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हिंसा का दुश्चक्र PDF Print E-mail
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Tuesday, 15 July 2014 11:47

शिव दास

जनसत्ता 15 जुलाई, 2014 : पिछले दिनों नक्सल प्रभावित दस राज्यों के मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के महानिदेशकों की बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सलियों के साथ किसी प्रकार की बातचीत से साफ मना कर दिया। इसमें उन्हें नक्सल समस्या के अंत की संभावनाएं भले ही दिख रही हों, लेकिन हकीकत कुछ और है। नक्सलियों के खात्मे के लिए केंद्र और राज्य की सत्ता में काबिज विभिन्न सरकारों द्वारा चलाए गए पहले के अभियानों का अनुभव बताता है कि अब शायद उन्हीं पहलों को दोहराया जाएगा, जिनकी वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसक नक्सली-पुलिस वारदातों की संख्या में इजाफा हुआ। इनमें हजारों बेगुनाह युवाओं और युवतियों को मौत के घाट उतारा गया, चाहे वे नक्सली या माओवादी होने के नाम पर मारे गए या फिर सरकारी वर्दी में।

सबसे ज्यादा जनहानि उन वंचित आदिवासी-दलित समुदाय के लोगों को उठानी पड़ी जो सरकारी उपेक्षा की वजह से दो वक्त की रोटी के लिए वनों और पहाड़ियों में गुमनाम जिंदगी गुजार रहे थे। वे अपना पसीना बहा कर जिंदा रहने का इंतजाम कर रहे थे या पहाड़ी और बंजर भूमि को उपजाऊ बना रहे थे, लेकिन सामंती और बाजार के हुक्मरानों को यह मंजूर नहीं हुआ। एक साजिश से उपजी नक्सली-पुलिस के बीच हिंसा की वारदातों ने उन्हें विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया। उनमें से न जाने कितने मौत के घाट उतार दिए गए, कितने सलाखों के पीछे हैं या फिर खुले आकाश के नीचे! जंगलों और पहाड़ी इलाकों में पुलिस प्रशासन के दायरे से बचे रहने वालों की तादाद बहुत ज्यादा थी। लेकिन बातचीत और सहयोग के रूप में प्रशासन की ओर से शुरू की गई सामुदायिक पुलिस व्यवस्था ने इसमें कमी कर दी। नतीजतन, देश के कई इलाके माओवादियों और पुलिस के बीच हिंसा से आजाद हो चुके हैं। कई जगहों पर लोग हिंसा की जगह अब विकास की बात कर रहे हैं।

राजनाथ सिंह के गृह जनपद चंदौली में भी एक दशक पहले नक्सलियों और पुलिस के बीच हिंसा की इबारत लिखी जाती थी और नई दिल्ली में उन पर चर्चा होती थी। राज्य की सत्ता की बागडोर


उनके हाथों से निकलने के बाद उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सामुदायिक पुलिस व्यवस्था के तहत अधिकारियों, नक्सलियों और ग्रामीणों के बीच बातचीत शुरू हुई। सभी पक्षों में सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ। नतीजा यह हुआ कि कई कथित नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। कई वापस घर लौट आए और समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करने लगे। नक्सली-पुलिस हिंसा की वारदातों की संख्या काफी कम हो गई। प्रशासन में भी हिंसा की जगह विकास के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होने लगी है। ऐसा ही आंध्र प्रदेश समेत अन्य राज्यों के विभिन्न इलाकों में भी देखने को मिला है। इसके बावजूद अगर माओवादी समूहों से बातचीत की प्रक्रिया को बंद करने की कोशिश की जा रही है तो यह एक तरह से स्थायी समाधान की राह रोकने जैसा है और लोकतंत्र विरोधी कदम है।

एक लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है कि देश के नागरिकों की समस्याओं को सुने, समझे और उनका निदान करे। आखिरकार बातचीत में नुकसान क्या है? अगर किसी पक्ष की मांगें लोकतांत्रिक नहीं होंगी तो उन्हें नकारा जा सकता है। बातचीत का रास्ता बंद कर दमन की राह पर आगे बढ़ना वही सामंती परंपरा है, जिसके तहत सदियों से गरीबों, आदिवासियों और दलितों का शोषण और दमन हो रहा है। ऐसे कदम से एक बार फिर देश में दलितों और आदिवासियों के दमन की घटनाओं समेत मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में इजाफा होगा जो भारत या किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं होगा। 


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