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नियुक्ति और युक्ति PDF Print E-mail
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Monday, 14 July 2014 11:51

जनसत्ता 14 जुलाई, 2014 : पिछली सरकार ने जब भी अध्यादेश का सहारा लिया, भाजपा ने उसे अलोकतांत्रिक कदम ठहराते हुए कांग्रेस को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन खुद मोदी सरकार का रवैया कैसा है? उसने शुरुआत ही अध्यादेश से की। कुछ ही दिनों में दो अध्यादेश जारी हो गए। पहला अध्यादेश ट्राइ यानी भारतीय दूरसंचार प्राधिकरण के नियमों में संशोधन के लिए लाया गया, और दूसरा, पोलावरम परियोजना की राह आसान करने के लिए। ट्राइ की बाबत अध्यादेश इसलिए लाया गया था कि प्रधानमंत्री अपने लिए मनपसंद प्रधान सचिव की नियुक्ति कर सकें। ट्राइ का नियम इसमें आड़े आ रहा था, जिसके मुताबिक ट्राइ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य पद छोड़ने के बाद केंद्र या किसी राज्य सरकार में कोई पद ग्रहण नहीं कर सकते। यह प्रावधान इस मकसद से किया गया था कि दूरसंचार नियामक संस्था की स्वायत्तता पर कोई आंच न आए। लेकिन इसे सिर्फ इसलिए बदल दिया गया कि प्रधानमंत्री नृपेंद्र मिश्र को अपना प्रधान सचिव नियुक्त करना चाहते थे। अध्यादेश के जरिए किए गए बदलाव को संसद की मंजूरी दिलाने के लिए पिछले हफ्ते सरकार ने संबंधित विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया। लोकसभा में सरकार सुविधाजनक स्थिति में है, इसलिए यह वहां आसानी से पारित हो जाएगा। मगर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस समेत कई दलों के एतराज को देखते हुए राज्यसभा में इसे पारित कराना आसान नहीं होगा। राज्यसभा की बाधा से पार पाने के लिए सरकार समर्थन जुटाने की कवायद में जुट गई है। पर यहां असल सवाल राज्यसभा के गणित का नहीं, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली का है।

विडंबना यह है कि राजनाथ सिंह समेत कई केंद्रीय मंत्री अपनी पसंद के सचिव या सहायक नहीं चुन सके, मोदी के इस निर्देश के चलते कि जो अधिकारी यूपीए सरकार के मंत्रियों के निजी अमले में रह चुके हों, उन्हें न चुना जाए। लेकिन जब अपनी बात आई तो मोदी ने ट्राइ के नियम तक बदल दिए। अब अध्यादेश की जगह लाए गए विधेयक में व्यवस्था है कि ट्राइ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व पूर्णकालिक सदस्य इस संस्था से जुड़े अपने दायित्व से मुक्त होने के दो साल बाद केंद्र या किसी राज्य सरकार में पद ग्रहण कर सकेंगे। इस प्रावधान ने यह अंदेशा पैदा किया है कि भविष्य में ट्राइ के अध्यक्ष और


सदस्य पद से हटने के बाद सरकार में कोई ऊंचा ओहदा मिलने के लोभ से प्रभावित हो सकते हैं। इससे 1997 में बने ट्राइ अधिनियम के मकसद पर ही पानी फिर जाएगा। आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक लोकसभा में तेलंगाना राष्ट्र समिति, बीजू जनता दल और कांग्रेस के तीखे विरोध के बावजूद पारित हो गया। तेलंगाना के गठन के लिए यूपीए सरकार के विधेयक का भाजपा ने समर्थन किया था। लेकिन मोदी सरकार ने आते ही तेलंगाना के भूगोल से छेड़छाड़ कर दी। अध्यादेश के जरिए उसने तेलंगाना के सात मंडलों को सीमांध्र के हवाले कर दिया। इसी फैसले को अब विधेयक का रूप दिया गया है।

तेलंगाना के सांसद पहले ही राष्ट्रपति से मिल कर अध्यादेश पर एतराज जता चुके थे, लोकसभा में भी उन्होंने विधेयक का विरोध किया। संसद के बाहर या संसद में किसी मसले पर विभिन्न पार्टियों का अलग-अलग रुख होना स्वाभाविक या सामान्य बात है। पर सवाल है कि इस मामले में तेलंगाना सरकार या वहां की विधानसभा की राय लेने की जरूरत मोदी सरकार ने क्यों नहीं समझी? तेलंगाना के सात मंडलों को सीमांध्र में इसलिए कर दिया गया, क्योंकि सीमांध्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी तेलुगू देशम की सरकार है, और विस्थापन का दायरा बढ़ने के बावजूद पोलावरम परियोजना में कोई बाधा नहीं रहेगी। इस तरह मोदी सरकार ने पोलावरम परियोजना के विवाद से निपटने का जो तरीका चुना वह न केवल विचित्र बल्कि अलोकतांत्रिक भी है। क्या लोकतांत्रिक तकाजों का कोई मूल्य नहीं है? 


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