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गाजा की त्रासदी PDF Print E-mail
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Tuesday, 15 July 2014 11:53

जनसत्ता 15 जुलाई, 2014 : एक बार फिर फिलस्तीनियों पर इजराइल का कहर टूटा है। इजराइल का कहना है कि उसकी फौजी कार्रवाई का मकसद हमास के आतंकी हमलों से निपटना है। लेकिन यह साफ है कि इजराइल की सैन्य कार्रवाई पूरी तरह गैर-आनुपातिक है। उसकी बमबारी एक सौ छियासठ फिलस्तीनियों की जान ले चुकी है, जिनमें औरतें और बच्चे भी मारे गए हैं। गाजा के हजार से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। हजारों लोगों को अपनी जान बचाने के लिए घरबार छोड़ कर भागना पड़ा है। इजराइल की बमबारी का शिकार बनने और उनके पलायन का सिलसिला जारी है। दूसरी ओर, हमास के राकेटी हमलों में किसी इजराइली सैनिक या नागरिक की जान नहीं गई है, जबकि इजराइल का कहना है कि उसे निशाने पर लेकर हफ्ते भर में हमास ने पांच सौ से ज्यादा राकेट दागे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रवैए से लगता है कि उन्हें न अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों की कोई परवाह है न विश्व-जनमत की। शायद इसलिए कि अमेरिका इस घटनाक्रम पर अब तक खामोश रहा है और अन्य पश्चिमी देशों ने भी कोई तीखी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की है। अलबत्ता संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद ने जरूर चिंता जताते हुए इजराइल से संयम बरतने की अपील की है। 

नेतन्याहू ने यह कह कर गाजा पर इजराइली सैन्य कार्रवाई को सही ठहराया है कि हमास ने अपने हथियार मस्जिदों और घरों में जमा कर रखे हैं और लोगों की रिहाइश के बीच ही वह अपने प्रशिक्षण केंद्र चलाता है। इसी आधार पर नेतन्याहू ने गाजा में आम लोगों के मारे जाने को सैनिक कार्रवाई के दौरान की सामान्य क्षति करार दिया है। लेकिन यह वास्तव में ऐसी त्रासदी है जिसकी जवाबदेही से इजराइल पल्ला नहीं झाड़ सकता। कई इजराइली बौद्धिकों ने भी नेतन्याहू के बयान पर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि अतिवादी सैन्य कार्रवाई इसलिए की गई और इसलिए की जा रही है कि गाजा पर कहर बरपा कर फिलस्तीनियों का मनोबल तोड़ा जा सके। दशकों से इजराइल का रवैया यही रहा है कि वह कुछ भी करे, उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।  हमास के तौर-तरीकों को जायज नहीं कहा जा


सकता, पर यह नहीं भूलना चाहिए गाजा दुनिया की सबसे घनी बसावटों में एक है। फिर, जब खुली हिंसा का दौर नहीं होता, तब भी फिलस्तीनियों को इजराइल के आतंक के साए में जीना पड़ता है। गाजा में वे अपने घरों और अस्पतालों में भी सुरक्षित नहीं हैं, और दीवारों से घिरे पश्चिमी तट क्षेत्र में इजराइली सैनिकों के नियंत्रण, निगरानी से गुजरते हुए उन्हें रोज उत्पीड़न और अपमान सहना पड़ता है। अपने लोगों से मिल पाना उनके लिए हमेशा दूभर होता है।

यह सब उन्हें इसलिए झेलना पड़ता है क्योंकि इजराइली नियंत्रण से मुक्त अपने वतन का सपना उन्होंने छोड़ा नहीं है। उनके पक्ष में समय-समय पर पारित संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव लागू नहीं हो सके, कई प्रस्तावों कोे अमेरिका के वीटो ने गिरा दिया। आज फिलस्तीनी फतह और हमास के मेल-मिलाप के बावजूद अपने को कहीं ज्यादा असहाय महसूस करते हैं। इसलिए कि न सिर्फ पश्चिमी दुनिया मूकदर्शक बनी हुई है, अरब देश भी इस मामले में मुखर नहीं हैं। अरब लीग की साख खुद इसके सदस्य देशों के बीच बची नहीं है। मिस्र से कुछ सकारात्मक पहल की उम्मीद की जा सकती थी, पर वह अपनी आंतरिक उलझनों में फंसा हुआ है। फिलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने हिंसा के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध किया है कि वह फिलस्तीन को अपने संरक्षण में ले ले। इस पर बान की-मून को गंभीरता से विचार करना चाहिए। पर साथ ही फिलस्तीन समस्या का स्थायी हल निकालने की भी कोशिश हो।


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