वर देह का त्याग किया। बनारस दिन ढले तक उनकी अंत्येष्टि में लगा रहा। 

मैंने पहली बार बाबा के दर्शन 18 जून, 2012 को दिल्ली में किए थे। उस दिन जंतर-मंतर पर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के नेतृत्व में सांकेतिक धरने का अभियान था। मंच पर खचाखच भीड़ थी। आचार्य के पास स्वामी सानंद बैठे थे। बगल में काषाय वस्त्रों में बेजान से बाबा नागनाथ। मंच पर एक कोने में बैठा मैं उन्हें केवल देख सकता था। सैकड़ों गंगाभक्तों की भीड़ में उन तक पहुंचना संभव नहीं था। गंगा अभियान से जुड़े लोगों ने बताया कि इस आंदोलन में भाग लेने के लिए ही उन्हें विमान से लाया गया है। शाम को लौटने वक्त तक ऐसे हालात नहीं हुए कि मेरी उनसे बातचीत हो सके। 

अगले महीने मैं उनसे मिलने बनारस पहुंचा था। आदि मणिकर्णिका की श्मशान भूमि के साथ ही


एक छोटे से पुराने मठ में वे अनशनरत थे। उनकी कुटिया में पहुंचने पर रोंगटे खड़े करने वाला दृश्य था। एक व्यक्ति उनके बेजान शरीर में टीका लगा रहा था। पूछने पर पता चला कि जबसे प्रशासन ने उनको चिकित्सा विज्ञान में प्रयोग का पात्र बनाया गया है, उनका शरीर बेजान होता जा रहा है। मैंने गौर से उनके हाथों की ओर देखा। वे बेजान पत्थर-से थे, जिन्हें मोड़ना तक मुमकिन नहीं था। थोड़ी देर बाद वे मेरी ओर मुखातिब ंहोकर बोले: ‘कौन कहता है, निगमानंद मर गया?’ यह सुन कर मैं हतप्रभ था। फिर उन्होंने जोश में कहा था, ‘मैं हूं निगमानंद।’ वह संवाद भूलने योग्य नहीं है। 

बाबा नागनाथ के बेजान शरीर से निकली बातें बेजान नहीं थीं, पर जड़त्व समाप्त करने में सक्षम भी नहीं साबित हुर्इं। आज हमारे नगर और नागरिक गंगा के साथ खड़े होने से पैदा होने वाली मुश्किलों का सामना करने से बचना चाहते हैं। अस्सी के दशक से ही सरकार गंगा के नाम पर लूट मचाने में लगी है। पिछले साल चिकित्सालय, मठ और कारागार के बीच चक्कर काटते सत्याग्रही सानंद का मोहभंग हुआ था। वे सरकार और आमजन दोनों की प्रतिक्रिया से दुखी थे। ठीक एक सौ साठ साल पहले 1854 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने गंगनहर बनाई थी। गंगा को बांधने का काम ब्रिटिश हुकूमत के लिए एक मुश्किल निर्णय साबित हुआ था। देश के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्ष एकजुट हुए। पर तीन वर्ष बाद हुए सिपाही विद्रोह के बाद भी यह समस्या नहीं सुलझी। वर्षों बाद मदनमोहन मालवीय का नेतृत्व पाकर 1916 में गंगा आंदोलन परवान चढ़ा था। 

निगमानंद और नागनाथ की शहादत के बाद गंगा मुक्ति संघर्ष में विभाजन रेखा खिंचती नजर आ रही है। सत्याग्रह करने वाले दो वर्ग हैं। इसमें एक ओर अण्णा हजारे और बाबा रामदेव जैसे खिलाड़ी हैं, तो दूसरी ओर निगमानंद और बाबा नागनाथ जैसे तपस्वियों के समर्थक। दो धु्रवों में बंटे इन आंदोलनों की कुंजी राजनीतिक-अर्थव्यवस्था के हाथों में है। ऐसी दशा में ‘गंगा राइट्स’ की मांग लेकर तपस्या करने वाले बाबा नागनाथ के सपनों के साथ सरकार कैसा व्यवहार करेगी?


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