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बर्बर पंचायती PDF Print E-mail
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Monday, 14 July 2014 11:50

जनसत्ता 14 जुलाई, 2014 : पिछले दिनों झारखंड के बोकारो जिले के एक गांव में बलात्कार की ऐसी घटना हुई जो कई मायनों में विचलित करने वाली है। तेरह साल की एक लड़की के साथ बलात्कार जाति-पंचायत के आदेश पर हुआ। खबर है कि इस लड़की के भाई ने रात में पड़ोस के एक घर में घुस कर सो रही महिला के साथ छेड़छाड़ की। दूसरे दिन उस औरत और उसके पति की शिकायत पर समुदाय की पंचायत बैठी। पंचायत ने महिला के पति को बदसलूकी के आरोपी युवक की नाबालिगबहन के साथ बलात्कार का फरमान सुनाया। इसके बाद छेड़खानी की शिकायत करने वाली महिला का पति उस लड़की को जंगल में घसीट ले गया और उसने वैसा ही किया जैसा पंचायत ने कहा था। बाद में यह मामला थाने पहुंचा और पुलिस ने बलात्कार करने वाले आदमी, छेड़छाड़ के आरोपी युवक और पंचायत के मुखिया को गिरफ्तार कर लिया। यों बलात्कार, छेड़छाड़ और लड़कियों-महिलाओं पर तेजाब फेंकने आदि की खबरें लगभग रोजाना आती रहती हैं। बहुत-से मामलों में अपराध को अंजाम देने वाले पीड़ित के परिचित, पड़ोसी या रिश्तेदार होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो में दर्ज आंकड़े और कई सामाजिक अध्ययन भी इसकी पुष्टि करते हैं। मगर ये अपराध छिप कर या अपने को छिपाने की कोशिश करते हुए किए गए होते हैं, घटना के बाद अपराधी सबूत मिटाने की कोशिश भी करते हैं। जबकि बोकारो के गोमिया में बलात्कार पंचायत के हुक्म पर हुआ। पंचायत का मुखिया उस औरत का पिता है जिसने छेड़छाड़ की शिकायत की थी। इसलिए सोचा जा सकता है कि मुखिया ने ‘सजा’ देने के लिए अतिरिक्त उत्साह दिखाया। पर किसी ने पंचायत को आगाह क्यों नहीं किया वह एक अपराध को अंजाम देने का आदेश न दे? किसी ने उस लड़की को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की? यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि खुद महिला ने उस लड़की को उसके घर से खींच कर बलात्कार के लिए अपने पति के हवाले किया।

 इस अपराध में ऐसी सामाजिक भागीदारी यही बताती है कि स्त्री की देह को लड़ाई का मैदान समझा जाता है और बहुत-से बलात्कार बदला लेने, सबक सिखाने और हिसाब बराबर करने के लिए होते


हैं। जहां समाज की ऐसी मानसिकता हो, वहां औरत भी अलग ढंग से नहीं सोच पाती। सांप्रदायिक दंगों और जातिगत हिंसा के दौरान यह कड़वी हकीकत कहीं ज्यादा भयावह रूप में सामने आती है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के सांसद तापस पाल के एक बयान का खुलासा होने पर काफी बवाल मचा। इसमें पाल ने धमकी दी थी कि माकपा के लोगों को सबक सिखाने के लिए वे उनके साथ मारपीट के अलावा उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार के लिए भी अपने कार्यकर्ताओं को कह सकते हैं। एक सांसद बलात्कार को सियासी लड़ाई लड़ने का तरीका समझता है, और एक पंचायत इस अपराध को न्याय का तरीका मान लेती है! हम कैसा समाज बना रहे हैं? सोलह दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के खिलाफ देश भर में लोगों के आक्रोश का सैलाब उमड़ा था। महीने भर विरोध-प्रदर्शन चलते रहे। सरकार को भी चेतना पड़ा और उसने यौनहिंसा संबंधी कानूनों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की। वर्मा समिति की सिफारिशों के मद्देनजर यौनहिंसा से संबंधित कानून और कड़े किए गए। मगर यह एक बार फिर जाहिर हुआ है कि सिर्फ कानून कड़े कर देना पर्याप्त नहीं है। संशोधित कानूनों के बावजूद स्त्रियों के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए हैं। स्त्रियों के प्रति कानून और न्याय-व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही जरूरी है, पर समाज की मानसिकता बदलना भी एक बड़ा तकाजा है।   


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