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संबंधों का संघर्ष PDF Print E-mail
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Wednesday, 16 July 2014 01:50

मोनिका शर्मा

जनसत्ता 16 जुलाई, 2014 : रिश्ते सहज सरल बहते से हों तो जीवन को सुदृढ़ सहारा मिलता है। चेतन-अवचेतन मन में यह विश्वास बना रहता है कि हमारे अपने हैं, जो हर परिस्थिति में साथ निभाएंगे। यह विश्वास सुरक्षा देता है और संबल भी। आमतौर पर महिलाएं रिश्तों की उलझन से ज्यादा दो-चार होती हैं। इसका कारण यह है कि हमारे सामाजिक-परिवारिक परिवेश में संबंधों को निभाने का जिम्मा भी अधिकतर महिलाएं ही उठाती हैं और इस दुविधा को आए दिन वही जीती हैं। 

रोजाना की व्यावहारिक और मौखिक क्रिया-प्रतिक्रिया आजकल घर-परिवार के संबंधों में भी आम हो चली है। अनबन का खेल कुछ ऐसा कि रिश्ते निभाने भी हैं और सुकून भी हासिल नहीं। रिश्ते अगर आत्मीय हों तो भावनात्मक सहारा देते हैं, पर यही रिश्ते अगर खटास और उलझन लिए हों तो आपस में जुड़े रहना मात्र औपचारिकता बन कर रह जाता है। सामंजस्य बनाए रखने की क्षमता अब किसी के पास नहीं। हर कोई चाहता है कि दूसरे लोग उनके मन-मुताबिक व्यवहार करें। उनकी सुनें, उन्हें समझें। सही दृष्टिकोण के साथ संतुलित व्यवहार अब कम ही घरों और लोगों में देखने को मिलता है। भले ये रिश्ते-नाते अपनों से जुड़े होते हैं, पर इनमें सभ्य और असभ्य व्यवहार का हर रंग शामिल होता है। 

आज कहा जाता है कि जमाना बदल गया है। यह सही भी है। लेकिन रिश्तों-नातों की उलझन देख कर कई बार तो यही लगता है कि आज भी कितने ही पारिवारिक और सामाजिक पहलू हैं, जहां बदलाव के नाम पर कुछ नहीं बदला। कुछ रिश्ते औपचारिकता के बोझ तले दब गए तो कुछ संबंध हद से ज्यादा खुलेपन की भेंट चढ़ गए हैं। समय के साथ आए बदलाव के चलते आज आपसी संबध भी सकारात्मक कम, नकारात्मक अधिक लगते हैं। सच यह है कि एक-दूजे से जुड़ने के साधन बढ़ गए हैं तो कहीं दूरियां भी बढ़ी हैं। भावनात्मक लगाव अब आर्थिक चमक-दमक की भेंट चढ़ गया लगता है। हम अपनेपन के मोल को समझते हुए खुशियां बांटना भूल कर हैसियत तौलने में लग गए हैं। 

एक स्त्री होने के नाते मैंने रिश्तों को


काफी करीब से देखा है। दरअसल, लड़कियां चाहे शादी के पहले माता-पिता के घर में रहें या शादी के बाद अपना घर बसा लें, रिश्तों के निर्वाह की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। सामाजिक दायित्वों को पूरा करने के मामले में उन्हें कोई छूट नहीं मिलती। जाहिर है कि वे रिश्तों के उतार-चढ़ाव का सामना हर रूप में करती हैं। संबंधों की अनबन को महिलाएं ही सबसे ज्यादा झेलती हैं। संबंधों के निर्वहन के संघर्ष में कितना ही तनाव और अपराधबोध चाहे-अनचाहे उनके हिस्से आ जाता है। 

एक खास बात जो आजकल रिश्तों में देखने में आती है कि घर के बाहर निकलते ही हमारे भीतर संयम, समझदारी और व्यावहारिकता सब आ जाती है। जबकि अपनों के साथ हम इस सहृदयता से कम ही पेश आते हैं। यही बात संबंधों के निर्वाह को और कठिन बना देती है। कभी-कभी सोचती हूं कि हम बाहरी संबंधों को निभाने में जितनी सावधानी और समझ से काम लेते हैं, उतनी हम अपनों को साथ लेकर चलने में नहीं बरतते। परिणाम यह होता है कि जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे रिश्तों का अवमूल्यन हो जाता है। बिखरते संबंधों के इस दौर में हमें हर पल याद रखना होगा कि रिश्ते आपसी जिम्मेदारी के भाव से जीवंत बने रहते हैं, इन्हें एक-दूजे पर लादा नहीं जा सकता। इनकी मिठास सहज स्वीकार्यता में ही है, जो एक-दूजे का मान करने से ही बनी रह सकती है।


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